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पुण्यतिथि: अक्खा मुंबई पर चलता था बालासाहेब का राज, ऐसे गुजरी सारी जिंदगी


हाईलाइट

  • बाल ठाकरे की पुण्यतिथि आज
  • बाल ठाकरे के इशारे पर चलती थी मुम्बई
  • बाल ठाकरे ने अपनी विचारधारा से किया सभी को प्रभावित

डिजिटल डेस्क, मुम्बई। राजनीति के इतिहास में बाला साहेब ठाकरे का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। क्योंकि वे एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपने दम पर मुम्बई शहर की काया पलट कर दी। सिर्फ मुम्बई ही नहीं, उनकी राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला। अक्सर आपने फिल्मों में देखा होगा कि एक कैरेक्टर ऐसा होता था, जिसका शहर में ढंका बजता था। बाला साहेब रियल लाइफ में ऐसे इंसान थे। उनकी भी जिंदगी किसी फिल्म से कम नहीं रही है। 23 जनवरी 1926 को पूने में जन्में बाला साहेब ने जब 17 नवम्बर 2012 को इस दुनिया को अलविदा कहा तो हमने एक बेहतरीन राजनीतिज्ञ इस दुनिया से खो दिया। आज उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें। 

बाला साहेब ठाकरे मुम्बई शहर के राजा की तरह थे। उनके इशारे पर मुम्बई नाचा करती थी। वे अगर कहते थे कि मुम्बई बंद तो बंद! वे जिसे अपने आगे हाजिर होने को कह दें, वह अगले ही पल हाजिर हो जाता था। क्या नेता, क्या अभिनेता उनके आगे कोई नहीं टिक पाया। उनके इस रुतबे को देखकर हर कोई उनका मुरीद हो गया। उनकी हुकूमत के किस्से आज भी याद किए जाते हैं।

बाला साहेब की हुकूमत उनके ही बेटे को रास नहीं आई। उन्होंने अपने ही पिता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। भाई उद्धव ठाकरे से संपत्ति विवाद को लेकर वह अपने पिता बाला साहेब तक से भिड़ गए। इस बात का खुलासा शिवसेना के ही नेता अनिल परब ने कोर्ट में किया था। अनिल परब ने बताया था कि बाला साहेब को अपने पुत्र जयदेव कभी पसंद नहीं आए। इसके पीछे कारण यह नहीं था कि वे उनकी संपत्ति चाहते थे। बल्कि यह कि जयदेव ने दूसरी शादी की थी। इतना ही नहीं जयदेव शादी के बाद घर छोड़कर चले गए थे। इस बात से बाला साहेब को सदमा पहुंचा और उन्होंने जयदेव से बात करना बंद कर दिया। 

साल 1996 में बाला साहेब और मीना ठाकरे के बड़े बेटे बिंदु माधव का निधन हो गया। दुख के इस क्षण में जयदेव भी अपने घर आएं। इस दौरान बाला साहेब को लगा कि जयदेव सब भुलाकर घर वापस आ जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कुछ दिन बाद ही जयदेव फिर से घर से चले गए।  लगातार घर से दूर रहने के कारण वह पिता के गुस्से की जद में आते गए।

मीडिया ने जब भी जयदेव से कुछ जानने की कोशिक की उन्होंने चुप्पी साधना ही बेहतर समझा और कोई कमेंट नहीं किया। साल 2012 में बीमारी के चलते बाला साहेब लंबे समय तक लीलावती अस्पताल में भर्ती रहे। इस दौरान देश दुनिया की तमाम बड़े लोग बाला साहब का हाल जानने अस्पताल पहुंचे। लेकिन जयदेव एक बार भी अपने पिता को देखने नहीं आए। बीमारी के दौरान बाला साहेब ने खुद कहा कि जयदेव मुझे देखने नहीं आया, इसलिए मैं उससे बीमार हूं। 

बाप और बेटे की यह नाराजगी प्यार में बदलती। इससे पहले बाला साहेब ठाकरे 17 नवम्बर 2012 को 87 साल की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए। इसके बाद परिवार में चल रहा संप​त्ति का विवाद हाईकोर्ट तक पहुंच गया। उद्धव ने जनवरी 2014 में प्रोबेट पिटीशन दाखिल की, इस तरह की याचिका आमतौर पर दिवंगत व्यक्ति की वसीयत को कोर्ट से सत्यापित कराने के लिए दाखिल की जाती है।

उद्धव के मुताबिक बाला साहेब जो संपत्ति छोड़कर गए उसकी कीमत 14.85 करोड़ है वहीं जयदेव कहते हैं कि सिर्फ मातोश्री बंगला ही 40 करोड़ रुपए का है। कुल संपत्ति जोड़ दी जाए तो वह 100 करोड़ को पार कर जाएगी। अपने ही भाई उद्धव पर आरोप लगाते हुए जयदेव कहते हैं कि आखिरी वक्त में पिता की दिमागी हालत ठीक नहीं थी, वह वसीयत को कागजों पर दस्तखत करने की स्थिति मे नहीं थे पर परिवार के ही बाकी लोगों ने वसीयत के कागज अंग्रेजी में बनवाकर उसपर बाला साहेब से मराठी में दस्तखत करवा लिया। 

जयदेव ने यह भी सवाल उठाया कि पिता ने अपना जीवन मराठी लोगों और भाषा को समर्पित किया तो फिर उनकी वसीयत अंग्रेजी में क्यों बनाई गई। बहरहाल यह मामला अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है। इतने सालों में काफी कुछ बदल गया, उद्धव आज शिवसेना को लीड कर रहे हैं, वहीं जयदेव राजनीति से दूर अपनी अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

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