राजस्थान: कैबिनेट विस्तार पर फंसी कांग्रेस, पंजाब की तर्ज पर चल सकती है बड़ी चाल, मिल सकती है किसी तीसरे को कमान!

November 11th, 2021

हाईलाइट

  • मंत्रिमंडल विस्तार में कांग्रेस की नई रणनीति

डिजिटल डेस्क, जयपुर। राजस्थान की गहलोत सरकार में जल्द ही कैबिनेट विस्तार देखने को मिल सकता है। इसी सिलसिले में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात हुई। सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच की तनातनी इस कैबिनेट विस्तार में नजर आ सकती है। और गहलोत मंत्रिमंडल विस्तार गद्दी के गणित, गठजोड़ और अपनी अपनी ताकत दिखाने का मैदान बन सकता है। इससे पहले भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट के रिश्ते सियासत की सुर्खियों में जगजाहिर हो चुके हैं। इस बीच अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 25 सीटों के हिसाब से कांग्रेस यहां आदिवासी मुखिया भी बना सकती है। जिसे बीजेपी के गौरव जनजातीय दिवस का तोड़ माना जा सकता है। वैसे राजस्थान में एससी एसटी आरक्षित सीट सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।   

विवाद से बचने का फॉर्मूला

गहलोत और पायलट गुट के कई विधायक मंत्री बनने की इच्छा रखते हैं, लेकिन सभी का नंबर आना संभव नहीं है। ऐसे में जिनको मंत्री नहीं बनाया जा सकेगा उन्हें बोर्ड, निगमों और स्वायत्त संस्थाओं में पद दिया जा सकता है। अशोक गहलोत को सचिन पायलट के समर्थक विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने की हिदायत दी गई है।

कैबिनेट विस्तार, विवाद की आशंका

गहलोत कैबिनेट विस्तार में विवाद की आशंका जताई जा रही है। खबरों के मुताबिक राजस्थान में 12 नवंबर को मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। कैबिनेट विस्तार एक बार फिर तकरार की जमीन बन रहा है। पायलट की चाहत मुख्यमंत्री बनने की है और गहलोत की कुर्सी नहीं छोड़ने की। साथ ही पायलट पूरी दमखम लगाए हुए हैं कि अपने समर्थित विधायकों को ज्यादा से ज्यादा मंत्रिमंडल में शामिल करवा सकें।

आलाकमान के पास तीन विकल्प

सीएम अशोक गहलोत और सचिन पायलट की बुधवार को दिल्ली में आलाकमान से हुई मुलाकात को राजस्थान के सियासी चश्में से देखा जा रहा है। कांग्रेस एक तरफ पंजाब और मध्यप्रदेश में बने हालातों को राजस्थान में नहीं देखना चाहती, इसलिए वह दोनों नेताओं को नाराज नहीं करना चाहेगी।  कांग्रेस यहां दूध का जला दही को भी फूंक फूंक कर पीने की कहावत पर गौर करते हुए फैसले ले सकती है। कांग्रेस के पास तीन रास्ते है। पहला कांग्रेस सीएम गहलोत के नेतृत्व में ही रहे और पायलट को भरोसे में लेकर ज्यादा से ज्यादा पायलट समर्थक विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह  दें, दूसरा यदि कांग्रेस सचिन को सीएम बनाती है तो गहलोत से सहमति लेनी होगी। अन्यथा गहलोत अमरिंदर भी बन सकती है और पार्टी से बगावत कर सकते हैं। वहीं यदि सचिन की आलाकमान ने फिर से अनदेखी की तो सचिन मध्यप्रदेश के सिंधिया की तरह राजस्थान के सिंधिया बन सकते है और पार्टी से हटकर बीजेपी में शामिल हो सकते है। कांग्रेस इस संकट से निकलने के लिए तीसरा रास्ता भी अपना सकती है हो सकता है पंजाब की तर्ज पर किसी तीसरे के हाथों में राजस्थान के मुखिया की गद्दी दे दें। क्योंकि राजस्थान के जातिगत समीकरण बड़े पेचीदा हैं। बीएसपी से कांग्रेस में आए विधायकों को ना जोड़े को कांग्रेस के पास यहा कोई ज्यादा बड़ा बहुमत नहीं है। बीजेपी एक तरफ जनजातीय गौरव दिवस बनाकर आदिवासी वोट को लुभावने का प्रयास करने जा रही है तो कहीं उसकी कटाक्ष में कांग्रेस राजस्थान में किसी आदिवासी को सीएम बना दें। इसका असर राजस्थान समेत कई आदिवासी बाहुल्य वाले प्रदेशो में कांग्रेस पार्टी को फायदा पहुंचा सकती है।