दैनिक भास्कर हिंदी: नामांकन संबंधी खामी को उम्मीदवार चुनावी याचिका से दे सकते हैं चुनौती-हाईकोर्ट

October 24th, 2019

डिजिटल डेस्क, मुंबई। नामांकन संबंधी खामी को उम्मीदवार चुनाव खत्म होने के बाद चुनावी याचिका के रुप में चुनौती दे सकता है। बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में इस बात को स्पष्ट किया है। नामांकन पत्र स्वीकार करना अथवा अस्वीकार करना चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। लिहाजा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद न्यायालय इस तरह के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। मिरज से विधानसभा चुनाव लड़नेवाले संजय पाटील के नामांकन पत्र में खामी होने के बावजूद स्वीकार किए जाने के खिलाफ तानाजी रुइकर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि पाटील ने अपने नामांकन पत्र में शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत जानकारी दी है। इसलिए नियमानुसार पाटील के नामांकन पत्र को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए था। न्यायमूर्ति उज्जल भुयान के सामने मामले की सुनवाई हुई। मामले से जुड़े तथ्यों पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति ने कहा कि नामांकन पत्र को स्वीकार किया जाना अथाव अस्वीकार किया जाना चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 80 के तहत चुनावी अधिसूचना जारी होने के बाद कोर्ट के चुनावी प्रक्रिया दखल देने का दायरा काफी सीमित हो जाता है। जहां तक बात महाराष्ट्र विधानसभा की है तो इसको लेकर पहले ही अधिसूचना जारी कर दी गई थी। इसलिए फिलहाल हम याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार नहीं कर सकते है। वह चुनाव खत्म होने के बाद चुनावी याचिका दायर कर नामांकन संबंधी खामी को चुनौती दे सकता है। 


लूट के आरोपी को नहीं मिली राहत, हाईकोर्ट ने कहा- चाकू जानलेवा हथियार

वही कोर्ट ने एक मामले में कहा कि कोई हथियार जानलेवा है कि नहीं यह मामले की वारदात से जुड़े तथ्यों व परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यह बात कहते हुए बांबे हाईकोर्ट ने आरोपी की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमे चाकू को जानलेवा की बजाय एक छोटा हथियार बताया गया था। मामला लूट के मामले में आरोपी शहदाब मेहदी से जुड़ा है। जिसे निचली अदालत ने राहत देने से इंकार कर दिया था। इसलिए उनसे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। पुलिस ने मेहदी सहित चार आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 392, 397 व 34 के तहत मामला दर्ज किया था। निचली अदालत में मेहदी ने दावा किया था कि इस मामले में धारा 397 लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि वारदात में जिस चाकू का इस्तेमाल किया गया था वह आकार में काफी छोटा था। चाकू की लंबाई 10 सेंटीमीटर थी। जिसमे 4 सेंटीमीटर का हैंडल था और 6 सेंटीमीटर का धारदार ब्लेड था। इस दौरान आरोपी की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सुभाष झा ने दावा किया कि इस मामले में जिस चाकू का इस्तेमाल किया गया था वह काफी छोटा था जिसे जानलेवा हथियार नहीं माना जा सकता है। नासमझी के चलते इस प्रकरण में धारा 397 (वारदात में जानलेवा हथियार का इस्तेमाल) आरोपियों पर लगाई गई है। न्यायमूर्ति भारती डागरे ने मामले से जुड़े तथ्यों पर गौर करने के बाद पाया कि आरोपियों ने रात दस बजे बस स्टाप पर खड़े शिकायतकर्ता व उसकी बहन को पकड़ा। एक आरोपी ने शिकायतकर्ता के गले पर चाकू रखकर उसकी जेब से एक हजार रुपए  निकाल लिए जबकि दूसरा आरोपी उसकी बहन के हाथ से पर्स छीनकर फरार हो गए। यह सब चाकू की नोक पर धमका कर किया गया। न्यायमूर्ति ने कहा कि आईपीसी में जानलेवा हथियार की परीभाषा नहीं दी गई है लेकिन जानलेवा हथियार शब्द अपने आप में ऐसे घातक हथियार को दर्शाता है। न्यायमूर्ति ने कहा कि कोई भी हथियार जानलेवा है या नहीं यह मामले से जुड़े तथ्य व परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यह कहते हुए न्यायमूर्ति ने आरोपी के आवेदन को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति ने साफ किया कि हमारा यह आदेश सिर्फ इस याचिका तक ही सीमित है। 

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