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हाईकोर्ट : दाभोलकर-पानसरे मामले में जानकारी न हो लीक, भीमा-कोरेगांव के आरोपियों को मिली जमानत

हाईकोर्ट : दाभोलकर-पानसरे मामले में जानकारी न हो लीक, भीमा-कोरेगांव के आरोपियों को मिली जमानत

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर व गोविंद पानसरे की हत्या के लिए इस्तेमाल किए गए हथियार की खोज के लिए ठाणे की खाड़ी में जारी खोज अभियान से जुड़ी जांच रिपोर्ट भारत में अथवा विदेश में भी किसी के साथ न साझा की जाए। सीबीआई विदेशी विशेषज्ञ एजेंसियों की मदद लेकर ठाणे की खाड़ी में दाभोलकर हत्याकांड में इस्तेमाल किए गए हथियार की तलाश करने में जुटी है। न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी व न्यायमूर्ति रियाज छागाल की खंडपीठ ने कहा कि सीबीआई इस पर सतर्क रहे कि विदेशी विशेषज्ञ एजेंसी की ओर से हथियार के संबंध में दी जानेवाली जानकारी विदेशों अथवा भारत में कही पर भी लीक न की जाए। क्योंकि विदेशी एजेंसियों की ओर से हथियार के संबंध में दी जानेवाली जानकारी आरोपियों पर लगे आरोपों को साबित करने के लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। इन एजेंसियों से जुड़े लोगों को गवाह के रुप भी बुलाया जा सकता है। इसलिए हथियार की तलाशी से जुड़े ब्यौरे को गोपनीय रखने को लेकर सतर्कता बरती जाए। अन्यथा इसका असर मुकदमे की सुनवाई पर भी पड सकता है। निष्पक्षता व और पारदर्शिता के लिहाज से भी यह सतर्कता जरुरी है। प्रकरण में गिरफ्तार लोग अभी सिर्फ अपराध के आरोपी  है। उन पर लगे आरोपों को सबूतों के आधार पर ही साबित किया जा सकता है। इसलिए सीबीआई इस मामले को लेकर सतर्कता बरते। सीबीआई की ओर से पैरवी कर रहे एडिशनल सालिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा है कि हथियार को खोजने में अभी 45 दिन का समय लगेगा। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 19 दिसंबर को रखी है। 

भीमा-कोरेगांव हिंसा के दौरान हत्या मामले के आरोपियों को मिली जमानत

बांबे हाईकोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा के दौरान एक युवक की कथित हत्या के मामले से जुड़े दो आरोपियों को जमानत प्रदान की है। इन आरोपियों के नाम तुषार जोज व चेतन अलहट है। दोनों आरोपियों को भीमा-कोरेगांव हिंसा के दौरान राहुल फटांगडे नाम के युवक की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था। पुलिस ने दोनों आरोपियों को सीसीटीवी फुटेज की मदद से गिरफ्तार किया था। दो साल से जेल में बंद आरोपियों ने कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन किया था। न्यायमूर्ति पीडी नाइक के सामने दोनों आरोपियों के जमानत आवेदन पर सुनवाई हुई। इस दौरान आरोपियों के वकील संतोष पवार ने दावा किया कि मरे मुवक्किल दो साल से जेल में है। सिर्फ मेरे मुवक्किल युवक फटांगडे के शव के पास स्टैंप लेकर खडे थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि इन्होंने ही युवक की हत्या की है। इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है जिसने मेरे मुवक्किल को युवक की हत्या करते देखा हो। इसके अलावा मेरे मुवक्किल दो साल से जेल में है और इनकी उम्र काफी कम है। इसलिए उन्हें जमानत प्रदान की जाए। इन दलीलों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने आरोपी को जमानत प्रदान कर दी। 
 

नियुक्ति के समय नाबालिग होने के आधार पर नौकरी से नहीं हटा सकते

बांबे हाईकोर्ट ने नियुक्ति के समय नाबालिग होने के आधार पर कर्मचारी को नौकरी से निकालने को लेकर शुरु की गई प्रक्रिया को रद्द कर दिया है। परियोजना प्रभावित दिनेश कानगुडे को 21 साल की सेवा के बाद इसलिए नौकरी से हटाने का नोटिस जारी किया था क्योंकि नियुक्ति के समय उसकी उम्र 17 साल 10 महीने थी। मीरा-भायंदार महानगर पालिका ने 1997 में क्लर्क पद के लिए भर्ती निकाली थी। इसमें परियोजना प्रभावितों के लिए भी पद आरक्षित थे। चूंकी परियोजना प्रभावितों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता दी जाती है इसलिए कानगुडे ने क्लर्क पद की नौकरी के लिए आवेदन किया। पद से जुड़ी परीक्षा के बाद कानगुड़े का नौकरी के लिए चयन कर लिया गया। 2 मई 1998 को क्लर्क के रुप में कानगुडे ने अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली। नौकरी के लिए किए गए आवेदन में कानगुडे ने अपनी जन्म तारीख 2 जुलाई 1980 बताई थी। यही तारीख कानगुडे के सर्विस रिकार्ड में दर्ज की गई थी। इस बीच कानगुड़े के खिलाफ एक शिकायत मिली जिसके आधार पर कानगुडे के खिलाफ विभागीय जांच की गई। इस दौरान पाया गया कि क्लर्क पद पर नियुक्ति के लिए 18 साल की उम्र तय की गई थी। लेकिन नियुक्ति के समय कानगुडे की उम्र 17 साल 10 महीने थी। इस लिहाज से नियुक्ति के समय कानगुडे वयस्क यानी 18 साल के नहीं थे। इस आधार पर महानगरपालिका आयुक्त ने कानगुडे को नौकरी से हटाने के लिए 14 नवंबर 2019 को कारण बताओ नोटिस जारी किया। जिसमें कहा गया था कि क्यों न कानगुडे की सेवा को समाप्त कर दिया जाए। इसके खिलाफ कानगुडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। न्यायमूर्ति आरवी मोरे व न्यायमूर्ति एमएस कर्णिक की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान कानगुडे के वकील एन वी बांदिवडेकर ने कहा कि नियुक्ति के समय मेरे मुवक्किल ने अपने सारे दस्तावेज सत्यापन के लिए महानगरपालिका को सौपे थे। ऐसा नहीं है कि मेरे मुवक्किल ने अपनी जन्म तारीख छुपाई थी। 21 साल की सेवा के बाद अब मेरे मुवक्किल को नौकरी से निकालना काफी कड़ी सजा है। उन्होंने कहा कि नियुक्ति के समय मेरे मुवक्किल की उम्र 18 साल पूरा होने में सिर्फ दो महीने कम थे। इसलिए मेरे मुवक्किल से नाबालिग के रुप में किए गए कार्य के एवज में दो महीने का वेतन वापस ले लिया जाए। मनपा के वकील ने एनआर बूबना ने यचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जांच के दौरान याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया कि नियुक्ति के समय नाबालिग था। ऐसे में इस मामले में हस्तक्षेप न किया जाए। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को नौकरी से निकालने को काफी कड़ी सजा माना। खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने नियुक्ति के समय अपने सारे दस्तावेज महानगरपालिका को सौपे थे। जिसमे उसके स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट का भी समावेश था। इस सर्टिफिकेट में याचिकाकर्ता की जन्म तारीख का भी उल्लेख किया गया था। इस स्थिति में नियुक्ति के समय याचिकाकर्ता नाबालिग था। इसके लिए सिर्फ उसे ही जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है। इसलिए हम याचिकार्ता को नौकरी से हटाने के संबंध में जारी की गई नोटिस को रद्द करते हैंष याचिकाकर्ता 18 साल पूरे होने से पहले नाबालिग के रुप में काम करने के एवज में मिले दो महीने का वेतन मनपा को 15 दिनों में वापस लौटाए। 
 

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