Explainer: TMC-उद्धव गुट के सांसद हुए बागी, डीएमके भी इंडिया गठबंधन से खफा! क्या सबका जोड़ मिलकर परिसीमन बिल पास कराने में होगा मददगार, समझिए पूरा नंबर गेम

TMC-उद्धव गुट के सांसद हुए बागी, डीएमके भी इंडिया गठबंधन से खफा! क्या सबका जोड़ मिलकर परिसीमन बिल पास कराने में होगा मददगार, समझिए पूरा नंबर गेम
टीएमसी-शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसद एनडीए का समर्थन करते हैं तो भी क्या परिसीमन बिल पास हो पाएगा? अगर आप नंबर गेम समझना चाहते हैं तो जरूर पढ़ें ये आर्टिकल...

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के बाद देश की राजनीति में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कई विपक्षी दलों में अंदरूनी खींचतान और नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। पहले आम आदमी पार्टी में टूट की खबरें आईं, फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और अब शिवसेना (उद्धव गुट) में भी बगावत की चर्चाएं तेज हो गई हैं। इन घटनाओं ने सिर्फ विपक्षी एकजुटता को ही कमजोर नहीं किया, बल्कि संसद के गणित को भी बदलना शुरू कर दिया है।

इन सब के बीच एक बार पिर परिसीमन विधेयक को लेकर चर्चा बढ़ गई है। माना जा रहा है कि अगर विपक्षी दलों में टूट का सिलसिला जारी रहा और कुछ सांसद सत्तापक्ष या एनडीए के साथ आए तो केंद्र सरकार की संसद में ताकत पहले से ज्यादा बढ़ सकती है। यही वजह है कि अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या सरकार आने वाले समय में परिसीमन जैसे बड़े विधेयक को पास करवा पाएगी? क्या विपक्षी दलों के सांसदों में नजर आ रही ये फूट ऑपरेशन लोटस का ही एक पहलू है? सियासी गलियारों में ऐसी बहुत सी अटकलें लग रही हैं। अगर वाकई परिसीमन के लिहाज से राजनीति की दुनिया में ये भूचाल लाया जा रहा तो नंबर गेम में जीत पाना क्या बीजेपी के लिए बहुत आसान होने वाला है? चलिए समझने की कोशिश करते हैं कि बागी सांसद अगर बीजेपी में मिल भी जाएं या समर्थन दे दें तो परिसीमन बिल लोकसभा में पास हो पाएगा?

सिर्फ कुछ सांसदों के पाला बदलने से तस्वीर पूरी तरह नहीं बदल जाती। संसद में किसी भी बड़े संवैधानिक संशोधन या परिसीमन जैसे अहम कानून को पास कराने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मौजूदा हालात में सरकार उस जरूरी आंकड़े से कितनी दूर है और क्या आने वाले समय में संसद का गणित उसके पक्ष में जा सकता है? आइए आसान भाषा में पूरे मामले को समझते हैं।

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परिसीमन बिल पास क्यों नहीं हुआ?

अप्रैल 2026 में सरकार संसद में परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई थी। इस बिल का मकसद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। इसके साथ ही देश का राजनीतिक नक्शा भी पूरी तरह बदल जाता और संसद की सीटों में इजाफा होता। लेकिन वोटिंग के दौरान सरकार जरूरी समर्थन नहीं जुटा सकी और बिल पास नहीं हो पाया।

आपको बता दें कि, लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं। सामान्य तौर पर दो-तिहाई बहुमत के लिए 362 सांसदों का समर्थन चाहिए। उस समय 3 सीटें खाली थीं, इसलिए जरूरी संख्या घटकर 360 रह गई थी। 17 अप्रैल 2026 को हुई वोटिंग में 12 सांसद मौजूद नहीं थे। इस वजह से सिर्फ 528 सांसदों ने मतदान किया था। ऐसे में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा भी घटकर 352 रह गया था। वोटिंग के दौरान सरकार के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विपक्ष में 230 वोट गए। इस तरह सरकार जरूरी संख्या से 54 वोट पीछे रह गई और बिल गिर गया।

TMC-शिवसेना (यूबीटी) के बागी नेता पास करवा पाएंगे बिल?

अब राजनीतिक हालात पहले जैसे नहीं हैं। टीएमसी के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसद सरकार के समर्थन में आने की चर्चा है। यानी सरकार को 26 अतिरिक्त सांसदों का साथ मिल सकता है। अगर अप्रैल वाली ही स्थिति के हिसाब से ही देखा जाए तो सरकार की कमी 54 वोट की थी। इनमें अगर टीएमसी के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों का वोट मिला लिय जाए तो भी सरकार अभी 28 सांसदों के समर्थन से दूर है। आसान भाषा में समझें तो TMC और उद्धव गुट के सांसद मल कर भी इस बिल को पास नहीं करवा पाएंगे।

डीएमके से उम्मीद क्यों?

सरकार की नजर अब तमिलनाडु की डीएमके (DMK) पर भी बताई जा रही है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि डीएमके और कांग्रेस के बीच कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद बढ़े हैं। बता दें, लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं। अगर पार्टी इस बिल का समर्थन करती है, तो सरकार और जरूरी संख्या के काफी करीब पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार और दो-तिहाई बहुमत के बीच का अंतर घटकर सिर्फ 6 सांसदों का रह सकता है।

छोटे दलों पर भी नजर

सिर्फ बड़े दल ही नहीं, बल्कि कुछ छोटे राजनीतिक दल भी सरकार के लिए अहम साबित हो सकते हैं। राजनीतिक चर्चाओं में कहा जा रहा है कि इंडिया गठबंधन के कुछ सहयोगी दल सत्ता पक्ष का हाथ थाम सकते हैं। इनमें महाराष्ट्र की एक पार्टी का नाम भी लिया जा रहा है। अगर ऐसे दलों का समर्थन मिला तो सरकार के लिए जरूरी संख्या जुटाना और आसान हो सकता है।

राज्यसभा में क्या है स्थिति?

राज्यसभा में कुल 245 सदस्य होते हैं। यहां दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 सांसदों का साथ जरूरी है। हालांकि, टीएमसी के 3 सांसदों के इस्तीफे के बाद यह आंकड़ा कम होकर 162 हो गया है। फिलहाल एनडीए के पास 150 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है। वहीं, अगर DMK के 8 सांसद भी सरकार के साथ आते हैं तो यह संख्या बढ़कर 158 तक पहुंच सकती है। यानी राज्यसभा में सरकार दो-तिहाई बहुमत से केवल और केवल 4 सांसद पीछे रह जाएगी।

आगे क्या हो सकता है?

राज्यसभा की कुछ सीटों पर चुनाव भी हो रहे हैं। इसके बाद सत्ता पक्ष की संख्या और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। अगर सरकार को कुछ छोटे दलों या निर्दलीय सांसदों का समर्थन मिल जाता है तो राज्यसभा में जरूरी आंकड़ा हासिल करना ज्यादा मुश्किल नहीं माना जा रहा है। इसी वजह से परिसीमन विधेयक को लेकर राजनीतिक चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है और आने वाले महीनों में संसद का गणित सबसे ज्यादा नजरों में रहने वाला है।

परिसीमन विधेयक को लेकर विवाद क्यों?

परिसीमन का मतलब है चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या को आबादी के हिसाब से बदलना। यानी जहां आबादी ज्यादा है, वहां ज्यादा सीटें दी जा सकती हैं। संविधान के अनुसार हर जनगणना (Census) के बाद यह काम होना चाहिए, लेकिन 1976 में इसे रोक दिया गया था। बाद में यह रोक 2026 तक बढ़ा दी गई।

अब केंद्र सरकार लोकसभा की सीटें बढ़ाने की तैयारी कर रही है। अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं जिन्हें बढ़ाकर करीब 850 तक किया जा सकता है। सरकार का कहना है कि देश की आबादी पहले से बहुत बढ़ गई है। ऐसे में एक सांसद पर बहुत ज्यादा लोगों की जिम्मेदारी आ जाती है जिससे लोगों की समस्याओं को सही तरीके से उठाना मुश्किल होता है।

दक्षिणी राज्यों को खाई जा रही चिंता

तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों को डर है कि अगर सीटें सिर्फ आबादी के आधार पर बढ़ाई गईं तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिल जाएंगी। इससे दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत कम हो सकती है। यही वजह है कि परिसीमन को लेकर देश में बहस और विवाद हो रहा है।

बीजेपी को परिसीमन से क्या फायदा?

परिसीमन लागू होने पर लोकसभा की सीटें बढ़ सकती हैं। माना जा रहा है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा उन राज्यों को मिलेगा जहां आबादी ज्यादा है जैसे कि उत्तर प्रदेश और बिहार। इन राज्यों में भाजपा पहले से मजबूत मानी जाती है। यही वजह है कि सीटें बढ़ने पर पार्टी को चुनाव में ज्यादा लाभ मिल सकता है। अगर नई सीटें आबादी के हिसाब से तय हुईं तो उत्तर भारत के कई राज्यों का संसद में प्रभाव बढ़ सकता है। इससे भाजपा की स्थिति भी और मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।

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Created On :   18 Jun 2026 6:15 PM IST

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