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सरकारी अधिकारियों को नियुक्त करें ग्राम पंचायत प्रशासक

सरकारी अधिकारियों को नियुक्त करें ग्राम पंचायत प्रशासक

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि ग्रामपंचायत के प्रशासक की नियुक्ति में सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति को प्राथमिकता दी जाए।यदि निजी व्यक्ति की प्रशासक के तौर पर नियुक्ति की जाती है तो इसको लेकर विस्तृत कारण दिया जाए। हाईकोर्ट ने यह बात बड़ी संख्या में ग्रामपंचायतो में प्रशासकों की नियुक्ति के सरकार के निर्णय के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कही। बुधवार को  न्यायमूर्ति नीतिन जामदार व न्यायमूर्ति अभय आहूजा की खंडपीठ के सामने इन याचिकाओं पर सुनवाई हुई। याचिका में मुख्य रूप से सरकार के 14 जुलाई 2020 को जारी शासनादेश व ग्रामपंचायत अधिनियम में किए गए संसोधन को लेकर जारी अध्यादेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने अभी इस शासनादेश पर रोक नहीं लगाई है। दरअसल महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में ग्रामपंचायतो का कार्यकाल पूरा हो गया है। पर कोरोना संकट के चलते चुनाव टालने पड़े हैं। इस लिए राज्य सरकार ने इन ग्राम पंतायतों के लिए पालकमंत्री की सलाह से प्रशासक नियुक्त करने का आदेश जारी किया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रसासक नियुक्त करना चाहती है। याचिका में प्रशासक  की नियुक्ति को मनमानी  व दुराशयपूर्ण बताया गया है। यह लोकतांत्रिक सिद्धान्तों के खिलाफ है। रायगढ़ जिले के दो ऐसे सरपंचों ने भी इस संबंध में याचिका दायर की है। जिनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है। 

कार्यकाल समाप्त होने पर ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने जा रही सरकार 

सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता आशुतोष कुम्भकोणी ने कहा कि राजस्व विभाग में 40 प्रतिशत पद रिक्त हैं। जो कर्मचारी है वे कोरोना महामारी के नियंत्रण में लगे हैं। इसलिए सरकार ने योग्य निजी लोगों को प्रशासक के तौर पर नियुक्ति करने के विषय में शासनादेश जारी किया है। निजी व्यक्ति को उस गांव का निवासी होना जरुरी है और मतदाता सूची में उसका नाम होना चाहिए। सरकार का शासनादेश नियमों के तहत है। उन्होंने कहा कि इस विषय को लेकर औरंगाबाद में भी याचिका दायर की गई है। इसलिए जरुरी है कि सभी याचिकाओं को एकत्रित किया जाए। 

वहीं याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सरकार का शासनादेश राजनीति से प्रेरित है। क्योंकि प्रशासक की नियुक्ति के लिए जिला परिषद के मुख्यकार्यकारी अधिकारी को जिले के पालक मंत्री से परामर्श लेना जरुरी किया गया है। वहीं एक अन्य याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इस मामले में राज्य चुनाव आयोग ही उचित निर्णय ले सकता है। मामले से जुड़े सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने उपरोक्त बात कही और कहा कि सभी नियुक्तिया कोर्ट के आदेश के अधीन होगी। हाईकोर्ट ने फिलहाल मामले की सुनवाई सोमवार तक के लिए स्थगित कर दिया। 
 
 

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