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हाईकोर्ट : पीजीडीबीएम कोर्स पर एआईसीटीई के निर्देशों पर रोक नहीं, भाजपा सांसद सिध्देश्वर को अंतरिम राहत

हाईकोर्ट : पीजीडीबीएम कोर्स पर एआईसीटीई के निर्देशों पर रोक नहीं, भाजपा सांसद सिध्देश्वर को अंतरिम राहत

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने  फिलहाल आल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एज्युकेशन (एआईसीटीई) के उन निर्देशों पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है जिसके तहत  पोस्ट ग्रेज्यूएट डिप्पलोमा इन बिजनेस मैनेजमेंट (पीजीडीबीएम) का कोर्स को शुरु करने के लिए नया संस्थान स्थापित करने की बात कही गई है। एआईसीटीई ने सभी विश्वविद्यालयों के वाइसचांसलर को प्रबंधन शिक्षा से जुड़े संस्थानों को नए नियमों को लागू करवाने का निर्देश भी दिया है। नए नियमों के तहत उस संस्थान में पीजीडीबीएम का कोर्स नहीं शुरु किया जा सकता है जहां पहले से एमबीए व मास्टर इन मैनेजमेंट स्टडी के कोर्स जारी है। एसोसिएशन आफ इंडियन मैनेजमेंट स्कूल ने इस विषय पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की हैं। याचिका में मुख्य रुप से एआईसीटीई की अप्रूवल प्रोसेस से जुड़ी हैंडबुक(2021) की वैधता को चुनौती दी गई है। जिसके अंतर्गत पीजीडीबीएम कोर्स शुरु करने को लेकर नए नियम बनाए गए हैं।न्यायमूर्ति एसएस शिंदे व न्यायमूर्ति विरेंद्र सिंह बिस्ट की खंडपीठ ने याचिका पर गौर करने के बाद कहा कि जब तक हम इस याचिका के जवाब में एआईसीटीई के हलफनामे को नहीं देख लेते है तब तक हम कोई भी अंतरिम आदेश जारी नहीं कर सकते। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता वीए थोरात ने कहा कि प्रबंधन शिक्षा को लेकर एआईसीटीई ने जो नए नियम लाए है वो काफी कठोर है। उन्होंने कहा कि एआईसीटीई चाहती है कि पीजीडीबीएम कोर्स के लिए नया संस्थान शुरु किया जाए। इसके अलावा नया संस्थान खोलने के लिए आधा एकड़ जमीन होने की बाध्यता रखी गई हैं। मुंबई में सिर्फ जमीन से जुड़ी शर्त को पूरा करने के लिए पांच सौ करोड़ रुपए चाहिए। इसलिए प्रबंधन शिक्षा से जुड़े एआईसीटीई के नियम तर्कसंगत नहीं है। इसलिए इन पर रोक लगाई जाए। वहीं एआईसीटीई के वकील ने याचिका को आधारहीन बताया। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने एआईसीटीई को याचिका में उठाए गए मुद्दे को लेकर हलफनामा दायर करने को कहा और मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। 

भाजपा सांसद जय सिध्देश्वर को हाईकोर्ट ने दी अंतरिम राहत

बांबे हाईकोर्ट ने सोमवार को सोलापुर इलाके से भारतीय जनता पार्टी के सांसद डाक्टर जय सिद्धेश्वर शिवाचार्य  को अंतरिम राहत राहत दी है। हाईकोर्ट ने कहा है कि सांसद शिवाचार्य के खिलाफ तहसीलदार तत्काल आपराधिरक मामला न दर्ज कराए। यदि मामला दर्ज करा दिया गया हो तो उस पर उचित कार्रवाई की जाए। हाईकोर्ट में शिवाचार्य के जाति प्रमाणपत्र को अवैध ठहराए जाने के निर्णय के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई चल रही है। पिछले दिनों सोलापुर जिला जाति प्रमाणपत्र वैधता कमेटी ने सांसद शिवाचार्य के जाति प्रमाणपत्र को फर्जी पाया था और उसे स्वीकर करने से इंकार कर दिया था। इसके साथ ही शिवाचार्य के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने का भी निर्देश दिया था। याचिका में कमेटी के इस निर्णय को सांसद शिवचार्य ने कोर्ट में चुनौती दी है। न्यायमूर्ति केके तातेड व न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रसाद ढाकेफालकर ने खंडपीठ से मामले में अंतरिम आदेश जारी करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि मेरे मुवक्किल के खिलाफ मामले की सुनवाई से पहले आपराधिक मामला न दर्ज किया जाए। जिसका  शिकायतकर्ता के वकील सदाव्रते गुणरत्ने ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि उन्हें याचिका की प्रति नहीं मिली है। इस पर खंडपीठ ने याचिका की प्रति श्री सदाव्रते को दी जाए। और मामले की सुनवाई 13 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी। याचिका में दावा किया गया है कि जाति सत्यापन से जुड़ी कमेटी ने याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने व दस्तावेजी सबूत पेश करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया है। इसके साथ ही मेरी जाति प्रमाणपत्र को लेकर शिकायत देनेवाले शिकायतकर्ता  प्रभावित लोग नहीं है। इसलिए उनके पास मेरे किलाफ शिकायत करने का हक नहीं है। याचिका में जाति प्रमाणपत्र को लेकर विजलेंस सेल( सतर्कता प्रकोष्ठ ) की ओर से सौपी गई रिपोर्ट पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिका में मांग की गई है कि समिति के 20 फरवरी 2020 के उस निणर्य को रद्द कर दिया जाए जिसके तहत मेरे जाति प्रमाणपत्र के दावे को अस्वीकार किया  गया है।  इस बार के लोकसभा चुनाव में सोलापुर की सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। इसी सीट से शिवाचार्य ने चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार शिंदे व वंचित बहुजन अघाडी के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर को हराकर जीत हासिल की थी। 
 

शिक्षकों के खिलाफ नहीं मिला विद्यार्थियों को आत्महत्या के लिए उकसाने का सबूत

पुलिस ने बांबे हाईकोर्ट को सूचित किया है कि विद्यार्थियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों का सामना कर रहे चार शिक्षकों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है। दरअसल संस्कृत विषय में कम अंक मिलने के चलते विरार स्थित एक स्कूल के तीन बच्चों ने नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। जांच में पता चला था कि पानी में डूबने के चलते बच्चों की मौत हुई हैं। मामले की जांच प्रभावी तरीके से न किए जाने की मांग को लेकर एक बच्चे की मां ने बांबे हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति आरवी मोरे की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान सहायक सरकारी वकील प्राजक्ता शिंदे  ने खंडपीठ के सामने कहा कि पुलिस ने साल 2014 के इस मामले की जांच पूरी कर आरोपपत्र दायर कर दिया है। पुलिस को शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के संबंध में कोई सबूत नहीं मिले है। जांच में पता चला है कि शिक्षकों ने कम अंक मिलने के चलते बच्चों को डांटा था और उनकी पीटाई की थी। इसके चलते बच्चे स्कूल से भाग गए थे।  यह जानकारी मिलने के बाद खंडपीठ ने कहा कि पुलिस इस मामले को लेकर हलफनामा दायर करे। 
 

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