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दैनिक भास्कर हिंदी: अफगानिस्तान की अपेक्षा बच्चों के लिए ज्यादा सुरक्षित है भारत, दादी के हाथ बच्चे सौंपने की अर्जी खारिज

April 21st, 2021

डिजिटल डेस्क, मुंबई। युद्धग्रस्त देश अफगानिस्तान की तुलना में भारत बच्चों के रहने के लिए बेहतर व सुरक्षित जगह है। बच्चों का हित व विकास दादी की बजाय मां अधिक सुनिश्चित कर सकती है। यह बात कहते हुए बांबे हाईकोर्ट ने अफगानिस्तान की नागरिक दादी को चार पोतों को सौंपने से इंकार कर दिया है। मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने व तथ्यों पर गौर करने के बाद कोर्ट ने कहा कि अफगानिस्तान एक युद्धग्रस्त देश है। जिसका असर वहां की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति पर पड़ता है। जो बच्चों पर मनोवैज्ञानिक असर डालेगा। जबकि भारत की परिस्थितिया अफगानिस्तान से बेहतर है। महज दादी की वित्तीय स्थिति बेहतर है, इसलिए बच्चों को उन्हें नहीं सौपा जा सकता है। इसके अलावा दादी की उम्र 79 साल है। जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। ऐसे में मां बच्चों का विकास बेहतर ढंग से सुनिश्चित कर सकती हैं। इसलिए दादी की याचिका को खारिज किया जाता है। लेकिन दादी को पोते से मिलने व फोन से अथवा ऑनलाइन बात करने की छूट दी जाती है। 

दादी ने पोतों को सौंपने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में दादी ने कहा था कि उनका बेटा पढ़ाई के लिए अफगानिस्तान से मुंबई आया था। यहां उसे एक लड़की से प्रेम हो गया। जिससे उसने साल 2010 में विवाह कर लिया।भारत में उसे दो बच्चे हुए। इसके बाद उनका बेटा व बहू काबुल में आ गए। जहां उसे दो और बच्चे हुए। इस बीच अफगानिस्तान सरकार द्वारा आतंकवादियों के ऊपर की गई बमबारी के दौरान उनके बेटे की मौत हो गई। इस घटना के बाद उनकी बहू साल 2018 में भारत आ गई। 
दादी की याचिका के मुताबिक अब उनकी बहु मुंबई के निकट कल्याण इलाके में एक कमरे के घर में अपने माता पिता व भाई के साथ खस्ताहाल स्थिति रह रही है। जबकि काबुल में उसका बड़ा घर है। उनके दूसरे बेटे अमेरिका में रहते हैं। उसकी वित्तीय स्थिति काफी अच्छी है। उसे पेंशन भी मिलती है। काबुल में वे बच्चों की परवरिश अच्छे ढंग से कर सकती हैं।

काबुल बच्चों के सर्वागीण विकास के लिए बेहतर जगह है। इसलिए उसकी बहु को बच्चों के साथ अफगानिस्तान जाने का निर्देश दिया जाएअथवा पोतों को उसे सौपा जाए। न्यायमूर्ति एस एस शिंदे व न्यायमूर्ति मनीष पीटाले की खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान बहु ने अपनी सास की याचिका का विरोध किया। बहु के वकील उजैर काजी ने दावा किया कि अफगानिस्तान में आए दिन हिंसक घटनाएं होती रहती हैं। एक हिंसक घटना में मेरे मुवक्किल ने अपने पति को गवा दिया है। इसके अलावा मुस्लिम कानून के मुताबिक पिता के मौत के बाद बच्चों पर पूरा हक मां का होता है। इसलिए दादी बच्चों की मांग नहीं कर सकती।

काजी ने कहा कि मेरी मुवक्किल के पास आय का अपना साधन है। उसके माता पिता व भाई उसे सहयोग कर रहे हैं। वह भारत में ही रहने की इच्छुक है। उसके दो बच्चे स्कूल जा रहे हैं। बच्चे भी यही रहना चाहते हैं। वे अपनी जड़ों से जुड़कर खुश हैं। मां बच्चों के हित को दादी से बेहतर सुनिश्चित कर सकती है। इस तरह मामले से जुड़े दोनों पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने दादी की याचिका को खारिज कर दिया। 

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