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किसानों की मजबूरी: महाराष्ट्र एचटीबीटी कपास के इस्तेमाल में सबसे आगे, मजदूरों की कमी और निराई-गुड़ाई की बढ़ती लागत कर रही परेशान

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली. एक रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र एचटीबीटी कपास के इस्तेमाल में सबसे आगे है। प्रदेश में एचटीबीटी कपास के इस्तेमाल की दर लगभग 58 प्रतिशत है। यवतमाल में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत तक पहुंचता है। तेलंगाना में एचटीबीटी का इस्तेमाल करीब 66 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 49 प्रतिशत बताया गया है। ऐसे बीज औपचारिक नियामकीय व्यवस्था से बाहर होने के कारण किसानों को उनकी गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं मिलती। बीज के अपेक्षित परिणाम न देने की स्थिति में किसानों के पास शिकायत या समाधान का भी पर्याप्त विकल्प नहीं होता।
संशोधित हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी (एचटीबीटी) कपास की खेती का दायरा तेजी से बढ़ा
अध्ययन के लिए महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 जिलों में किसानों का सर्वेक्षण, बीज आपूर्ति श्रृंखला का आकलन और ईएलआईएसए आधारित जीन परीक्षण किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, एचटीबीटी कपास की ओर किसानों के बढ़ते रुझान का कारण खेतों में मजदूरों की कमी और निराई-गुड़ाई की बढ़ती लागत है। ग्लाइफोसेट से खरपतवार नियंत्रण पर 750-850 रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है, जबकि मैनुअल वीडिंग की लागत 12,000-15,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंचती है।
इंडियन सोसाइटी फॉर कॉटन इम्प्रूवमेंट के अध्यक्ष और साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के अध्यक्ष डॉ. सी.डी. मायी ने कहा कि बिना मंजूरी वाले जीन और ग्लाइफोसेट के अनियंत्रित इस्तेमाल से कीटों और खरपतवारों में प्रतिरोध बढ़ने का खतरा है, जिसका असर कपास की उत्पादकता पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि तकनीक का जिम्मेदार इस्तेमाल तभी संभव है जब वह कानूनी और नियामकीय दायरे में हो।
समयबद्ध नियामकीय व्यवस्था की मांग
अध्ययन में कहा गया है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए नई बीज तकनीकों के लिए पारदर्शी, पूर्वानुमेय और समयबद्ध नियामकीय व्यवस्था जरूरी है। सिफारिश की गई है कि बिजीआईआई आरआरएफ कपास को शीघ्र मंजूरी दी जाए, ताकि किसानों को प्रमाणित स्रोतों से बीज उपलब्ध हो सके और आवश्यक प्रबंधन व्यवस्था लागू की जा सके। इसके अलावा ग्लाइफोसेट के लेबल क्लेम का विस्तार कर नियंत्रित तरीके से फसल में इसके इस्तेमाल की अनुमति देने और इसकी निगरानी की व्यवस्था की जाए। साथ ही खरपतवार प्रबंधन के लिए एकीकृत रणनीति अपनाई जाए, जिसमें हर्बिसाइड रोटेशन, तकनीकों का संयोजन और अंकुरण के 25-30 दिन के भीतर सीमित छिड़काव शामिल हो।
Created On :   7 Oct 2026 7:11 PM IST








