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बॉम्बे हाई कोर्ट: पश्चिम युद्ध में भारत के पहले पीड़ित के परिवार ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, दूसरे मामले में याचिका करने वाली कंपनी पर 5 लाख का जुर्माना

Mumbai News. पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध में भारत के पहले पीड़ित के परिवार ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में संदिग्ध हमले में मारे गए भारतीय नाविक दीक्षित सोलंकी की पार्थिव शरीर की वापसी का अनुरोध किया गया है। सोलंकी की पिछले महीने ओमान के तट के पास एक व्यापारिक जहाज पर हुए संदिग्ध हमले में मौत हो गई थी। सोलंकी के पिता अमृतलाल सोलंकी और बहन मिताली सोलंकी ने वकील एस.बी. तालेकर और वकील माधवी अयप्पन के जरिए याचिका दायर किया है, जिसमें अदालत से केंद्र सरकार को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि उनके बेटे के पार्थिव शरीर को वापस लाने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों की तरफ से कोई स्पष्टता नहीं मिल रही है। इस याचिका पर 6 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई करेगी। दीक्षित सोलंकी (25) की मौत 4 मार्च को हुई थी, जब पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के दौरान ओमान के तट के पास एक विस्फोटक से भरी ड्रोन बोट ने तेल टैंकर ‘एमटी एमकेडी व्योम’ को टक्कर मार दी थी। उसमें सवार नाविक दीक्षित सोलंकी की मौत हो गई। इस घटना में वह भारत के पहले पीड़ित बने थे। याचिका में सोलंकी के परिवार ने यह भी अनुरोध किया है कि जांच और फोरेंसिक से जुड़े सभी रिकॉर्ड उनके साथ साझा किए जाएं। याचिका विदेश मंत्रालय, बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय, जहाजरानी महानिदेशालय और वी शीप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दायर की गई है। ‘वी शीप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ ही ‘एमटी एमकेडी व्योम’ जहाज का प्रबंधन करती है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार किसी व्यक्ति को उसकी मृत्यु के बाद भी प्राप्त होता है। इसलिए अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि पार्थिव शरीर समय पर परिवार को सौंप दिया जाए। याचिका में समुद्री नियमों और दिशानिर्देशों के तहत कानूनी दायित्वों का भी हवाला दिया गया है, जिनके अनुसार समुद्र में मृत्यु होने की स्थिति में पार्थिव शरीर को उचित तरीके से संभालना और वापस भेजना अनिवार्य है। इस घटना को हुए लगभग एक महीना बीत चुका है, लेकिन सोलंकी के परिवार को अभी तक उनका पार्थिव शरीर नहीं मिला है।
1841 निवेशकों के साथ 203 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी से जुड़ा मामला, अदालत ने याचिका करने वाली कंपनी पर लगाया 5 लाख का जुर्माना
उधर बॉम्बे हाई कोर्ट ने 1841 निवेशकों के साथ 203 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी से जुड़े मामले में कहा कि केवल समझौता ज्ञापन (एमओयू), कब्जा या भुगतान का दावा करने से संपत्ति का कानूनी अधिकार नहीं मिलता है। बिना वैध दस्तावेज या कोर्ट डिक्री के कोई भी व्यक्ति संपत्ति पर दावा नहीं कर सकता। इस मामले को निवेशकों के हित अहम है। अदालत ने एक कंपनी के 300 करोड़ रुपए के करोड़ के ‘होटल फिडाल्गो’ पर दवा करने की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने याचिका पर कोर्ट का समय जाया करने के लिए कंपनी पर 5 लाख रुपए का जुर्माना है। न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने ‘गोल्डन पीस हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनी की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने गलत तरीके और पूरी तरह से धोखेबाजी करके होटल पर कब्जा कर लिया है और वैध मालिकों को कोई भी प्रतिफल (पैसा) दिए बिना उससे होने वाली आय को अपने कब्जे में कर लिया है। यह कथित लेन-देन महज एक दिखावा है और यह अपराध के पीड़ितों के हितों के लिए नुकसानदेह है। जो भी हो, इन आरोपों से अलग हटकर भी याचिकाकर्ता इस मौजूदा याचिका को बनाए रखने का कोई भी कानूनी अधिकार साबित करने में नाकाम रहा है। पीठ ने यह भी कहा कि इस मौजूदा मामले में 1841 निवेशक शामिल हैं, जिन्हें मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दायर चार्जशीट के अनुसार ‘रामंजनेय लीजिंग एंड फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड’ कंपनी द्वारा 1841 निवेशकों को 203 करोड़ 41 लाख 56 हजार 34 रुपए की राशि का चूना लगाया गया था। जयंत शेट्टी की 29 जून 2024 की जमानत अर्जी के जरिए हस्तक्षेपकर्ता की ओर से हमारे ध्यान में लाया है और यह बात भी रिकॉर्ड पर लाई गई है कि 19 सितंबर 2019 का एमओयू कथित तौर पर पिछली तारीख का था। 9 जून 2020 के एक ईमेल का भी जिक्र किया गया है, जिसके साथ के. सी. वीरेंद्र द्वारा 'होटल फिडाल्गो' के शोभित शेट्टी को संबोधित एक ‘लेटर ऑफ इंटरेस्ट' (एनओआई) संलग्न था। पीठ ने कहा कि निवेशकों और पीड़ितों के व्यापक हित में याचिकाकर्ता को यह अवसर दिया गया था कि वह उस संपत्ति को मौजूदा बाजार मूल्य पर खरीद ले, जिसका मूल्य 300 करोड़ रुपए से अधिक बताया गया था। याचिकाकर्ता ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह से ठुकरा दिया। यह आचरण इस निष्कर्ष को और भी मजबूत करता है कि ये मौजूदा कार्यवाही संपत्ति की कुर्की और बिक्री की वैधानिक प्रक्रिया में बाधा डालने का एक प्रयास मात्र है। इसके लिए याचिकाकर्ता पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जाता है। जुर्माने की राशि न्यायालय की रजिस्ट्री में निवेशकों और पीड़ितों के लाभार्थ जमा की जाएगी।
Created On :   3 April 2026 9:52 PM IST








