सीईसी पर महाभियोग!: इंडिया गठबंधन के पास लोकसभा में 199 और राज्यसभा में 62 सांसद, प्रस्ताव पेश तो कर सकते हैं, पास कराना मुश्किल, समझिए पूरा नंबर गेम

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी कर रहा है। हालांकि विपक्ष के पास महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए दोनों सदनों में सांसदों की पर्याप्त संख्या है, लेकिन पास कराने के लिए जरूरी विशेष बहुमत यानि दो तिहाई सांसदों की संख्या जुटाना मुश्किल है। यदि कुल सदस्य सदन में मौजूद रहे तब लोकसभा में पास कराने के लिए 363 और राज्यसभा में 164 सांसद की जरूरत होगी। यह संख्या सदन में मौजूद सदस्यों की संख्या पर निर्भर रहती है। भारत में अभी तक किसी भी सीईसी को महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया है।
सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष तीसरी बार महाभियोग लाने की तैयारी में है। इसके लिए दोनों सदनों में नोटिस दिए जाने का प्रस्ताव है। उसके बाद लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति प्रस्ताव को स्वीकार कर सकते है या नहीं, यानी उनके स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यीय कमेटी बनाई जाती है। आपको बता दें संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सीईसी को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है। जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटा सकती है।
मार्च में विपक्ष लाया था महाभियोग प्रस्ताव
आपको बता दें सीईसी को हटाने के लिए मार्च में 193 विपक्षी सांसदों ने नोटिस दिया था, लेकिन अप्रैल में लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति ने बिना कार्यवाही आगे बढ़ाए इसको खारिज कर दिया था। मार्च 2026 में लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। विपक्ष ने इसमें 7 गंभीर आरोप लगाए थे, जिनमें कथित पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण, मिसबिहैवियर, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में बाधा डालना और SIR से बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने जैसे आरोप शामिल थे। लोकसभा में ऐसे नोटिस के लिए कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है। इस लिहाज से दोनों सदनों में आवश्यक संख्या पूरी थी। मौजूदा समय में भी महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए विपक्ष के पास पर्याप्त सांसद है।
इंडिया गठबंधन के पास सांसदों की संख्या
मौजूदा समय में इंडिया गठबंधन में कांग्रेस, सपा, टीएमसी, एनसीपी एसपी, शिवसेना यूबीटी, आरजेडी, जेएमएम, सीपीआईएम, सीपीआई, जेकेएनसी, आईयूएमएल, आरएसपी और अन्य छोटे सहयोगी है, इनकी कुल संख्या 225 के करीब है, ये संख्या घट और बढ़ भी सकती है क्योंकि डीएमके, शिवसेनी यूबीटी, टीएमसी एनसीपीएसी के कुछ सांसद इधर से उधर हो सकते है। जबकि राज्यसभा में डीएमके के 8 और आप के 3 सांसदों को छोड़ दिया जाए तो इंडिया गठबंधन के पास 62 सांसद है। वर्तमान में निम्न सदन लोकसभा में सांसदों की संख्या 543 है और राज्यसभा में सांसदों की संख्या 245 है।
विपक्ष के कई दल टूटे
टीएमसी , शिवसेना यूबीटी और अन्य दलों के सांसद टूटने के बाद इंडिया गठबंधन में सांसदों की संख्या 199 है। टीएमसी के 20 और शिवसेना यूबीटी के 6 सांसदों ने पाला बदल लिया था। इससे विपक्ष की सदन में संख्या बल कमजोर हुआ, हालांकि महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए अभी भी पर्याप्त है, लेकिन महाभियोग पास कराने अभी भी विपक्ष के लिए मुश्किल है।
सीईसी पर दो ईसी के आरोप
दो चुनाव आयुक्त की गंभीर आपत्तियों के बाद इंडिया गठबंधन में शामिल कई दलों के नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र बचाने के लिए सीईसी पर महाभियोग चले। अब विपक्ष के आरोप और पहले लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को दो चुनाव आयुक्तों की ओर से लगाई गई आपत्तियों से सही ठहराया जा रहा है।
आपको बता दें अगर सीईसी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो ये उनके खिलाफ दूसरी बार महाभियोग प्रस्ताव होगा। इससे पहले विपक्षी दलों ने इसी साल मार्च महीने में ज्ञानेश कुमाार के खिलाफ महाभियोग प्रपोजल संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया था।
मार्च महाभियोग प्रस्ताव पर आदेश
मार्च महाभियोग प्रस्ताव पर राज्यसभा सभापति ने अपने आदेश में कहा था कि विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोप राजनीतिक बहस के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन वे सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए जरूरी प्रथम दृष्टया आधार नहीं बनाते। लेकिन SIR को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट आने से विपक्ष के आरोप पुष्टि कर रहे हैं। विपक्षी नेता ज्ञानेश कुमार के खिलाफ काफी पहले से गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। अब दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद विपक्ष दावा कर रहा है कि उनके आरोप और महाभियोग प्रस्ताव राजनीतिक नहीं था। अब विपक्ष फिर से महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।
विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने संवैधानिक पद की निष्पक्षता के अनुरूप काम नहीं किया और कई मामलों में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले फैसले लिए। यह किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में लाया गया पहला नोटिस था। लेकिन 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने दोनों नोटिसों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उस समय जारी आधिकारिक बुलेटिन में इसकी वजह नहीं बताई गई। बाद में जब डिटेल जानकारी सामने आई तब पता चला कि दोनों ने जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 की धारा 3 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अलग अलग आदेशों में बताया कि आरोपों को संवैधानिक रूप से किसी सीईसी को हटाने की कार्यवाही शुरू करने के लिए जरूरी मानक पर खरा नहीं पाया गया। सी. पी. राधाकृष्णन ने अपने आदेश में कहा आरोपों के लिए आवश्यक सबूत नहीं। जिससे सीईसी के खिलाफ मिसबिहैवियर का प्रथम दृष्टया मामला बनता हो।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज किए जाने की बात सामने आई।
आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाना और बहाल करना, SIR से जुड़े फैसले, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस और IT सिस्टम, मतदाता सूची के नियंत्रण का दिल्ली में केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में मतदाता नाम हटाने से जुड़ी अपीलें और गोवा में पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने से जुड़े मामले शामिल है। इस रिपोर्ट के बाद ये मुद्दा विपक्ष और ईसी के बीच ना रहकर देश और उसकी जनता के लिए अहम बन गया है। मामला आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर लोकतंत्र और राष्ट्र के लिए एक बड़ा सवाल बन गया है। रिपोर्ट के मुताबिक आयोग के भीतर के दो सदस्यों ने भी कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।
महाभियोग प्रस्ताव को पास होने के लिए सदन में दो तिहाई के विशेष बहुमत की जरूरत होती है, उसके बाद राष्ट्रपति निष्कासन का आदेश जारी करता है।
Created On :   26 Sept 2026 6:33 PM IST









