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लोहड़ी से होती है किसानों के फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत

BhaskarHindi.com | Last Modified - September 06th, 2018 15:30 IST

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डिजिटल डेस्क । 13 जनवरी को देशभर में लोहड़ी का त्‍योहार मनाया जा रहा है। ये पर्व मकर संक्रांति से एक द‍िन पहले आता है। पंजाबियों और सिखों के लिए लोहड़ी खास मायने रखती है। लोहड़ी के कुछ दिन पहले ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है। पंजाब राज्य के अतिरिक्त ये त्यौहार हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भी काफी उत्साह से मनाया जाता है। बच्चे इस अवसर पर कंडे और लकड़ी जमा करते हैं, जिनके घर में नई नई शादी होती है बच्चे उनके घरों से पैसे आदि लेकर मूंगफली ,गजक ,गुड़ पट्टी आदि खरीदते हैं। अलाव जलाकर उसके चारों ओर भांगड़ा करते हैं। जलती हुई आग में तिल गुड और मूंगफली आदि का भोग लगाते हैं और उपस्थित लोगों को भी मूंगफली,रेवड़ी आदि बांटते हैं। वहीं दक्षिण भारत में ये पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है। लोग ये मानते हैं कि इस पर्व को उस दिन मनाया जाता है, जब सर्दियों में ये साल का सबसे छोटा दिन और रात साल की सबसे बड़ी रात होती है, लेकिन ये केवल मान्यता है, क्योंकि साल का सबसे छोटा दिन और रात 21 दिसंबर को होता है। 

क्यों मनाते है लोहड़ी?

पारंपरिक तौर पर लोहड़ी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुड़ा एक विशेष त्यौहार है। इस दिन बॉनफायर की तरह आग का एक अलाव जलाकर उसके इर्दगिर्द नृत्य किया जाता है। पंजाब में लड़के जहां भांगड़ा पाते हैं, वहीं लड़कियां और महिलाएं गिद्धा नृत्य करती है। लोहड़ी के अलाव के आसपास लोग इकट्ठे होकर दुल्ला भट्टी की प्रशंसा में गायन भी करते है, जो पंजाब के लोक पात्र हैं। 

लोहड़ी से जुड़ी मान्यताएं?

अनेक लोग मानते हैं कि लोहड़ी शब्द ‘लोई (संत कबीर की पत्नी) से उत्पन्न हुआ था, लेकिन अनेक लोग इसे तिलोड़ी से उत्पन्न हुआ मानते हैं, जो बाद में लोहड़ी हो गया। वहीं कुछ लोग ये मानते है कि ये शब्द 'लोह' से उत्पन्न हुआ था, जो रोटी बनाने के लिए प्रयुक्त एक उपकरण है। 

इस पर्व को मनाने के पीछे एक विश्वास ये भी है लोहड़ी का जन्म होलिका की बहन के नाम पर हुआ। लोग मानते है कि होलिका की बहन बच गई थी, हालांकि होलिका खुद आग में जल कर मर गई थी। वहीं किसान इस दिन से अपने नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत करते हैं और लोहड़ी मनाते हैं।

क्या है लोहड़ी की कथा ?

कहा जाता है की सुंदरी और मुनरी नाम की दो बहनें थी। बचपन में ही उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया था। जवान होने पर उनके चाचा उन्हें किसी राजा के हाथों बेच देना चाहते थे। इसकी जानकारी दुल्ला भट्टी नामक एक डाकू को हुआ। दुल्ला भट्टी ने जालिमों से इन बच्चियों को बचाकर जंगल में लाया और उनके पिता बनकर उनका विवाह योग्य वर से वहीं आग जलाकर के सात फेरे करवाए। चूंकि शादी जल्दी में हुई, दुल्ला को उस समय देने के लिए कुछ भी नही था अतः लड़कियों के आंचल में एक एक सेर गुड़ डालकर विदा किया। तब से लोहड़ी का त्यौहार मनाने की प्रथा चली आ रही है, जिसे पूरे देश में हर्षोलास के साथ मनाया जाता है। 

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