दैनिक भास्कर हिंदी: पति के साथ रहने की इच्छा हो तो 18 साल की उम्र के बाद नाबालिग का विवाह वैध - HC

May 6th, 2019

डिजिटल डेस्क, मुंबई। बांबे हाईकोर्ट ने कहा है कि 56 वर्षीय वकील से विवाह करनेवाली नाबालिग लड़की ने 18 साल की उम्र के बाद वकील के साथ उसकी पत्नी के रुप में रहने की इच्छा जाहिर की है। इसलिए अब वकील का विवाह वैध हो गया है। न्यायमूर्ति आरवी मोरे व न्यायमूर्ति भारती डागरे की खंडपीठ ने नाबालिग से विवाह करने के मामले में आरोपी वकील की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। याचिका में वकील ने खुद के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग की है। वकील ने साल 2014 में जब लड़की से विवाह किया था तो उसकी उम्र 14 साल थी। इसलिए नाबालिग लड़की से शादी करने के लिए वकील के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद वह 10 महीने तक जेल में था। अब वह जमानत पर है। और उसने लड़की की सहमति से आपराधिक मामला रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में आरोपी वकील ने कहा है कि 17 सितंबर 2018 को लड़की की उम्र 18 साल की हो गई है। इसलिए उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया जाए। इधर लड़की ने भी कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि उसने अपने विवादों को सुलझा लिया है। दादा-दादी के दबाव में उसने 14 साल की उम्र में जबरन विवाह किया था। अब वह वकील के साथ उसकी पत्नी के रुप में उसके साथ रहना चाहती है। ऐसे में यदि आपराधिक मामले को रद्द किया जाता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। अतिरिक्त सरकारी वकील अरुणा पई ने वकील की ओर से दायर याचिका का विरोध करेत हुए कहा कि इस तरह के मामलों को रद्द करने से गलत परंपरा बनेगी और लोगों के बीच में गलत संदेश जाएगा। इसलिए आरोपी के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द न किया जाए। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि हम लड़की के हित व कल्याण को लेकर चिंतित है। इसमे कोई दो राय नहीं कि शादी के समय लड़की नाबालिग थी। लेकिन अब वह वयस्क हो गई है। चूंकी अब बालिग है और उसने आरोपी के साथ पत्नी के रुप में रहने की इच्छा व्यक्त की है। इस लिहाज से आरोपी के साथ उसका विवाह वैध हो जाता है। खंडपीठ ने कहा कि अब यदि मामले को जारी रखा जाता है तो सबसे ज्यादा लड़की को ही परेशानी झेलनी पड़ेगी। अब कोई दूसरा उसे पत्नी के रुप में नहीं स्वीकार करेगा। इस स्थिति में लड़की के भविष्य को सुरक्षित करना सबसे महत्वपूर्ण है। खंडपीठ ने फिलहाल आरोपी वकील को लड़की के नाम पर दस एकड़ जमीन स्थानांतरित करने व सात लाख रुपए बैंक में फिक्स डिपाजिट करने का निर्देश दिया है। यह कहते हुए खंडपीठ ने पुलिस को निर्देश दिया है कि वह आरोपी के खिलाफ जांच न करे। खंडपीठ ने कहा कि पहले हम देखेगे की आरोपी ने हमारे आदेश का पालन किया है कि नहीं इसके बाद हम मामला रद्द करने के विषय में विचार करेगे। 

गैर अनुदानित पद पर नियुक्त शिक्षकों को अनुदानित पद पर किया जा सकता है स्थनांतरण हाईकोर्ट

इसके अलावा बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में साफ किया है कि गैर अनुदानित पद पर नियुक्ति शिक्षकों को अनुदानित पद पर स्थानांतरित किया जा सकता है। कानून इसकी इजाजत देता है। स्कूली शिक्षकों के समूह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया है। दरअसल शिक्षा अधिकारी ने गैर अनुदानित पद से अनुदानित पद पर नियुक्त किए गए शिक्षकों के स्थनांतरण को मंजूरी प्रदान करने से इंकार कर दिया था। जिसके चलते शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। न्यायमूर्ति भूषण गवई व न्यायमूर्ति संदीप शिंदे की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान शिक्षकों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता एनवी बांदिवणेकर ने कहा कि शिक्षकों को गैर अनुदानित पद से अनुदानिद पद पर स्थनांतरित किया जाना नई नियुक्ति के दायरे में नहीं आता है। इसलिए शिक्षा अधिकारी द्वारा गैर अनुदानित पद से अनुदानित पद पर स्थनांतरित किए जाने को मंजूरी न देना महाराष्ट्र एम्पालाइ प्राइवेट स्कूल एक्ट 1977 के प्रावधानों के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने अपने कई फैसलों में इस बात का स्पष्ट किया है। वहीं सरकारी वकील ने कहा कि शिक्षा अधिकारी ने सरकार की ओर से 25 जून 2016 को जारी शासनादेश के तहत गैर अनुदानित पद से अनुदानित पर पर स्थानांतरित किए गए शिक्षकों की मंजूरी देने से मना किया है। नियमानुसार स्कूल में जब अतिरिक्त शिक्षक (सरप्लस टिचर्स) न होने की स्थिति में ही गैर अनुदानित पद पर नियुक्ति शिक्षकों को अनुदानित पद पर स्थानांतरित किया जा सकता है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने व अतीत में हाईकोर्ट की ओर से दिए गए फैसलों पर गौर करने के बाद खंडपीठ ने कहा कि शिक्षा अधिकारी का मामले से जुड़े शिक्षकों के स्थनांतरण को मंजूरी न देने का निर्णय महाराष्ट्र एम्पालाइ प्राइवेट स्कूल एक्ट की धारा 41 के खिलाफ है। कानून गैर अनुदानित पद पर नियुक्त शिक्षकों को अनुदानित पद पर स्थानांतरित करन की इजाजत देता है। स्कूल प्रबंधन अपने किसी भी स्कूल में गैर अनुदानित पद पर नियुक्त शिक्षकों की अनुदानित पद स्थानांतरित कर सकता है। यह कहते हुए खंडपीठ ने शिक्षा अधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया और शिक्षकों की नियुक्ति से जुड़े प्रस्ताव पर नए सिरे से दो सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। 

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