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Nagpur News: डस्ट बनी आफत, छीनी सोलर की आधी ताकत,धूल-प्रदूषण से 50% तक घटा बिजली उत्पादन

Nagpur News नागपुर में तेजी से हो रहे वायु प्रदूषण ने अब नया संकट खड़ा कर दिया है। यह संकट सिर्फ हवा में उड़ती जहरीली धूल तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे लोगों की जेब पर हमला कर रहा है। निर्माण स्थलों से निकलने वाली महीन धूल और प्रदूषण अब सोलर पैनलों पर जमकर उनकी क्षमता को 30 से 50 प्रतिशत तक घटा रहा है। धूल के ये कण सोलर पैनल की चिकनी ग्लास की सतह पर चिपककर एक परत बना देते हैं। हालत यह है कि कुछ ही हफ्तों में पैनल भूरे और धुंधले नजर आने लगते हैं।
सीधा असर बिजली उत्पादन पर
विशेषज्ञों के मुताबिक, जहां सामान्य हालात में 1-2 महीने में 5-10 ग्राम प्रति वर्ग मीटर धूल जमती है, वहीं नागपुर जैसे प्रदूषित शहर में यह मात्रा 2 से 5 गुना तक बढ़ रही है। इसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ता है। हल्की धूल भी 5-10% उत्पादन कम कर देती है, जबकि निर्माण क्षेत्र के पास यह गिरावट 15-25% तक पहुंच जाती है। कई मामलों में 2-4 हफ्तों में ही 30-50% तक उत्पादन गिरने के उदाहरण सामने आए हैं। यानी जो घर रोज 12-15 यूनिट बिजली बना रहा था, वह अब 7-10 यूनिट पर सिमट गया है।
समझिए कैसे धूल बन रही मुसीबत
वाहनों से निकलने वाले धुएं के अलावा निर्माणाधीन इमारतों से बड़ी मात्रा में सीमेंट, रेत और चूने का मिश्रण वातावरण में फैल रहा है। इस मिश्रण में बेहद महीन कण होते है। जो हवा के साथ उड़कर आसपास के घरों तक पहुंच रहे हैं।
धूल पैनलों की सतह पर जम जाती है, जिससे सूर्य की किरणें पैनल तक ठीक से नहीं पहुंच पातीं। ऐसे में, सिलिकॉन में मौजूद इलेक्ट्रॉनों को सक्रिय करने वाले फोटॉनों का प्रभाव कम हो जाता है। बिजली उत्पादन घट जाता है।
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उत्पादन घटने से बिजली बिल सीधे बढ़ जाता है। जहां सोलर से 50-80% तक बचत होती थी, अब वह घटकर 30-40% रह गई है।
धूल से मुक्ति के लिए बार-बार पैनल साफ करना पड़ता है। इससे खर्च और जोखिम दोनों बढ़ता है। सोलर की बार-बार सफाई करने से लाइफ भी कम हो रही है।
धूल में मौजूद सिलिका और कैल्शियम पैनल पर जमकर परत बना देते हैं। जो रोशनी रोकने के साथ पैनल को गर्म करती है। इससे ग्लास पर खरोंच का खतरा बना रहता है।
आर्थिक नुकसान : शहर भर में करीब 40 हजार से ज्यादा घरों में रूफटॉप सोलर सिस्टम लगे हैं। इन घरों में कुल 157 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाता है। "कंस्ट्रक्शन डस्ट" से बिजली बनाने की क्षमता कम हो रही है। आसपास निर्माण कार्य चल रहा हो, वहां धूल 2 से 5 गुना ज्यादा जमती है। उत्पादन 15-25% तक गिर जाता है। कई बार 2-4 हफ्तों में ही 30-50% तक बिजली बनना कम हो जाता है। अगर कोई घर रोज 15 यूनिट बिजली बना रहा था, तो धूल के कारण यह घटकर 7-10 यूनिट रह सकती है। यानी 5-8 यूनिट बिजली रोज ग्रिड से खरीदनी पड़ रही है। महाराष्ट्र में औसत घरेलू बिजली दर 6-8 रुपए प्रति यूनिट है, ऐसे में रोज 30-60 और महीने में 900-1800 तक का अतिरिक्त बिल आ सकता है। यानी धूल सीधे आपकी जेब पर असर डाल रही है।
खर्च भी बढ़ रहा : आसपास चल रहे निर्माण के कारण पैनल पर रोज धूल जम रही है। पहले महीने दो-महीने में एक बार सोलर साफ़ करना पड़ता था। अब हर हफ्ते सफाई करानी पड़ती है, जिससे खर्च भी बढ़ रहा है। सरकार सोलर लगाने को कहती है, लेकिन ऐसे हालात में आम आदमी को ही नुकसान उठाना पड़ रहा है। -अजय भट, धरमपेठ निवासी
कार्यक्षमता और लाइफ प्रभावित : कंस्ट्रक्शन डस्ट के महीन कण पैनल की सतह पर परत बनाकर सूर्य की रोशनी को रोक देते हैं, जिससे उत्पादन गिरता है। अगर नियमित सफाई और डस्ट कंट्रोल नहीं किया गया, तो सोलर सिस्टम की कार्यक्षमता और लाइफ दोनों प्रभावित होंगी। इसके लिए सख्त नियम और निगरानी बेहद जरूरी है। -सुधीर चौधरी, सोलर विक्रेता
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Created On :   21 April 2026 12:46 PM IST












