B.V. Nagarathna: सुप्रीम कोर्ट की जज बी. वी. नागरत्ना बोलीं ECI का नहीं होना चाहिए किसी राजनीतिक दल के प्रति झुकाव

सुप्रीम कोर्ट की जज बी. वी. नागरत्ना बोलीं ECI का नहीं होना चाहिए किसी राजनीतिक दल के प्रति झुकाव

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में चुनाव की निष्पक्षता को लेकर हमेशा सवाल उठाते रहे हैं। सदैव यह आरोप लगते रहे हैं कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ बीजेपी को लेकर बेहद नर्म है, और विपक्ष को लेकर गर्म। देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट की महिला न्यायाधीश बी. वी. नागरत्ना ने शनिवार (4 अप्रैल) को बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को जैसी संवैधानिक संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए। उसका किसी राजनीतिक दल के प्रति झुकाव नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश चुनाव आयोग पर क्या बोलीं?

नागरत्ना ने कहा "चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली घटनाएं नहीं हैं। वे एक ऐसा तंत्र हैं जिसके माध्यम से राजनीतिक सत्ता का गठन होता है। हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने यह भली-भांति सिद्ध किया है कि समय पर चुनाव होने के कारण सरकार में परिवर्तन सुचारू रूप से होते हैं। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का अर्थ वास्तव में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तों पर ही नियंत्रिण है।"

यूनिर्वर्सिटी में नागरत्ना ने अपने भाषण में क्या कहा?

पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिर्वर्सिटी में अधिकारों से परे संविधानवाद संरचना क्यों मायने रखती है, इस विषय पर एक कार्यक्रम रखा गया था। जस्टिस बीवी नागरत्ना इसमें हिस्सा लेने पहुंची थीं। इस दौरान उन्होंने डॉ राजेंद्र प्रसाद स्मारक पर व्याख्यान दिया। बार एंड बेंच के अनुसार नागरत्ना ने कहा कि चुनाव आयोग (ECI) , नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और वित्त आयोग (Finance Commission) का डिजाइन एक जैसा है। ये संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त हैं, इसलिए इन्हें ऐसा काम सैंपा गया है जहां निष्पक्षता से काम होता है। आगे उन्होंने कहा "यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य करें और राजनीतिक प्रक्रिया से प्रभावित न हों। चुनाव आयोग की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि यह ऐसा तंत्र है जिसके द्वारा देश का नेतृत्व करने वाला नेता चुना जाता है।

उन्होंने कहा सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक महत्वपूर्ण संवैधनिक संस्था के रूप में मान्यता दी है। एक बार फिर चिंता का विषय ढांचागत था। यदि चुनाव कराने वाले लोग उन लोगों पर निर्भर हों जो चुनाव लड़ते हैं, तो इस प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती है।

इतिहास से चाहिए सबक लेना

इतिहास गवाह है जब संवैधानिक ढांचे का पतन तब होता है जब उसकी संरचना को कमजोर कर दिया जाता है। संरचना का विघटन उस समय हो जाता है जब संस्थाएं एक-दूसरे पर निगरानी रखना बंद कर देती हैं। अदालते चलती रहती हैं, संसद से कानून पारित होते रहते हैं और सत्ता पर कोई अंकुश नहीं रहता, क्योंकि ढांचागत अनुशासन अब मौजूद नहीं रहता।

Created On :   4 April 2026 7:54 PM IST

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