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सावधान: सूरज से है जंग और इरादे तंग, जमीन संरचना भी कमजोर हो रही - बदल रही है मिट्टी की तासीर

Nagpur News. मनपा आयुक्त डॉ. विपिन ने साल 2026-27 के लिए 5541.31 के बजट में विविध विभागों के लिए राशि का प्रावधान किया है। उद्यान विभाग के लिए 90.57 करोड़ रुपए का बजट प्रस्तावित किया गया है। इस राशि से शहर में उद्यानों के रख-रखाव, दुरूस्ती और संवर्धन का दावा किया गया है। मनपा उद्यानों में थीम आधारित उत्सव के आयोजन की भी योजना है, लेकिन शहर में हरियाली बढ़ाने के लिए पौधारोपण अभियान का उल्लेख तक नहीं है।
जलसंवर्धन : सख्त इरादों का दिख रहा पूरी तरह अभाव
मनपा के नगर रचना विभाग की ओर से 1 अप्रैल 2018 से अब करीब 2900 इमारतों के निर्माणकार्य प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। इस अनुमति के बदले में 32 करोड़ 1 लाख 54 हजार 126 रुपए की आमदनी हुई है। इसके साथ ही अनुमति में रेन वाटर हार्वेस्टिग के लिए 25 हजार रुपए की सुरक्षा राशि को नगररचना विभाग जमा रखता है। इमारत निर्माणकार्य के लिए नियमों के पालन और रेन वाटर हार्वेस्टिंग को पूरा करने के लिए निर्माणकार्य लागत की 1 फीसदी राशि अथवा 75 हजार रुपए तक सुरक्षा के तौर पर राशि को रखा जाता है, लेकिन निर्माणकार्य के पूरा होने के बाद अधिवासी प्रमाणपत्र (आक्युपेंसी सर्टिफिकेट) पाने के लिए आवेदक के आने पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग को पूरा करने की जांच किए बगैर सुरक्षा राशि को लौटा दिया जाता है। ऐसे में शहर में भूगर्भ जलसंवर्धन को लेकर खासी लापरवाही हो रही है।
भूगर्भ जलसंवर्धन : विशेष प्रोजेक्ट भी अधर में लटका
पिछले साल मार्च में केन्द्रीय शहरी एवं आवासीय मामलों के मंत्रालय से अमृत योजना-2 अंतर्गत भूगर्भ जलसंवर्धन परियोजना के लिए मनपा को शामिल किया गया है। देश भर के 75 प्रमुख शहरों के साथ मनपा को शहरी मामलों के राष्ट्रीय संस्थान से 50 लाख की निधि का आवंटन किया गया। इस निधि से जलसंवर्धन उपाय योजना को शहर में पूरा करना है। मनपा के जलप्रदाय विभाग और नई दिल्ली स्थित शहरी मामलों के राष्ट्रीय संस्थान के बीच एमओयू हुआ है। प्रोजेक्ट में 10 चिन्हित इलाकों में भूगर्भ जल स्तर को बढ़ाने, जलसंकट का निपटारा और स्थायी जलप्रबंधन करना है। जलप्रदाय विभाग ने लक्ष्मीनगर जोन अंतर्गत समर्थ नगर, धरमपेठ जोन कार्यालय, हनुमाननगर जोन अंतर्गत चिंचभवन की बाबूराव बोबड़े स्कूल, धंतोली में जलप्रदाय विभाग की इमारत, नेहरूनगर जोन कार्यालय, गांधीबाग में साने गुरूजी स्कूल, सतरंजीपूरा जोन कार्यालय, लकड़गंज जोन अंतर्गत कड़गांव वार्ड, आसीनगर जोन में कपिलनगर स्कूल और मंगलवारी जोन में लोककर्म कार्यालय इमारत का चयन किया है। हालांकि साल भर बीत जाने के बाद भी प्रोजेक्ट को पूरा नहीं किया जा सका है।
तीन साल में 1 लाख 5 हजार 750 पौधारोपण
उद्यान विभाग के मुताबिक शहर में पिछले तीन सालों में 1 लाख 5 हजार 750 पौधों के रोपण का दावा किया गया है। सालाना अभियान में साल 2023-24 में 30800 पौधे, साल 2024-25 में 70950 पौधों का रोपण किया गया है, जबकि इस साल अब तक शहर में अलग-अलग स्थानों पर 4,000 से अधिक पौधों को लगाया गया है। हालांकि विभाग के पास पौधों के संवर्धन और पुर्नरोपण को लेकर कोई भी पुख्ता जानकारी मौजूद नहीं है।
7 सालों में 7131 पेड़ कटाई की अनुमति
उद्यान विभाग के मुताबिक विविध विकासकामों के लिए साल 2019 से अब तक 7131 पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है। इस कटाई के बदले में 75375 पौधों का रोपण किया गया है।
बदलते मौसम का असर, तेजी से बदल रही है मिट्टी की तासीर
बदलते मौसम का असर अब सिर्फ तापमान या बारिश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खेती की मिट्टी के टेक्सचर (बनावट) में भी साफ बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी अत्यधिक बारिश तो कभी लंबे सूखे के कारण जमीन की संरचना कमजोर हो रही है। इसका सीधा असर मिट्टी की जलधारण क्षमता, उर्वरता और फसलों की उत्पादकता पर पड़ रहा है। नागपुर जिले में यह बदलाव अब चिंता का विषय बनता जा रहा है।
बदलते पैटर्न का कारण
मौसम में हो रहे बदलावों का सीधा असर अब नागपुर जिले की खेती की जमीन पर साफ दिखाई देने लगा है। विदर्भ के इस हिस्से में पिछले कुछ वर्षों में मानसून का पैटर्न तेजी से बदला है। कभी कम बारिश तो कभी कम समय में अत्यधिक बारिश। इससे किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। अतिवृष्टि, सूखा, ओलावृष्टि और अत्यधिक ठंड जैसे बदलते मौसम के कारण मिट्टी की संरचना में बड़े बदलाव हो रहे हैं, जिसका असर सीधे उत्पादन पर पड़ रहा है।
काली मिट्टी की बदलती हालत
नागपुर जिले में मुख्य रूप से काली (रेगुर) मिट्टी पाई जाती है, जो कपास, सोयाबीन और तुअर जैसी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। लेकिन कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, अनियमित बारिश के कारण इस मिट्टी की जलधारण क्षमता प्रभावित हो रही है। भारी बारिश के दौरान टॉप-सॉइल बह जाती है, जबकि लंबे सूखे में मिट्टी में दरारें पड़ जाती हैं और नमी पूरी तरह खत्म हो जाती है।
मिट्टी के रासायनिक और जैविक बदलाव
बदलते मौसम के कारण तापमान, वर्षा और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर मिट्टी के गुणों और उसकी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रहा है। इनमें जैविक तत्वों का विघटन, नाइट्रोजन का खनिजीकरण, नाइट्रिफिकेशन और डीनाइट्रिफिकेशन, पोषक तत्वों का अवशोषण, मिट्टी का कटाव क्षारीयता और अम्लता में बदलाव शामिल हैं।
मृदा वैज्ञानिक डॉ. हरिहर कौसडीकर के अनुसार, “मिट्टी एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है, इसलिए सही उपायों से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। संरक्षणात्मक जुताई, कवर क्रॉप, फसल चक्र और जैविक खाद का उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करता है।”
उत्पादन पर सीधा असर
नागपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान कपास, सोयाबीन और धान की खेती करते हैं। अनियमित बारिश से बुवाई प्रभावित होती है। अधिक नमी से फसल में रोग बढ़ते हैं। सूखे के कारण पौधों की वृद्धि रुक जाती है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि तापमान में लगातार वृद्धि होती रही, तो आने वाले वर्षों में उत्पादन पर और गंभीर असर पड़ सकता है।
- यह है समाधान?
- ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी माइक्रो इरिगेशन तकनीकों से 60% से अधिक पानी बचाया जा सकता है।
- खेत में फसल अवशेष और कवर क्रॉप रखने से मिट्टी का कार्बन बढ़ता है।
- जैविक खाद और गोबर खाद का उपयोग मिट्टी की संरचना को मजबूत करता है।
- जल संरक्षण के लिए खेत तालाब और मेड़बंदी जरूरी है।
जमीन गुणवत्ता में गिरावट
जलवायु परिवर्तन के कारण देश में 120 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि प्रभावित हो चुकी है। नागपुर जिले में भी इसका असर धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है। मूसलाधार बारिश से मिट्टी का ऊपरी हिस्सा बह रहा है, जबकि सूखे के कारण जमीन की नमी और उर्वरता घट रही है।
आगे की चुनौती
आने वाले समय में यदि मिट्टी के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो नागपुर जैसे कृषि क्षेत्र में उत्पादन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है। बदलते मौसम के साथ खेती के तरीकों में बदलाव लाना अब मजबूरी बन गया है।
Created On :   27 April 2026 8:54 PM IST












