Jabalpur News: स्कूल वैनों में ओवर लोडिंग, खतरे में मासूमों की जान, जांच पर उठे सवाल, जिम्मेदार मौन

स्कूल वैनों में ओवर लोडिंग, खतरे में मासूमों की जान, जांच पर उठे सवाल, जिम्मेदार मौन
वैन हादसे ने खोली व्यवस्था की पोल, क्षमता से दो गुना ज्यादा तक बैठाए जा रहे बच्चे

डिजिटल डेस्क,जबलपुर। हर दिन मासूम बच्चे वैनों में बैठकर स्कूल पहुंचने की जल्दबाजी में होते हैं। ये सोचते हैं कि कुछ देर बाद स्कूल पहुंच जाएंगे, लेकिन जिस वैन में वे बैठते हैं, उसका सफर कब खतरे में बदल जाए, इसका अंदाजा शायद किसी को नहीं होता। धनवंतरि नगर में दो दिन पहले हुआ हादसा इसी डरावनी हकीकत की सच्ची तस्वीर है, जो इस बात की गवाही दे रही है कि सैकड़ों से अधिक वैनों में हजारों बच्चों की रोजाना ओवर लोडिंग की जा रही है। हर पल उनकी जान पर खतरा है।

डीबी स्टार ने गुरुवार को स्कूलों के बाहर वैनों का जायजा लिया तो हालात चौंकाने वाले रहे, जो तस्वीर दिखाई दी वह परेशान करने वाली है। कई वैनों में बच्चे इतनी तंग जगह में बैठे दिखाई दिए कि उनके लिए ठीक से हिलना-डुलना तक मुश्किल नजर आया। सीटों पर क्षमता से ज्यादा बच्चों के बैठने की स्थिति ने सवाल खड़ा किया कि आखिर इन मासूमों को रोज किस जोखिम के बीच स्कूल पहुंचाया जा रहा है। स्थिति ये है कि हर दिन स्कूल वैनों में मासूमों का दम घुट रहा है और जिम्मेदार पूरी तरह बेपरवाह हैं। यही कारण है कि न तो ओवर लोडिंग रुक पाई है, न नियमों का पालन वैन संचालक कर पाए हैं। इस मामले में आरटीओ व पुलिस विभाग के जांच के दावों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

नियमों की उड़ रहीं धज्जियां

{ओवरलोडिंग की इंतेहा देखनी हो तो वैनों में यह दिखाई पड़ती है। 7 से 8 सीटर क्षमता वाली वैन में बिना किसी हिचक के 15 से 18 छोटे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह बैठाया जा रहा है।

{अवैध गैस किट लगाकर वैनों को दौड़ाया जा रहा है, ताकि मुनाफा कमाया जा सके। कई वैनों में सीटों के ठीक नीचे घरेलू एलपीजी सिलेंडर या बिना परमिशन वाली गैस किट लगी हुई हैं, जो किसी भी वक्त बड़े हादसेे को दावत दे सकती हैं।

{वैनों में फर्स्ट एड और फायर सेफ्टी तक नदारद हैं। चुनिंदा गाड़ियों में आग बुझाने वाले यंत्र होते हैं। बाकी में इसका इंतजाम ही नहीं होता। स्थिति ये है कि आपातकालीन स्थिति के लिए कोई फर्स्ट एड बॉक्स तक वैनों में नहीं रहते।

{वैनों से कमाई की जा रही है लेकिन इनका रजिस्ट्रेशन टैक्सी कोटे में नहीं किया गया है, जबकि इनका कमर्शियल यूज हो रहा है। लेकिन जिम्मेदार परिवहन नियमों का पालन तक नहीं करवा पा रहे हैं। अधिकांश वैन ऐसे ही बच्चों को ढो रही हैं।

दो माह से बंद है वैनों की जांच { गौरतलब है कि स्कूल खुलने के दौरान ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग ने स्कूल वैनों की जांच और कार्रवाई की थी। उस समय नियमों का पालन कराने को लेकर सख्ती दिखाई गई, लेकिन कुछ समय बाद निगरानी बंद हो गई। पिछले दो माह से अधिक समय से तो वैनों पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की सुस्ती का नतीजा है।

बंद दरवाजों के पीछे छिपी मासूमों की बेबसी

आम दिनों में यह हकीकत अक्सर वैन के बंद काले शीशों और दरवाजों के पीछे ही छिपी रहती है। बाहर से देखने पर ये स्कूल वैन एकदम सामान्य नजर आती हैं, मानों सब कुछ नियमों के तहत चल रहा हो, लेकिन जैसे ही अंदर झांककर देखें, तो सच्चाई रोंगटे खड़े कर देने वाली होती है। वैन के अंदर बच्चों की संख्या बढ़ते ही छोटी सी जगह मासूमों के लिए सांस लेने लायक भी नहीं बचती।

एक के ऊपर एक ठूंसे गए बच्चे, भारी बस्ते और बंद खिड़कियों के बीच वह वैन उनके लिए किसी चलती-फिरती घुटन भरी जगह में तब्दील हो जाती है। धनवंतरि नगर में हुए दर्दनाक हादसे ने शहर में सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाकर बेखौफ संचालित की जा रही इन स्कूली वैनों के कड़वे सच को पूरी तरह उजागर कर दिया है।

Created On :   3 Oct 2026 6:11 PM IST

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