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हाईकोर्ट : 10 वीं की परीक्षा कराना चाहता है आईसीएसई, हाउसिंग सोसायटी में प्रवेश के नियमों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका

हाईकोर्ट : 10 वीं की परीक्षा कराना चाहता है आईसीएसई, हाउसिंग सोसायटी में प्रवेश के नियमों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका

डिजिटल डेस्क, मुंबई। कॉउन्सिल फॉर इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन बोर्ड (आईसीएसई) ने बॉम्बे हाईकोर्ट को सूचित किया है कि परीक्षा का आयोजन गैर अध्यापन से जुड़ी गतिविधि है। इसलिए वह कक्षा 10 वीं की परीक्षा आयोजित करने के पक्ष में है। जबकि राज्य के महाधिवक्ता आशुतोष कुम्भकोणी ने परीक्षा के आयोजन का विरोध किया है। महाधिवक्ता के मुताबिक कोरोना संक्रमण के कारण महाराष्ट्र में गंभीर स्थिति है। इसलिए वह परीक्षा के आयोजन के पक्ष में नहीं है। हाईकोर्ट में पेशे से वकील अरविंद तिवारी की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है।याचिका में आईसीएसई बोर्ड की ओर से 2 जुलाई से 12 जुलाई तक होने वाली परीक्षा को रद्द करने की मांग की गई हैं। ऐसे ही 1 जुलाई से इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट बोर्ड की 12 वीं की परीक्षा को लेकर भी ऐतराज जताया गया है। याचिका में कहा गया है कि कोरोना के चलते बच्चों के जीवन व स्वास्थ्य को खतरा है। इसलिए बच्चों को उनके पुराने प्रदर्शन के आधार पर पास कर दिया जाए। शुक्रवार को आईसीएसई बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व सचिव का हलफनामा मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता की खंडपीठ के सामने पेश किया गया।हलफनामे के मुताबिक आईसीएसई बोर्ड राष्ट्रीय स्तर का बोर्ड है। केंद्र सरकार ने परीक्षा के आयोजन की अनुमति दी है। बोर्ड परीक्षा के आयोजन के दौरान सामाजिक दूरी,मास्क पहनने, सैनिटाइजर रखने सहित सुरक्षा से जुड़े सभी नियमों का पालन करने को तैयार है। राज्य में कक्षा 10 वीं में 23347 विद्यार्थी हैं। हलफनामे में याचिका को आधारहीन बताया गया है। 
हलफनामे के अनुसार के पूरे देश में बोर्ड के2605 स्कूल हैं। बोर्ड पहले कोरोना के चलते एक बार परीक्षा रद्द कर चुका है। अब केंद्र सरकार ने परीक्षा के आयोजन की अनुमति दे दी है। इसके अलावा जो छात्र कोरोना संक्रमित हैं अथवा प्रतिबंधित क्षेत्र में रहते हैं अथवा उनके परिवार के लोग कोरोना बाधित हैंऔर वे परीक्षा में शामिल होने के इच्छुक नहीं हैं, ऐसे बच्चे सितंबर में होनेवाली परीक्षा में शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा परीक्षा गैर अध्यापन से जुड़ी गतिविधि है। इसलिए मौजूदा परिस्थिति में परीक्षा का आयोजन हो सकता है। याचिकाकर्ता वकील अरविंद तिवारी ने इसका विरोध किया और कहा कि फिलहाल बच्चों की मानसिक स्थिति परीक्षा देने की नहीं है। इसलिए परीक्षा न ली जाए। याचिका पर सोमवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। 
 

कोरोना के कारण कितने कैदियों ने मांगी जमानत, निचली अदालतों से पूछा 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य की सभी निचली अदालतों से जानना चाहा है कि उसके यहां कोरोना के प्रकोप के मद्देनजर कैदियों को अंशकालिक जमानत पर रिहा करने के कितने आवेदन दायर हुए हैं। और निचली अदालतों ने ऐसे कितने आवेदनों का निपटारा किया है। जिससे जेल में भीड़ कम हो और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो सके। वर्तमान में राज्य की जेलों में 37 हजार कैदी बंद है जबकि जेल की क्षमता 24 हजार कैदियों की है। मामले की पिछली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को सूचित किया था कि जेल से कैदियों को अंशकालिक जमानत पर रिहा करने के लिए 14400 आवेदन दायर किए जाएंगे। इस पर हाईकोर्ट ने निचली अदालतों को इन आवेदनों का शीघ्रता से निपटारा करने को कहा था। हाईकोर्ट में ‘पीपल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी’ नामक संस्था की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई चल रही है। याचिका में कैदियों की कोरोना से सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था किए जाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया है। शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील मिहिर देसाई ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्देश के बावजूद निचली अदालतों में कैदियों के जमानत आवेदन पर शीघ्रता से सुनवाई नहीं हो रही है। इस पर खंडपीठ ने निचली अदालतों को दायर किए गए और निपटाए गए जमानत आवेदन का ब्यौरा देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही जेल प्रशासन को स्पष्ट करने को कहा कि जेल में कैदियों की जांच के लिए क्या व्यवस्था है। क्या कैदियों को वीडियो कॉलिंग की सुविधा दी गई है? गौरतलब है कि अब तक करीब 8 हजार कैदियो को जमानत पर जेल से छोड़ा गया है। 

हाउसिंग सोसायटी में प्रवेश के नियमों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका

कोरोना के प्रकोप के बीच हाउसिंग सोसायटी की ओर से बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को लेकर मनमाने तरीके से बनाए जा रहे नियमों को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई हैं। याचिका में कहा गया है कि हाउसिंग सोसायटी मेहमान और नौकर को प्रवेश देने से पहले उनसे कोरोना न होने का प्रमाण मांग रही हैं। जबकि यह इंडियन कॉउन्सिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) और राज्य सरकार की ओर से मिशन बेगिन के नाम से जारी किए गए दिशा-निर्देशों के खिलाफ है। यह याचिका पेशे से वकील युसुफ इकबाल ने दायर की हैं। याचिका के मुताबिक राज्य सरकार ने फिर से स्थिति को पहले जैसे सामान्य बनाने के लिए लॉकडाउन में काफी ढील दी है। जिससे लोग आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सके। लेकिन हाउसिंग सोसायटी की ओर से मनमाने तरीके से बनाए जा रहे अतार्किक नियम सोसायटी में आने वाले आगंतुकों, घरेलू नौकरों के लिए मुसीबत बन रहे हैं। इसलिए राज्य सरकार को मुंबई महानगर क्षेत्र में स्थित सभी हाउसिंग सोसायटी के लिए समान दिशा- निर्देश जारी करने का आदेश जारी किया जाए। 

किसानों से शेष कपास कब खरीदोगे? राज्य सरकार से मांगा जवाब 

उधर औरंगाबाद में बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पांच जून को राज्य सरकार व पणन विभाग को कपास उत्पादक किसानों की शेष कपास 12 जून तक खरीदने के आदेश दिए थे। इस पर शुक्रवार को सुनवाई के दौरान खंडपीठ के न्यायमूर्ति प्रसन्न वराले व न्यायमूर्ति आरजी अवचट की पीठ ने राज्य सरकार व कपास पणन महासंघ से कपास खरीदी कब तक करोगे? यह सवाल पूछ कर पक्ष रखने के आदेश देकर याचिका की सुनवाई 16 जून को रखी है। याचिकाकर्ता किसान की कपास खरीदी करने से याचिका का निपटान करने का अनुरोध सरकार ने किया था। यह केवल याचिकाकर्ता किसान का प्रश्न नहीं है। राज्य के बगैर खरीदी गई कपास की समस्या होने का पक्ष रखा गया। किसानों की अनाज, पानी की सुविधा नहीं होने से कपास परिचालन करने वाले वाहनों को अतिरिक्त किराया देने की बात खंडपीठ के समक्ष रखी गई। किसानों ने एड विशांत कदम के जरिए खंडपीठ में याचिका दायर कर जिला उपनिबंधक के आदेश को चुनौती दी थी। राज्य सरकार की ओर से एड डीआर काले ने पक्ष रखा। 
 

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