Rewa news: मां सरस्वती के चतुर्भुज स्वरूप से आलोकित हुआ विंध्य क्षेत्र

मां सरस्वती के चतुर्भुज स्वरूप से आलोकित हुआ विंध्य क्षेत्र
दसवीं शताब्दी की कल्चुरी कालीन प्रतिमा दे रही गवाही

डिजिटल न्यूज़ रीवा

ज्ञान की देवी माता महा सरस्वती की चतुर्भुज पाषाण मूर्ति आज भी शहर के ऐतिहासिक वेंकट भवन के प्रवेश द्वार की न सिर्फ शोभा बढ़ा रही है बल्कि यह विशाल मूर्ति लोगों की आस्था और ज्ञान से भी जुड़ी हुई है। वेंकट भवन आने वाला हर व्यक्ति पहले माता सरस्वती का दर्शन अवश्य करता है। इसके बाद अन्य मूर्तियों का ज्ञानार्जन करता है। इस संबंध में इतिहासकार असद खान बताते हैं की माता महा सरस्वती की चतुर्भुज मूर्ति करीब 50 वर्ष पूर्व गोर्गी गुढ़ से यहां उस समय लाई गई थी जब गोर्गी के मंदिर गिरते जा रहे थे। मंदिरों के गिरने से मूर्तियां खंडित हो रही थी। मूर्तियों की सुरक्षा को लेकर राजशाही की ओर से वेंकट भवन लाकर स्थापित कराई गई थी। इनमें मां सरस्वती की मूर्ति भी शामिल थी।

देवी महा सरस्वती की आराधना से आलोकित था विंध्य प्रदेश !

इस समय दीपावली का माहौल चल रहा है ऐसे में मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना कर धन प्राप्त की लोग कामना करते हैं। लेकिन ऐसा माना जाता है कि बिना ज्ञान के धन की प्राप्त नहीं होती और ज्ञान की देवी महा सरस्वती है। विंध्य क्षेत्र विकास का कारण भी मां सरस्वती के ज्ञान को माना जा रहा है क्योंकि पुरातत्व संग्रहालय में स्थापित दशमी शताब्दी की यह आकर्षक मूर्ति यह दर्शाती है कि कभी मंदिर में इनकी विधिवत पूजा आराधना होती रही होगी। लेकिन अब यहां मूर्ति खंडित होने के कारण तथा पुरातत्व विभाग के नियमों के तहत यह मूर्ति केवल लोगों के दर्शन और ज्ञानार्जन तक सीमित रह गई है। लेकिन ज्ञान की संपन्नता में मां सरस्वती का महत्व आज भी बरकरार है।

कलचुरी शैली की है मूर्ति

पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारी जयराम पांडे बताते हैं कि मां सरस्वती की यह मूर्ति दशमी शताब्दी की कलचुरी कालीन उत्तर शैली की है जो बलुआ पत्थर से बनी है तथा अर्थ पयकासन में दोहरे पुष्प पिठिका पर शिल्पांकित है। इनका दाया निचला हाथ कोहनी से खंडित है। ऊपरी हाथ अक्ष मालायुक्त वरद मुद्रा में आलेखित है। जबकि बाये दोनों हाथ कोहनी से खंडित है। नीचे वाहन सिंह का अंकन है। बाए निचले हाथ में पुस्तक है। मूर्ति करीब 3 फीट ऊंची डेढ़ फीट चौड़ी तथा मोटी 70 सेंटीमीटर है।

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