बॉम्बे हाई कोर्ट: मुंबई के एक व्यवसायी की अवैध गिरफ्तारी को लेकर राज्य सरकार को 5 लाख मुआवजा देने का दिया आदेश

मुंबई के एक व्यवसायी की अवैध गिरफ्तारी को लेकर राज्य सरकार को 5 लाख मुआवजा देने का दिया आदेश
  • अदालत ने अवैध गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी की सैलरी से मुआवजे की रकम काटने का निर्देश दिया
  • 2017 में बिल्डर और पुलिस की मिली भगत से व्यवसायी को किया गया था गिरफ्तार

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई के एक व्यवसायी की अवैध गिरफ्तारी को लेकर राज्य सरकार को उसे 5 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि 2017 में जबरन वसूली के आरोप में व्यवसायी की गिरफ्तारी गैर-कानूनी थी। राज्य सरकार दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे और मुआवजे की रकम उसके पेमेंट से काटे। अदालत ने अवैध रूप से गिरफ्तार व्यवसायी की रिमांड को बिना सोचे-समझे बार-बार बढ़ाने वाले मजिस्ट्रेटों के आचरण की जांच को एक प्रशासनिक समिति को सौंप दिया है।

न्यायमूर्ति अजाय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की पीठ ने बिपीन सतीश चंद्र अग्रवाल की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि आजाद मैदान पुलिस ने एक प्राइवेट बिल्डर के साथ मिलीभगत करके याचिकाकर्ता को जबरन वसूली के मामले में फंसाया था। पीठ ने कहा कि मुंबई के आजाद मैदान पुलिस स्टेशन के सहायक पुलिस निरीक्षक महेश लमखाड़े ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 384 के तहत जबरन वसूली के मामले में उन्हें झूठा फंसाया। उसने अपने आधिकारिक पद का गलत फायदा उठाया और अपने अधीन पुलिस तंत्र का इस्तेमाल बिल्डर के हितों को साधने के लिए किया।

पीठ ने 64वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट को भी फटकार लगाई, जिन्होंने बिना सोचे-समझे अग्रवाल को 26 दिनों के लिए पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। पीठ ने कहा कि हमें लगता है कि मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और बहुत ही लापरवाही भरा रवैया अपनाया।

पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता अग्रवाल अपनी बुजुर्ग सास की ओर से ‘पावर ऑफ अटॉर्नी' धारक के रूप में एक सोसाइटी के पुनर्विकास की शर्तों पर ‘सेठ एंड सोनल डेवलपर्स' के साथ बातचीत कर रहे थे। बातचीत के दौरान जब बिल्डर ने उन्हें एडवांस के तौर पर 2 लाख रुपए दिए, तो पुलिस ने उन्हें जबरन वसूली के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद अग्रवाल ने याचिका दायर कर अपनी गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने, इसमें शामिल पुलिसकर्मी के खिलाफ विभागीय जांच कराने और राज्य सरकार से मुआवजे की मांग की।

क्या है पूरा मामला

याचिकाकर्ता मुंबई के वालकेश्वर में रहते हैं और उनका कपड़ों (गारमेंट्स) के आयात-निर्यात का व्यवसाय है। उनकी 70 वर्षीय सास असावरी के. कुलकर्णी मुंबई के अंधेरी (पूर्व) स्थित ओल्ड नागरदास रोड पर ‘द न्यू आरती को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी' इमारत में रहती थीं। अपने पति के निधन के बाद फ्लैट में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने परिवार के इकलौते दामाद याचिकाकर्ता को अपना ‘कॉन्स्टिट्यूटेड अटॉर्नी' (अधिकृत प्रतिनिधि) नियुक्त किया, जिससे वह उनकी ओर से बिल्डर के साथ बातचीत कर सके। बिल्डर ने पुलिस के साथ मिल कर उन्हें हफ्ता वसूली में फंसा दिया।

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