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हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा - 70 साल की उम्र में दुकान खोलूं तो क्या रोक दोगे

हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा - 70 साल की उम्र में दुकान खोलूं तो क्या रोक दोगे

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि जब राज्य सरकार वरिष्ठ नागरिक को अपनी दुकान खोलकर वहां सारा दिन बैठने की इजाजत देती है, तो वह किस आधार पर मौजूदा लॉकडाउन में 65 साल के ऊपर के लोगों को फिल्मों की शूटिंग में काम करने से रोक रही हैं। अच्छी सेहत के बावजूद 65 साल के ऊपर के लोगों को कार्य करने से रोकने सरकार का निर्णय भेदभावपूर्ण प्रतीत होता हैं। राज्य सरकार ने किस आधार पर यह निर्णय किया है, वह हमें इसकी जानकारी हलफनामे में दे। न्यायमूर्ति एसजे काथावाला की खंडपीठ ने कहा कि सरकार ने 65 से उपर के लोगों को कार्य से रोकने के लिए किस आकड़े को आधार बनाया है। यदि ऐसा है, तो इसका ब्यौरा भी हलफनामे में दिया जाए। क्या सरकार ने सभी पेशे से जुड़े 65 साल के लोगो को कार्य से रोका है? सरकार ने अपना यह निर्णय किन किन क्षेत्रो में लागू किया है?

फिल्मों में 65 साल से अधिक उम्र वालों को काम करने से रोकने का मामला 

खंडपीठ ने यह सवाल टीवी अभिनेता प्रमोद पांडे की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान किया। पांडे ने कहा कि वे चार दशक से फिल्मों व धारावाहिक में छोटी भूमिकाएं निभा रहे हैं। वे शारीरिक रूप से कार्य के लिए फिट हैं। फिर भी उन्हें कार्य से रोका जा रहा है। जो उन्हें जीविक चलाने से वंचित कर रहा है। इसलिए सरकार के फिल्मों में 65 साल के उपर लोगों को काम करने से रोकने वाले दिशा-निर्देश को रद्द कर दिया जाए। इससे पहले सरकारी वकील पूर्णिमा कंथारिया ने कहा कि कोरोना महामारी के कारण सभी वरिष्ठ नागरिकों को घर से बाहर जाने पर रोक लगाई गई है। उन्हें सिर्फ आवश्यक होने पर ही घर से निकलने की छूट है। 65 साल के ऊपर के लोगों को काम करने को लेकर पाबंदी केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों के तहत लगाई गई है। इन दलीलों को सुनने के बाद खंडपीठ ने उदाहरण के तौर पर कहा कि कहा कि  "यदि मैं 70 साल की उम्र में अपनी दुकान खोलकर वहां बैठना चाहूं, तो क्या सरकार मुझे रोकेगी?’ जवाब में सरकारी वकील ने कहा नहीं। इस पर खंडपीठ ने कहा फिर 65 साल के कलाकारों को किस आधार पर कार्य से रोका जा रहा हैं? खंडपीठ ने अब याचिका की सुनवाई अगले सप्ताह रखी है और मामले की पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता शरण जगतियानी को न्यायमित्र के रुप में नियुक्त किया है।

सिर्फ बूचड़खाने में काटे जाएं पशु 

इसके अलावा बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि निजी दुकानों अथवा अन्य किसी स्थल पर जीवित पशु को न काटा जाए। पशुओं को बूचड़खाने से काट कर बिक्री के लिए दुकानों पर लाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह बात पेशे से वकील राजेश कुमार कनौजिया की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कही। इससे पहले याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता विवेक शुक्ला ने कहा कि निजी दुकानों को सिर्फ मांस बेचने का लाइसेंस दिया जाता है। उन्हें दुकानों में जीवित पशु काटने की इजाजत नहीं है। याचिका में दावा किया गया था कि  मांस बेचने वाली निजी दुकानों में कोरोना के दौरान सामाजिक दूरी का पालन नहीं किया जाता। दुकानों में स्वास्थ्य से जुड़ी स्वच्छता का भी पालन नहीं होता। याचिका में कहा गया था कि निजी दुकानों में जीवित भेड़, बकरी व अन्य पशुओं को रखने से रोका जाए। क्योंकि दुकानों में अवैध रूप से पशुओं को रखा जाता है। इस बारे मुंबई महानगपालिका के अधिकारियों से शिकायत करने के बाद भी कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। याचिका के मुताबिक पिछले साल हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने भी दुकानों में पशुओं को न काटने के विषय में निर्देश जारी किए थे। इसके बावजूद इससे संबंधित निर्देश को कड़ाई से नहीं लागू किया जा रहा। याचिका पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति एस जे काथावाला की खंडपीठ ने निजी दुकानों पर जीवित पशुओं के काटने पर रोक लगा दी और कहा कि सिर्फ बूचड़खाने में ही पशुओं को काट कर लाया जाए। इसके साथ ही याचिका को समाप्त कर दिया। 

सभ्य लोग भी नियमों के पालन को लेकर करते हैं लापरवाही

वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि कोरोना संक्रमण से जुड़े नियमों की अनदेखी के लिए सिर्फ भिखारियों को निशाना बनान गलत है। क्योंकि सभ्य लोग भी सामाजिक दूरी व कोरोना संक्रमण को रोकने वाले नियमों के पालन में लापरवाही दिखाते हैं। मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता व माधव जामदार की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। इस विषय पर पुणे निवासी ज्ञानेश्वर दारवाटकर ने याचिका दायर की है। याचिका में मांग की गई है कि सड़को पर भीख मांगने वाले बच्चों व महिलाओं के लिए घर बनाए जाए और इनका पुनर्वास किया जाए। सुनवाई के दौरान याचिका कर्ता के वकील शेखर जगताप ने कहा कि सड़कों व ट्रैफिक सिग्नल में भीख मांगने वाले सामाजिक दूरी का पालन नहीं करते। कई तो मास्क तक नहीं लगाते। इससे कोरोना का संक्रमण अधिक है। इन दलीलों को सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि सामाजिक दूरी से जुड़े नियमों की अनदेखी के लिए सिर्फ भिखारियों को जिम्मेदार न ठहराया जाए, यहां तक कि सभ्य लोग इसकी अनदेखी करते हैं। भिखारियों के प्रति संवेदनशील रुख अपनाया जाए। क्योंकि देश काफी कठिन समय से गुजर रहा है। इसलिए भिखारियों को निशाना बनाना सही नहीं है। यह बात कहते हुए खंडपीठ ने राज्य सरकार व पुणे महानगपालिका को याचिका को लेकर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई 14 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी। 

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