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महंगाई की दोहरी मार: दहलीज पर आकर खड़ा है नया आर्थिक संकट, डी-कंट्रोल दवाओं के दाम में 30% तक वृद्धि की संभावना

Nagpur News. हजारों किलोमीटर दूर ईरान युद्ध के कारण रॉ-मटेरियल, पैकेजिंग, आयात-निर्यात से लेकर छोटी-बड़ी समस्याएं पैदा हो चुकी हैं। इससे साधारण बीमारियों की दवाओं के भी अब आम आदमी की पहुंच से दूर होने की संभावना बन रही हैं। जरूरी दवाओं से लेकर जीवन रक्षक दवाओं तक के दाम बढ़ने लगे हैं। पहले से महंगाई की मार से जूझ रहे आमजनों के लिए दवाओं के दाम बढ़ना आर्थिक संकट बन रहा है।
जल्द नया एमआरपी
राजीव उखारे, अध्यक्ष नागपुर केमिस्ट-ड्रगिस्ट एसोसिएशन के मुताबिक कंपनियों के पास लगभग तीन महीनों का स्टॉक होता है। वहीं होलसेल विक्रेताओं के पास डेढ़ महीने का स्टॉक होता है। फिलहाल नई एमआरपी की दवाएं नहीं आयी है। लेकिन जल्द ही डी-कंट्रोल दवाएं दाम बढ़कर आएगी। इस संबंध में कंपनियों ने चर्चा भी की है। कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ेगी तो नई एमआरपी के अनुसार बिक्री के दाम भी बढ़ेंगे।
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दो श्रेणियों में विभाजित होती दवाएं
नागपुर में दवाओं के दाम बढ़ने के आसार बने हुए हैं। कंपनियों के पास दवाओं का तीन महीने का स्टॉक रहता है। वहीं दवा के होलसेल विक्रेताओं के पास एक से डेढ़ महीने का स्टॉक रहता है। यह स्टॉक अब कम होने लगा है। वहीं कुछ फार्मेसी के पास दवाएं नई कीमत के साथ पहुंचने लगी हैं। देश में दवाओं की कीमतों का निर्धारण एनपीपीए (नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी) करता है। दवाओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है। कंट्रोल (शेड्यल्ड) दवाओं की श्रेणी वे उन जीवनरक्षक दवाओं का समावेश हैं, जो नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन (एनएलईएम) में शामिल हैं। इनकी कीमत सरकार तय करती है। वहीं डी कंट्रोल डी-कंट्रोल (नॉन-शेड्यल्ड) दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं।
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कच्चा माल व पैकेजिंग मटेरियल हुआ महंगा
युद्ध के कारण कच्चे माल (एपीआई) और पैकेजिंग (एल्युमीनियम और प्लास्टिक) की कीमतों में 30 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। चूंकि कंट्रोल दवाओं की कीमतें सरकार द्वारा सीमित हैं, इसलिए कंपनियाें द्वारा दामों को नियंत्रित रखा गया है। जबकि डी-कंट्रोल दवाओं पर दामों का असर दिख रहा है। कंपनियांे द्वारा इन दवाओं के दामों में 15 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि की जा रही है। सूत्रों ने बताया कि दवाओं के दाम बढ़ने का सबसे बड़ा कारण सप्लाई चेन का टूटना है। भारतीय दवा उद्योग काफी हद तक आयतित कच्चे माल पर निर्भर है। युद्ध के कारण माल ढुलाई का किराया, दवा पैक करने के लिए इस्तेमाल होने वाले एल्युमीनियम फॉयल और प्लास्टिक के दामों में 40 प्रतिशत तक की तेजी आई है।
खत्म होने लगा पुराना स्टॉक
नागपुर के एक खुदरा दवा विक्रेता ने बताया कि डी-कंट्रोल दवाओं के दामाें में वृद्धि हुई है। उनके पास कुछ नई एमआरपी का माल आ चुका है। वहीं एसोसिएशन ने बताया कि होलसेल विक्रेताओं के पास फिलहाल पुरानी एमआरपी का स्टॉक है। एक दवा विक्रेता के अनुसार रोजमर्रा के उपयोग में ली जानेवाली दवाओं के दामों में 15 से 30 प्रतिशत का अंतर आया है।
Created On :   30 April 2026 7:01 PM IST












