दैनिक भास्कर हिंदी: Rajasthan Political Crisis: कोरोना काल में विधानसभा सत्र बुलाने को लेकर ये कौन-सा 'खेल' चल रहा है? विस्तार से जानें

July 29th, 2020

डिजिटल डेस्क, जयपुर। लोकतंत्र की हत्या हो गई, लोकतंत्र के लिए काला दिन, ये लाइन कहता कोई न कोई नेता आपको महीने-दो-महीने में टीवी पर दिख जाता है। लोकतंत्र की इन हत्याओं में कातिल बताई जाती है केंद्र सरकार या फिर कुछ मामलों में राज्य सरकारों पर भी विपक्षी पार्टियां आरोप लगती हैं। अभी ताजा मामला राजस्थान का है, जहां कांग्रेस की भाषा में कहें तो राज्यपाल केंद्र सरकार के कहने पर लोकतंत्र का कत्ल कर रह हैं। वैसे राजनीतिक मायनों में कत्ल या मर्डर इतना डरावना नहीं लगता, क्योंकि लगातार सुनने की आदत हो गई है। आज कोई कांग्रेस का नेता कहता है कि लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो उसे तुरंत याद दिला दिया जाता है कि चुनी हुई राज्य सरकारों को गिराने वाली रवायत पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने से शुरू हो गई थी। उदाहरणों से किताबें भरी पड़ी हैं।

अब ये जिम्मेदारी भारतीय जनता पार्टी के हिस्से आ गई है। अरुणाचल प्रदेश और मध्यप्रदेश से होते हुए बात राजस्थान पहुंच गई है। कांग्रेस कह रही है कि राज्यपाल अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां ठीक से नहीं निभा रहे हैं। मुख्यमंत्री कह रहे हैं सदन का सत्र बुलाईए, लेकिन राज्यपाल टालमटोल कर रहे हैं। कौन सही है, कौन गलत थोड़ा संवैधानिक पहलु से समझते हैं।

राज्यपाल कौन होता है और क्या काम करता है?
पहले तो ये समझते हैं कि आखिर राज्यपाल कौन होता है। संविधान के छठवें भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका के बारे में बताया गया है। राज्य कार्यपालिका में शामिल होते हैं राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद और राज्य के महाधिवक्ता। राज्यपाल किसी राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है या कहिए कि संवैधानिक मुखिया होता है, जैसे देश का संवैधानिक मु​खिया होता है राष्ट्रपति। राज्यपाल राज्य में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। इस तरह से राज्यपाल का कार्यकाल दोहरी भूमिका में होता है। केंद्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति राज्यपाल नियुक्त करता है। राज्यपाल का काम या शक्तियों को चार हिस्से में बांट सकते हैं। पहला कार्यकारी शक्तियां, दूसरा विधायी शक्तियां, तीसरा वित्तिय शक्तियां और अंत में चौथा न्यायायिक शक्तियां। कार्यका​री शक्तियों में आता है राज्य के सभी कार्यकारी फैसले, जो औपचारिक तौर पर राज्यपाल के नाम पर लिए जाते हैं या मुख्यमंत्रियों या अन्य मंत्रियों को नियुक्त करते हैं। 

''फिलहाल राजस्थान में मुख्य मुद्दा राज्पाल की विधायी शक्तियों को लेकर चल रहा है। जिसमें सबसे अहम काम सदन का सत्र बुलाना होता है। और राज्यपाल की इन्ही शक्यिों को लेकर सबसे ज्यादा विवाद होते हैं। राजस्थान का मौजूदा झगड़ा भी इसी बात को लेकर है।''

सदन का सत्र कौन बुला सकता है
इस बारे में हमारे संविधान के अनुच्छेद में 174 में जानकारी मिलती है। इसके अनुसार सदन का सत्र बुलाने की शक्ति राज्य के राज्यपाल के पास होती है। राज्यपाल समय-समय से अपने विवेक से उचित समय पर सदन का सत्र बुला सकते हैं। लेकिन, दो सत्रों के बीच का समय छह महीने से ज्यादा नहीं होना चाहिए। ''अब अनुच्छेद में 174 में तो सदन बुलाने को लेकर राज्यपाल के विवेक की बात है। लेकिन, राज्यपाल का विवेक निहित है मंत्रिमंडल में और इसका जिक्र अनुच्छेद 163 में मिलता है। इसके मुताबिक राज्यपाल कैबिनेट की सलाह पर ही काम करते हैं। अनुच्छेद 163 के पहले हिस्से में लिखा है कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति सीमित है। सिर्फ वो उन कुछ मामलों में ही अपनी मर्जी से फैसले ले सकते हैं, जहां संविधान उन्हें स्वतंत्र फैसले लेने का हक देता है। और, इसलिए यह माना जाता है कि राज्यपाल सदन का सत्र बुलाने या न बुलाने का फैसला वो खुद नहीं ले सकते। वो मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करते हैं। बात यहां पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, थोड़ी अस्पष्टता रहती है और इसकी वजह से कई बार राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच झगड़े होते हैं। और, फिर झगड़े सुलझाने आता है कोर्ट। 

तो सदन का सत्र बुलाने को लेकर कोर्ट की क्या राय है...
सत्र के झगड़े की नौबत 2016 में उत्तराखंड में आई थी, जब कांग्रेस के 9 विधायक बागी हो गए और विपक्षी पार्टी भाजपा से जा मिले थे। तब मुख्यमंत्री कांग्रेस के हरीश रावत थे। भाजपा ने राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा किया था। राज्यपाल ने अगले दिन ही हरीश रावत से बहुमत साबित करने के लिए कहा था। फिर विधानसभा के स्पीकर ने बागी विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी और राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी। राष्ट्रपति शासन लगा तो मामला हाई कोर्ट में गया। हाई कोर्ट ने सत्ताधारी पार्टी को बहुमत परिक्षण का मौका दिए बिना राष्ट्रपति शासन लगाने को गलत बताया। 

मुख्यमंत्री की सलाह पर ही सदन बुलाने का फैसला कर सकते हैं राज्यपाल
हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि अगर बहुमत पर सवाल है तो जितना जल्दी हो सके बहुमत का परिक्षण कराना चाहिए। ये बात तब है ज​ब सरकार पर अल्पमत होने के सवाल उठ रहे हों। लेकिन, सामान्य तौर पर सदन बुलाने को लेकर कोर्ट क्या कहता है? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक ​फैसला मिलता है। 2016 में सु​प्रीम कोर्ट की संवैधानिक बैंच ने अरुणाचल प्रदेश के एक मामले में कहा था कि सदन के सत्र को बुलाने की पूरी शक्ति सिर्फ राज्यपाल में ​निहित नहीं होती। इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि हमारे संविधान निर्माता ये नहीं चाहते थे कि सदन बुलाने या भंग करने जैसी सारी शक्तियां सिर्फ राज्यपाल में निहित हों। कोर्ट ने इस फैसले में कहा था कि राज्यपाल सदन बुलाने या भंग करने जैसे फैसले मंत्रिपरिषद के मुखिया यानी मु​ख्यमंत्री की सलाह पर ही कर सकते हैं। खुद से ऐसे फैसले नहीं ले सकते। लेकिन इस फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि बहुमत पर सवाल उठे हों तो राज्यपाल खुद से भी सदन बुलाने या भंग करने पर फैसला ले सकते हैं। 

'इस बारे में सविधान विशेषज्ञ गौतम ​भाटिया ने बताया कि अगर मंत्रिमंडल की ये सलाह है कि विधानसभा आयोजित की जाए तो राज्यपाल इस पर इंकार नहीं कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि केवल एक दो स्थितियां हैं जब राज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह मानने से इंकार कर सकते हैं। एक इसका उदाहरण ये है कि राज्यपाल को ये शक हो कि जो सत्ताधारी पार्टी है वह बहुमत खो बैठी है, लेकिन राजस्थान की इस स्थिति में ऐसा कोई आरोप नहीं है। इसलिए अगर मंत्रिमंडल ने सदन बुलाने की सलाह दी है तो राज्यपाल को इसका पालन करना ही होगा।'

अब समझिए राजस्थान की उठापटक
अब बात करते हैं राजस्थान की, यहां मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि विधानसभा का सत्र बुलाइए और राज्यपाल बुलाने को राजी नहीं है। मना नहीं कर रहे बस टाल रहे हैं। सरकार से सदन बुलाने की वजह पूछ रहे हैं। अब यहां गहलोत सरकार ने बहुमत खो दिया हो ऐसा भी नहीं दिख रहा है। क्योंकि न तो विपक्षी पार्टी भाजपा और न ही बागी विधायक बहुमत परिक्षण की मांग कर रहे हैं। यानी सब मान रहे हैं कि गहलोत के पास बहुमत है। गहलोत भी यह नहीं कह रहे हैं कि वे सदन में बहुमत परिक्षण करना चाहते हैं। बस कोरोना पर बहस के नाम पर विधानसभा का सत्र बुलाने की मांग कर रहे हैं।

गहलोत क्यों बुला रहे सदन और क्यों टाल रहे राज्यपाल?
गहलोत सत्र बुलाने की मांग इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि वे सदन बुलाने के नाम पर विधायकों को सदन में शामिल होने के लिए व्हिप जारी करेंगे। और, यदि बागी विधायक व्हिप का उल्लंघन करते हैं तो स्पीकर के पास विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मजबूत और वैधानिक वजह होगी। अभी कोर्ट सदस्यता रद्द करने पर अड़ंगा लगा रहा है, क्योंकि व्हिप विधानसभा के बाहर जारी हुई थी। ये चाल भाजपा भी समझ रही है। इसलिए भाजपा यानी की केंद्र सरकार सदन बुलाने को लेकर देरी कर रही है। केंद्र सरकार मतलब समझिए कि राज्यपाल के फैसले। ये सेट प्रेक्टिस है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के मु​ताबिक ही फैसले लेते हैं और राजस्थान में राज्यपाल सदन बुलाने का मन नहीं बना पा रहे हैं। व​जह कोरोना को बता रहे हैं और सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। यही नहीं राजस्थान सरकार से 21 दिन के नोटिस की बात भी कह रहे हैं। 

राजस्थान सरकार ने विशेष विधानसभा सत्र के लिए राज्यपाल को तीसरा प्रस्ताव भेजा
अब एक बार​ फिर सीएम गहलोत ने राज्यपाल से सदन बुलाने की मांग की है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निवास पर मंगलवार को मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जिसमें राजस्थान विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने को लेकर राज्यपाल कलराज मिश्र की आपत्तियों पर चर्चा हुई। बैठक ढाई घंटे तक चली। गहलोत की टीम ने अपने जवाब का मसौदा तैयार किया और 31 जुलाई को विशेष विधानसभा सत्र बुलाने के लिए तीसरी बार उनसे अनुरोध करते हुए राज्यपाल को पत्र भेजा। अब राज भवन के जवाब का इंतजार है। कैबिनेट की बैठक के तत्काल बाद परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खारियावास ने कहा कि सत्र बुलाने का हमारा कानूनी अधिकार है।

दो बार टाल चुके हैं सत्र बुलाने की मांग
उन्होंने कहा, राज्यपाल इस पर सवाल नहीं कर सकते, फिर भी हम उनके प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं। जहां तक 21 दिनों के नोटिस का प्रश्न है, 10 दिन पहले ही बीत चुके हैं, फिर भी राज्यपाल ने कोई तिथि जारी नहीं की है। यदि राज्यपाल ने इस बार भी हमारे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि देश में संविधान का शासन नहीं है। राज्यपाल विशेष विधानसभा सत्र की मांग के प्रस्ताव वाली राज्य सरकार की फाइल को दो बार लौटा चुके हैं। गहलोत सरकार लगता है कि 31 जुलाई से विशेष सत्र बुलाने पर अब अडिग है।

नेहरू के जमाने से चल रहा सरकार गिराने का खेल
1959 में केरल में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ईएमएस नम्बूदरीपाद की सरकार बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। केरल की यह सरकार दुनिया की पहली निर्वाचित ‘कम्युनिस्ट’ सरकार थी। कम्युनिस्ट कहीं भी चुनाव नहीं लड़ते थे उस वक्त। ये प्रयोग भारत में ही हुआ था। 1967 प​श्चिम बंगाल में राज्यपाल धर्मवीर ने अजॉय मुखर्जी की चुनी हुई सरकार बर्खास्त कर दी थी और कांग्रेस स​मर्थित पीसी घोष की सरकार बनवा दी थी। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहन सरकार के दौर में ऐसे खूब मामले आए जब केंद्र सरकार के कहने पर राज्यपालों ने विपक्षी पार्टी की सरकार नहीं बनने दी या राष्ट्रपति शासन लगा दिया। 

कांग्रेस ने आखिरी बार 2005 में गिराई थी राज्य में सरकार
ज्यादा पुरानी बात नहीं है, मनमोहन सरकार का ही एक उदाहरण देखते हैं। फरवरी 2005 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इसलिए मार्च के पहले हफ्ते में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। दो महीने बाद एनडीए ने 115 विधायकों के समर्थन का दावा किया। उस वक्त बिहार के राज्यपाल थे पूर्व कांग्रेसी नेता बूटा सिंह। बूटा सिंह ने राष्ट्रपति को बताया कि ऐसी सरकार बनाने से हार्स ट्रेडिंग यानी विधायकों की खरीद फरोख्त हो सकती है और विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर दी। राज्यपाल की सिफारिश पर आधी रात को केंद्रीय कैबिनेट ​की बैठक हुई, जिसमें बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव भी मौजूद थे। इसके बाद राज्यपाल की रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजी गई। राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम उस वक्त मॉस्को के दौरे पर थे। महज दो घंटे में राष्ट्रपति ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश मंजूर कर दी, क्योंकि कैबिनेट की सिफारिश थी और विधानसभा भंग हो गई, राष्ट्रपति शासन लग गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा भंग करने को अंसवैधानिक बताया था। ये कांग्रेस का उदाहरण था कि जब वे सत्ता में ​थे तो कैसे विपक्षी उन पर लोकतंत्र की हत्या के आरोप लगा रहे थे और क्या उदाहरण दे रहे थे।

 

 

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