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वायु प्रदूषण के कारण उत्तरप्रदेश के बाद महाराष्ट्र में होती है सबसे ज्यादा मौत

वायु प्रदूषण के कारण उत्तरप्रदेश के बाद महाराष्ट्र में होती है सबसे ज्यादा मौत

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वायु प्रदूषण ने आम लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाकर गत कुछ वर्षों में न केवल आर्थिक बोझ को बढाया है बल्कि यह घातक और जानलेवा भी साबित हो रहा है। वायु प्रदूषण के कारण सर्वाधिक मौतें देश के महज पांच राज्यों में हुई है, जिसमें सबसे ज्यादा मौतों का एक बड़ा हिस्सा उत्तरप्रदेश के बाद महाराष्ट्र में दर्ज हुआ है। दिल्ली स्थित विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र के एक ताजा अध्ययन में दावा किया गया है कि वायु प्रदूषण के कारण देश के पांच राज्यों में समयपूर्व मौतें और रुग्णता बढ़ी है।विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र के स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2021 नामक अध्ययन के मुताबिक भारत में 2019 में 1.67 मिलियन लोगों की मौतों का कारण वायु प्रदूषण रहा है। इनमें 50 फीसदी यानी 851698 मौंते देश के पांच राज्यों में ही हुई है। इन पांच राज्यों में उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और राजस्थान शामिल हैं। वायु प्रदूषण के सर्वाधिक भुक्तभोगी यह पांच राज्य न केवल बड़ी आबादी वाले हैं बल्कि इन राज्यों में प्रति व्यक्ति आय भी बेहद कम है। वायु प्रदूषण से इन राज्यों में समयपूर्व मौतें और रुग्णता बढी है, जिससे इन राज्यों को 2019 में 36,803 अमेरिकी डॉलर की लागत का नुकसान उठाना पड़ा।

महाराष्ट्र में वायु प्रदूषण से 16.7% मौतें

आंकडें बताते है कि महाराष्ट्र में वायु प्रदूषण से 16.7 फीसदी (139,118 मौतें) हुई है। वहीं, आर्थिक जोखिम की बात करें तो यहां वायु प्रदूषण से 3975.40 अमेरिकी डॉलर की क्षति हुई जो राज्य के जीडीपी का 1.06 प्रतिशत है। 

वायु प्रदूषण अकाल मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण

स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2021 रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में उच्च रक्तचाप, तबांकू के इस्तेमाल और कुपोषित आहार के बाद वायु प्रदूषण ही पूरी दुनिया में अकाल मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण रहा है। वहीं, 2019 में 19 लाख मौतों में 58 फीसदी मौतें बाहरी वायु प्रदूषण के कारण हुई है, जबकि 36 फीसदी मौतें भीतरी यानी घर के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण के कारण हैं। घर में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक प्रदूषित ईंधन से खाने का पकाया जाना है। 2019 में वायु प्रदूषण के यह नतीजे नए नहीं है बल्कि बीते कुछ वर्षों से यह प्रवृत्ति चली आ रही है। वहीं, स र्वाधिक चिंताजनक बात यह है कि इसके शिकार बच्चे होते है। अध्ययन में 1990 से 2018 तक के उपलब्ध ग्लोबल बर्डन डिजीज (जीबीडी) के आंकडों के हवाले से बताया गया है कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ही सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण जनित निचले फेफडों का संक्रमण (एलआरआई) होता है। एलआरआई के संक्रमण से 1990 में 202.20 फीसदी (5.66 लाख मौतें) हुई थी जो कि 2017 में 17.9 फीसदी तक ही पहुंची। यानी करीब तीन दशक में एलआरआई से मौतों की फीसदी में होने वाली गिरावट की रफ्तार बेहद मामूली है। साफ है कि इस दिशा में प्रयास बुहत धीमे किए जा रहे है। 


 

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