बॉम्बे हाई कोर्ट के अहम फैसले: क्वीन फॉरएवर पर रोक नहीं, जातीय उत्पीड़न का केस रद्द, ट्यूशन टीचर को राहत से इनकार, ब्रीच कैंडी अस्पताल को कर छूट

क्वीन फॉरएवर पर रोक नहीं, जातीय उत्पीड़न का केस रद्द, ट्यूशन टीचर को राहत से इनकार, ब्रीच कैंडी अस्पताल को कर छूट
  • फिल्म के सीक्वल अधिकारों पर फैंटम स्टूडियोज की याचिका खारिज
  • व्यक्तिगत रंजिश से प्रेरित एफआईआर रद्द, 10 वर्षीय बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में अग्रिम जमानत नहीं
  • मरीजों से शुल्क लेने के बावजूद परोपकारी अस्पताल को मिल सकती है कर छूट
  • निजी रंजिश से प्रेरित एफआईआर रद्द

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए फिल्म उद्योग, आपराधिक न्याय, बच्चों की सुरक्षा और धर्मार्थ संस्थाओं को मिलने वाली कर छूट से जुड़े कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया है। अदालत ने कंगना रनौत अभिनीत फिल्म ‘क्वीन फॉरएवर’ पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया, वहीं व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित पाए गए एक आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। दूसरी ओर, 10 वर्षीय छात्रा के यौन उत्पीड़न के आरोपी ट्यूशन टीचर को अग्रिम जमानत देने से इनकार किया। एक अन्य फैसले में अदालत ने कहा कि मरीजों से शुल्क लेने मात्र से अस्पताल का परोपकारी स्वरूप समाप्त नहीं हो जाता।

‘क्वीन फॉरएवर’ की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कंगना रनौत अभिनीत फिल्म ‘क्वीन फॉरएवर’ पर अंतरिम रोक लगाने की फैंटम स्टूडियोज की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। फैंटम स्टूडियोज ने आरोप लगाया था कि यह फिल्म 2014 की फिल्म ‘क्वीन’ का अनधिकृत सीक्वल है और इससे उसके बौद्धिक संपदा अधिकारों का उल्लंघन होता है। कंपनी ने जिओ स्टार इंडिया के खिलाफ 250 करोड़ रुपये का मुकदमा भी दायर किया था। फैंटम का दावा था कि 2012 के सह-निर्माण समझौते और 2022 के नोवेशन डीड के तहत दोनों कंपनियों के पास फिल्म के बौद्धिक संपदा और उससे संबंधित अधिकार संयुक्त रूप से हैं। हालांकि, जिओ स्टार ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि नई फिल्म मूल फिल्म का अगला भाग नहीं है। अदालत ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।

निजी रंजिश से प्रेरित एफआईआर रद्द

एक अन्य मामले में हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड (एमएसईबी) के सेवानिवृत्त कर्मचारी चंद्रकांत विश्वम्भर अंबिलवाड़े के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर रद्द कर दी। न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव की एकल पीठ ने कहा कि दुर्भावना और व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित आपराधिक कार्यवाही को उचित परिस्थितियों में अदालत की असाधारण शक्तियों के तहत रद्द किया जा सकता है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि अंबिलवाड़े ने 6 अक्टूबर 2021 को मुंबई के बांद्रा स्थित एमएसईबी मुख्यालय में जातिसूचक अपशब्द कहकर उन्हें अपमानित किया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने पहले शिकायतकर्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें की थीं। अदालत ने दोनों पक्षों के बीच पुराने विवाद और उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज पर विचार किया। पीठ के अनुसार, फुटेज में याचिकाकर्ता की घटनास्थल पर मौजूदगी दिखाई नहीं दी और अभियोजन के आरोपों को समर्थन देने वाला पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिला।

10 वर्षीय छात्रा के यौन उत्पीड़न के आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं

हाई कोर्ट ने 10 वर्षीय छात्रा के यौन उत्पीड़न के आरोपी ट्यूशन टीचर संजय सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति माधव जे. जामदार की एकल पीठ ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि उपलब्ध बयानों और परिस्थितियों के आधार पर आरोपी को राहत देने का आधार नहीं बनता। आरोप था कि शिक्षक ने बच्ची से अनुचित सवाल पूछे और उसे चूमने का प्रयास किया। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने पहले दो बार बच्ची के वीडियो बनाए थे। बचाव पक्ष ने दावा किया कि मामला ट्यूशन शिक्षकों की आपसी प्रतिद्वंद्विता के कारण दर्ज कराया गया है। हालांकि, अदालत को रिकॉर्ड पर इस दावे का पर्याप्त आधार नहीं मिला। पीठ ने बयानों में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं पाया और अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

ब्रीच कैंडी अस्पताल को कर छूट, परोपकार की व्यापक व्याख्या

मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल ट्रस्ट के मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि मरीजों से पैसे लेना अपने आप में किसी अस्पताल के परोपकारी स्वरूप को समाप्त नहीं करता। न्यायमूर्ति बी.पी. कोलाबावाला और न्यायमूर्ति फरहान पी. दुबाश की पीठ ने ट्रस्ट की याचिका स्वीकार करते हुए आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10(23C)(vi) के तहत कर छूट देने का निर्देश दिया और आयकर विभाग के दो आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेषज्ञ चिकित्सा, आधुनिक उपकरण और कुशल कर्मचारियों के माध्यम से इलाज उपलब्ध कराना भी परोपकार का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, अस्पताल का संचालन परोपकारी उद्देश्यों के लिए होना चाहिए, न कि मुनाफा कमाने के लिए। पीठ ने ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड और मुनाफे के निजी वितरण से जुड़े तथ्यों पर भी विचार किया। फैसले में चिकित्सा राहत को केवल मुफ्त इलाज या गरीबों की सहायता तक सीमित मानने की व्याख्या को उचित नहीं माना गया।

Created On :   14 Oct 2026 9:22 PM IST

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