Panna News: 40 साल से टिकरिया में गूंज रहे रामलीला के संवाद, गांव के कलाकारों ने बना दी सांस्कृतिक पहचान

40 साल से टिकरिया में गूंज रहे रामलीला के संवाद, गांव के कलाकारों ने बना दी सांस्कृतिक पहचान
नवरात्रि में राम जन्म से राज्याभिषेक तक के प्रसंगों का होता है मंचन, आसपास के गांवों से भी पहुंचते हैं दर्शक

डिजिटल डेस्क,पन्ना। जिले की ग्राम पंचायत टिकरिया में आस्था और परंपरा की एक ऐसी मिसाल देखने को मिलती है, जिसे ग्रामीणों ने चार दशक से सहेजकर रखा है। यहां नवरात्रि के दौरान पिछले 40 वर्षों से लगातार रामलीला का मंचन किया जा रहा है। श्री हरिदास के बंगले स्थित रामलीला मैदान में होने वाली यह रामलीला अब गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। खास बात यह है कि मंच पर रामायण के पात्रों को जीवंत करने वाले कलाकार बाहर से नहीं, बल्कि इसी गांव के निवासी हैं।

गांव के कलाकार, मंच पर साकार होते रामायण के प्रसंग

रामलीला में ग्रामीण कलाकार भगवान श्रीराम के जन्म से लेकर ताड़का वध, सीता हरण, लंका दहन, रावण वध और राम राज्याभिषेक तक के प्रसंगों का मंचन करते हैं। संवाद, संगीत और पारंपरिक वेशभूषा के माध्यम से कलाकार इन प्रसंगों को जीवंत रूप देने का प्रयास करते हैं। बिना किसी पेशेवर मंडली के ग्रामीणों द्वारा इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ाना अपने आप में खास है।

देर रात तक जुटते हैं दर्शक, आसपास के गांवों से भी पहुंचते हैं लोग

नवरात्रि के दौरान रामलीला देखने के लिए टिकरिया के साथ पवई, सिमरिया, रैपुरा सहित आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मंचन के दौरान दर्शकों में उत्साह बना रहता है और देर रात तक रामलीला मैदान में रौनक दिखाई देती है। ग्रामीणों के लिए यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आपसी मेल-मिलाप और सामूहिक सहभागिता का अवसर भी है।

नई पीढ़ी को संस्कृति और संस्कारों से जोड़ रही परंपरा

चार दशकों से जारी रामलीला की यह परंपरा गांव की नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और धार्मिक विरासत से जोड़ने का माध्यम बनी हुई है। ग्रामीणों का मानना है कि भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों के मंचन से बच्चों और युवाओं को सत्य, त्याग, कर्तव्य, आदर्श और मर्यादा की सीख मिलती है। स्थानीय स्तर पर सामूहिक प्रयासों से जीवित यह परंपरा ग्रामीण संस्कृति की मजबूती को भी दर्शाती है।

स्थानीय कलाकार निभा रहे महत्वपूर्ण भूमिकाएं

रामलीला में विकास पाठक एडवोकेट, विपिन धतुरहा, डॉ. रमेश विश्वकर्मा, सरमन लाल विश्वकर्मा, सुनील विश्वकर्मा, महेंद्र विश्वकर्मा, रुद्रपाल यादव, आलोक सिंह यादव, महाराज सिंह यादव, सतीश और नीरज सहित अनेक स्थानीय कलाकार विभिन्न भूमिकाएं निभा रहे हैं। ग्रामीणों की सहभागिता और निरंतर प्रयासों से चार दशक पुरानी यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ जारी है।

Created On :   16 Oct 2026 8:05 PM IST

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