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सुप्रीम कोर्ट: शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह धनुष-बाण मामले में चुनाव आयोग को 2011 के अलावा दूसरा संविधान सौंपे जाने का कोई सबूत नहीं

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ मामले पर मंगलवार को भी सुनवाई हुई । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिंदे गुट के अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने केंद्रीय चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि इस बात का “कोई सबूत नहीं है” कि शिवसेना के 2011 के संविधान के बाद का कोई भी संविधान कभी चुनाव आयोग को सौंपा गया था। कौल का कहना है कि आयोग ने खुद दो आदेश में कहा है कि उसके पास मौजूद एकमात्र 2011 का पार्टी संविधान था, जिसे आयोग की जरूरतों के हिसाब से बनाया गया था।
सीनियर एडवोकेट एनके कौल ने कहा कि हम इसे उपयुक्तता में लाए थे। उस समय नेतृत्व का यही का यही आदेश था। इसे 2011 में चुनाव आयोग जो चाहता था, उसके उपयुक्तता में लाया गया था। समस्या तब पैदा हुई जब उन्होंने (उद्धव गुट) पार्टी संविधान को बदलने, उसे वापस अस्थायी स्तर पर लाने की कोशिश की और फिर कहा कि इसे चुनाव आयोग को सौंप दिया गया है। उन्होंने कहा कि आयोग कहता है कि, “हमें यह कभी नहीं मिला।” वे जो भी पत्र संलग्न करते हैं, उसमें पार्टी चुनाव की बात होती है। जब उन्होंने आयोग को लिखा, तो उन्होंने कभी संविधान संलग्न नहीं किया। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि कोई नया संविधान चुनाव आयोग को सौंपा गया था।
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शिंदे गुट के अधिवक्ता कौल ने कहा कि सुभाष देसाई का कहना है कि हम उस संविधान को मानेंगे जो चुनाव आयोग के पास है। आयोग ने दो आदेशों में कहा है कि उसके पास मौजूद एकमात्र 2011 का संविधान है, जिसे आयोग के निर्देशों के अनुसार तैयार किया गया था। उन्होंने ‘अर्जुन सिंह बनाम अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' मामले का भी जिक्र किया। कौल ने कह कि मुख्य बात यह है कि राजनीतिक दलों को पार्टी के भीतर लोकतंत्र का पालन करना चाहिए। पार्टियां लोकतांत्रिक ढांचे का आधार होती हैं और उन्हें ही सबसे पहले आंतरिक रूप से लोकतंत्र का पालन करना चाहिए। समय-समय पर चुनाव न कराने और पार्टी के भीतर लोकतंत्र को बनाए न रखने से, राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा देने के राजनीतिक दल के दावे पर सवालिया निशान लग जाता है।
Created On :   7 Oct 2026 7:25 PM IST









