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सूबे में दो वर्गों में बंटे हैं 'पटेल', जानें क्या है इनकी अहमियत ? 

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 15th, 2017 10:29 IST

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डिजिटल डेस्क, अहमदाबाद। गुजरात चुनाव के दूसरे और आखिरी दौर के लिए वोटिंग शुरू हो चुकी है। जिस तरह से बीजेपी और कांग्रेस ने खुद को यहां प्रचार में झोंका, उसके बाद पूरे देश की निगाहें गुजरात में हो रहे चुनाव पर है। चुनावी नतीजे 18 दिसंबर को आएंगे। इस बार के चुनाव उतने आसान नहीं हैं, जितने पहले के थे, क्योंकि इस बार गुजरात की आबादी का 22-23% हिस्सा यानी पाटीदार बीजेपी से नाराज चल रहे हैं और ये वही पाटीदार हैं, जो किसी भी पार्टी को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। आइए जानते हैं, गुजरात में पाटीदार या पटेल कितनी अहमियत रखते है।


1 करोड़ से ज्यादा पटेल हैं गुजरात में

गुजरात विधानसभा चुनाव में इस बार 4 करोड़ 35 लाख से ज्यादा वोटर्स हैं और इसमें से भी 1 करोड़ से ज्यादा तो पटेल ही हैं। इतनी ज्यादा संख्या में होने के कारण ही पटेलों की गुजरात में राजनीतिक अहमियत ज्यादा है। अगर देखा जाए, तो गुजरात में 22-23% की आबादी पटेल या पाटीदारों की है और ये सभी वोट किसी एक पार्टी को चले जाएं, तो वो आसानी से राज्य में सरकार बनाने में कामयाब हो सकती है। हालांकि ये सभी वोट किसी एक पार्टी को मिलेंगे, ये नहीं कहा जा सकता। फिर भी, गुजरात में पटेलों के वोट बहुत मायने रखते हैं।

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दो वर्गों में बंटे हैं पटेल

गुजरात में पाटीदार या पटेल कम्युनिटी दोवर्गों में बंटी हुई है। पहला- कड़वा पाटीदार पटेल और दूसरा- लेउवा पाटीदार पटेल। पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल भी कड़वा पटेल हैं और मौजूदा बीजेपी सरकार में भी कड़वा पटेल नेताओं की संख्या ज्यादा हैं। कड़वा पटेल गुजरात के मेहसाणा, अहमदाबाद, कड़ी-कलोल और विसनगर इलाके में पाए जाते हैं, तो वहीं लेउवा पटेल सौराष्ट्र-कच्छ इलाके के राजकोट, जामनगर, भावनगर, अमरेली, जूनागढ़, पोरबंदर और सुरेंद्र नगर में इनकी आबादी ज्यादा है। कड़वा पटेलों की कुलदेवी उमियामाता हैं, जबकि लेउवा पटेल खोड़ियार माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं। तो अगर देखा जाए तो, 1 करोड़ पाटीदार वोटर्स में से 60% कड़वा पटेल, तो 40% लेउवा पटेल हैं।

अब तक 7 मुख्यमंत्री पटेल कम्युनिटी से

1960 के दशक में गुजरात के राज्य बनने के बाद से ही यहां पर पटेलों का वर्चस्व रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 57 साल के इतिहास में गुजरात में 16 में से 7 मुख्यमंत्री पटेल कम्युनिटी के रह चुके हैं। इसमें राज्य की पहली पटेल महिला मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल का नाम भी शामिल है। शुरुआत में पटेलों को उतनी अहमियत नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे। हालांकि बाद में 70 के दशक में पटेलों ने गुजरात में अपनी पकड़ मजबूत बनाई और राजनीतिक और सामाजिक बागड़ोर संभालने की शुरुआत की।

सोलंकी ने खत्म किया पटेलों का वर्चस्व

1980 के दशक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने राज्य में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की मांग की। जिसके बाद राज्य में दंगे भड़क गए और सोलंकी को इस्तीफा देना पड़ गया। अब तक राज्य में पटेल काफी मजबूत बन चुके थे। इनको कमजोर करने के लिए माधवसिंह सोलंकी ने एक नई चाल चली, जिसको खाम (KHAM) थ्योरी कहा जाता है। इसमें K से क्षत्रिय, H से हरिजन, A से आदिवासी और M से मुस्लिम है। इस थ्योरी को अपनाने के बाद माधवसिंह सोलंकी एक बार फिर से 182 में से 149 सीटें जीतकर मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद से कांग्रेस ने हर बार खाम थ्योरी का ही इस्तेमाल किया।

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बीजेपी ने आगे किया पटेलों को

माधवसिंह सोलंकी की खाम थ्योरी ने उन्हें सत्ता में तो पहुंचा दिया, लेकिन ये ज्यादा सालों तक कामयाब नहीं हो पाई। 1990 के समय रामजन्मभूमि आंदोलन की वजह से देश में हिंदुत्व की लहर उठ चुकी थी और गुजरात में इसका काफी असर था। क्योंकि बीजेपी ने राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए अपनी यात्रा सोमनाथ मंदिर से ही शुरू की थी। इसके बाद गुजरात में नजरअंदाज किए जा रहे पटेलों को रिझाने के लिए बीजेपी ने 1995 में केशुभाई पटेल को आगे किया। केशुभाई को आगे करने से बीजेपी को फायदा मिला और पहली बार वो गुजरात में अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसके बाद से पाटीदार-पटेलों की वोट की बदौलत बीजेपी 1998 के बाद से अब तक लगातार 4 बार सरकार बना चुकी है।

इस बार क्या होगा? 

गुजरात में 2017 में 1 करोड़ से ज्यादा पाटीदार वोटर्स हैं। अब तक इन पाटीदार के 80-85% वोट बीजेपी को मिलते आए हैं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 15-20% वोट ही मिलते हैं। जिस वजह से वो सरकार बनाने में नाकाम रही है। हालांकि इस बार पाटीदारों के वोट कांग्रेस को मिलने की उम्मीद है। साल-2015 में पाटीदार अनामत आंदोलन समिति की तरफ से किए गए आंदोलन के बाद से राज्य में पाटीदार बीजेपी से नाराज बताए जा रहे हैं। इस आंदोलन में हार्दिक पटेल पाटीदारों के नेता बनकर उभरे और वो हर मोर्चे पर बीजेपी का कड़ा विरोध करते नजर आए हैं। बीजेपी भी इस बात को अच्छे से जानती है कि इस बार के चुनाव में उसके पाटीदार वोट खिसक सकते हैं, उसके बावजूद वो पाटीदारों को रिझाने की कोशिश में लगी हुई है।

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क्या कांग्रेस के साथ हैं पटेल? 

गुजरात में हार्दिक पटेल जैसे पाटीदार नेताओं ने भले ही कांग्रेस को अपना समर्थन दे रखा है, लेकिन इसके बावजूद ये कहना कि पटेल कांग्रेस के साथ है, शायद गलत होगा। हार्दिक पटेल के साथ प्रदेश का एक बड़ा युवा वर्ग भले ही कांग्रेस के साथ हो, लेकिन पाटीदार-पटेलों के बड़े-बुजुर्ग आज भी बीजेपी के साथ हैं। इसकी वजह है- माधवसिंह सोलंकी की खाम थ्योरी। गुजरात में आज भी पाटीदार-पटेलों का मानना है कि कांग्रेस की खाम थ्योरी ने पटेलों को जितना नुकसान पहुंचाया है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है।

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तो किसके साथ हैं पटेल? 

पटेल, इस वक्त हार्दिक पटेल के साथ हैं, लेकिन कांग्रेस को समर्थन देने के कारण वो कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। गुजरात में हार्दिक पटेल एक बड़े पाटीदार नेता बनकर उभरे हैं। हार्दिक कड़वा पटेल हैं और पाटीदारों में इनकी आबादी 60% है। माना जा रहा है कि अब तक जो 80-85% पाटीदार-पटेलों के वोट बीजेपी को जाते थे, उसमें हार्दिक पटेल सेंध लगाने की सोच रहे हैं। जिसमें वो काफी हद तक कामयाब भी हुए हैं। बीजेपी भी खुद इस बात को मानती है, लेकिन वो इस बात से इनकार नहीं करती कि पाटीदार-पटेल उसके साथ नहीं है। गुजरात में इस बार अगर पाटीदार-पटेलों के 50-50% या फिर 40-60% वोट बीजेपी और कांग्रेस में बंट जाते हैं, तो फिर इस बार राज्य में बड़ा राजनीतिक परिवर्तन देखने को मिलेगा।

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