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बॉम्बे हाई कोर्ट: रिश्वत मामले मेंबरी होने से ही पूरी सैलरी पाने के अधिकारी नहीं, बिना ठोस सबूत आत्महत्या के लिए उकसाना और क्रूरता के लिए पर्याप्त नहीं

Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने बीएमसी के मेडिकल ऑफिसर को बर्खास्तगी के मामले में अपने अहम फैसले में कहा कि किसी मामले में व्यक्ति बरी होने से ही फूल सैलरी पाने का अधिकारी नहीं हो जाता है। बरी होना और पूरी सैलरी का स्वत: का अधिकार नहीं है। हर केस के तथ्य पर निर्भर करता है। अथॉरिटी तय करेगी कि पूरा वेतन देना है या नहीं। सस्पेंशन कर्मचारी के अपने आचरण के कारण हुआ था। अदालत ने बीएमसी के मेडिकल ऑफिसर को बर्खास्तगी के 4 साल का वेतन देने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति एस.एम. मोडक और न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने की पीठ ने डॉ. लालचंद जुमानी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पर केस मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) ने नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने दर्ज किया था। कर्मचारी दो बार भ्रष्टाचार मामलों में फंसा था। इसलिए बीएमसी पर पूरा वेतन देने का बोझ डालना उचित नहीं है। उन पर बार-बार रिश्वत और भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा चलाया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह दोनों मुकदमों में बरी हो गए। हालांकि उनके निलंबन के लिए बीएमसी जिम्मेदार नहीं है। उनका 29 नवंबर 1986 से 9 मई 1990 के बीच निलंबन उनकी गिरफ्तारी के कारण हुआ था। बर्खास्तगी की अवधि को पहले ही अलग-अलग तरह की छुट्टियों में बदल दिया गया है। इसलिए पेंशन के लिए ‘क्वालिफाइंग सर्विस' (सेवा की पात्रता अवधि) के मकसद से इसे जाहिर तौर पर ‘ड्यूटी' (कर्तव्य-पालन) ही माना जाएगा। पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को बर्खास्तगी की अवधि के लिए पहले ही ‘सब्सिस्टेंस अलाउंस' (गुजारा भत्ता) दिया जा चुका है। जितनी छुट्टियां उसके खाते में जमा थीं, उन छुट्टियों की अवधि के लिए उसे वेतन और भत्ते पाने का हक है और ये उसे जरूर दिए गए होंगे। इस मामले के खास तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए ‘सक्षम प्राधिकारी' ने बर्खास्तगी की अवधि के दौरान पूरा वेतन और भत्ते न देने का आदेश देकर अपने विवेकाधिकार का सही इस्तेमाल किया है। इस फैसले में दखल देने का कोई औचित्य नहीं है।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता डॉ. लालचंद जुमानी बीएमसी में मेडिकल ऑफिसर थे। 1986 में उन पर रिश्वत लेने का आरोप लगा और उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। बाद में 1989 में कोर्ट ने उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया। 1990 में उन्हें फिर से नौकरी में बहाल किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 1986 से 1990 तक का सस्पेंशन पीरियड ‘ड्यूटी’ माना जाए और पूरी सैलरी दी जाए। उन्हें पूरी तरह बरी किया गया। इसलिए सस्पेंशन पीरियड को ‘ड्यूटी’ माना जाए और पूरी सैलरी और भत्ते दिए जाएं। उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच भी नहीं हुई थी।
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उधर दहेज उत्पीड़न के कारण आत्महत्या का मामला - अस्पष्ट टिप्पणियां और बिना ठोस सबूत आत्महत्या के लिए उकसाने या क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं
बॉम्बे हाई कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के कारण आत्महत्या के एक मामले में कहा कि केवल सामान्य आरोप या पुरानी अस्पष्ट टिप्पणियां, बिना ठोस सबूत और बिना सीधे संबंध के आत्महत्या के लिए उकसाने या क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने देवर को हत्या के लिए उकसाने के मामले से बरी कर सेशन कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति अश्विन डी. भोबे की एकल पीठ ने 42 वर्षीय व्यवसायी हेमंत भंसाली की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि आईपीसी की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के लिए यह जरूरी है कि स्पष्ट उकसाना, उकसाने का इरादा होना और घटना से सीधा होना चाहिए। याचिकाकर्ता की कथित टिप्पणी घटना से लगभग डेढ़ साल पहले की थी। मृतका को सीधे नहीं, बल्कि पति को कही गई थी। इसे ‘भड़काना’ नहीं माना जा सकता है। व्हाट्सएप चैट केवल सामान्य शिकायत है। इससे आत्महत्या के लिए उकसाने का निष्कर्ष नहीं निकलता है। याचिकाकर्ता के खिलाफ सीधी भूमिका या सक्रिय सहभागिता नहीं दिखाता है। आईपीसी की धारा 498 ए (क्रूरता) भी लागू नहीं होती है, न तो लगातार उत्पीड़न साबित हुआ और न ही दहेज मांगने का दबाव साबित हुआ है। पीठ ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और सेशन कोर्ट के आदेश गलत मानते हुए उसे रद्द कर दिया गया। राहुल बाबूलाल भंसाली का गुजरात के वलसाड की रहने वाली पूर्वी राहुल भंसाली से शादी की थी। शादी के बाद वह ग्रांट रोड (पूर्व) स्थित हरि कृपा हाइट्स में पति के साथ रहने लगी। 4 फरवरी 2019 को पूर्वी ने अपने बेडरूम में छत के पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतक की मां ने मुंबई के वी. पी. रोड पुलिस स्टेशन पूरी भंसाली के पति और ससुराल वालों पर आईपीसी की धारा 498ए, 304बी, 306 के तहत मामला दर्ज कराई। याचिकाकर्ता (देवर) पर भी उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया। उसने इस मामले में बरी के लिए आवेदन किया, जिसे सेशन कोर्ट ने खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता देवर ने सेशन कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
Created On :   30 March 2026 8:58 PM IST








