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रंगपंचमी 2018 : देवताओं का आशीर्वाद माना जाता है रंगपंचमी, जानिए क्यों मनाते हैं ये पर्व

March 05th, 2018 23:58 IST

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आज भारत के हर एक हिस्से में रंग पंचमी का पावन पर्व अपनी एक अलग ही मान्यता के साथ मनाया जा रहा है। यह रंग पंचमी का त्योहार होली के पांच दिन बाद मनाया जाता है। इस रंग पंचमी त्योहार को देवताओं के आशीर्वाद के रूप में अधिक मनाया जाता है। यह पर्व देश के कई क्षेत्रों में चैत्र मास की कृष्ण पंचमी को मनाया जाता है। इस साल 2018 में होली का त्योहार 2 मार्च को मनाया गया था।

बता दें कि रंग पंचमी का यह पावन पर्व मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के साथ देश के कुछ हिस्सों में भी बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। बात करें मध्य प्रदेश की तो यहां के मालवा क्षेत्र में होली की अपेक्षा रंग पंचमी का त्योहार ज्यादा धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। मालवा के इंदौर, उज्जैन, शाजापुर, देवास, ब्यावरा, मंदसौर और रतलाम में गेर भी निकाली जाती है। गेर का मतलब पूरे शहरभर के नागरिक रंग लेकर एक विशाल जुलूस के साथ पूरे नगर में भ्रमण करते हैं और पूरे शहर को रंगमय बना देते हैं। इस दौरान प्रशासन अपनी पूरी तैयारी के साथ तैनात रहता है।

रंग पंचमी पर बनता है पूरनपोली पकवान
रंग पंचमी मछुआरों के लिये भी बहुत खास होता है, इस दिन सभी नाचने गाने में मस्त होते हैं। रंग पंचमी पर एक विशेष प्रकार का मीठा पकवान भी घरों में बनाया जाता है, जिसे पूरनपोली कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मानें तो रंग पंचमी के जरिए एक प्रकार से तेजोमय सगुण स्वरूप का रंगों के माध्यम से भी आह्वान भी किया जाता है। रंगपंचमी अनिष्टकारी शक्तियों पर विजय पाने का उत्सव भी है।

देवताओं का आशीर्वाद है रंगपंचमी
रंग पंचमी कोकण क्षेत्र का खास त्यौहार है। महाराष्ट्र में तो होली को ही रंग पंचमी कहा जाता है। इसके पीछे की मान्यता यह है कि इस दिन जो भी रंग इस्तेमाल किए जाते हैं या फिर जिन्हें एक दूसरे पर लगाया जाता है, हवा में उड़ाया जाता है उससे विभिन्न रंगों की ओर देवता आकर्षित होते हैं। पौराणिक मान्यता यह भी है कि इससे ब्रह्मांड में सकारात्मक तंरगों का संयोग बनता है व रंग कणों में संबंधित देवताओं के स्पर्श की अनुभूति होती है। यही कारण है कि इस पर्व को देवताओं के रंगों से भरे आशीर्वाद के रूप में भी देखा जाता है।

आध्यात्मिक मान्यता
दरअसल इस पर्व से जुड़ी ऐसी आध्यात्मिक मान्यता है कि इस दिन वातावरण में उड़ते हुए गुलाल व्यक्ति के सात्विक गुणों में अभिवृद्धि करते हैं और उसके तामसिक और राजसिक गुणों का नाश होता है। सतोगुण की स्थिति व्यक्ति को तभी हासिल होती है जब उसके तामसिक और राजसी प्रवृत्तियां कम होती है। जब एक व्यक्ति के जीवन में जैसे जैसे तामसिक और राजसिक प्रभाव कम होते हैं, उसके सात्विक स्वरूप में उतना ही निखार आता है। व्यक्ति का स्वरूप सात्विकता की तरफ अग्रसर होता है, जिससे उसके भौतिक और आध्यात्मिक मार्ग की हर बाधाएं दूर होती है।

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