Satluj Film Controversy: खालड़ा के नाम से दहलने लगी थी पुलिस, फर्जी एनकाउंटर पर किए बड़े खुलासे, मिली गुमनाम मौत, पत्नी ने अधूरा मिशन किया पूरा

खालड़ा के नाम से दहलने लगी थी पुलिस, फर्जी एनकाउंटर पर किए बड़े खुलासे, मिली गुमनाम मौत, पत्नी ने अधूरा मिशन किया पूरा
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' में दिखाए गए जसवंत सिंह खालड़ा केस की पूरी कहानी जानिए। 1995 में अपहरण, CBI जांच, अदालत का फैसला, पुलिस अधिकारियों को सजा और क्यों आज तक नहीं मिला खालड़ा का शव।

डिजिटल डेस्क, मुंबई। दिलजीत दोसांझ फिल्म 'सतलुज' इन दिनों विवादों में है। लंबे इंतजार और कई विवादों के बाद 3 जुलाई को रिलीज हुई ये फिल्म अब भारत में OTT प्लेटफॉर्म से हटा दी गई है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है। फिल्म के हटने के बाद सोशल मीडिया पर इसकी खूब चर्चा हो रही है और लोग जानना चाहते हैं कि आखिर जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे, उनका मामला क्या था और हुआ क्या था फिल्म को हटाने के पीछे क्या वजह बताई गई है।

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?

जसवंत सिंह खालड़ा का जन्म 2 नवंबर 1952 को पंजाब के तरनतारन जिले के खालड़ा गांव में हुआ था। इसी कारण उनके नाम के साथ खालड़ा जुड़ा। उनके पिता का नाम करतार सिंह और माता का नाम मुख्तार कौर था। खालड़ा ने लॉ की पढ़ाई की और शुरुआती दौर में बैंक की नौकरी भी की, लेकिन बाद में उन्होंने खुद को मानवाधिकार के मुद्दों के लिए समर्पित कर दिया। 1981 में उनका विवाह परमजीत कौर से हुआ, जो गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर में लाइब्रेरियन थीं। जसवंत सिंह खालड़ा के दो बच्चे बेटी नवकिरण कौर और बेटा जनमीत सिंह हैं।

जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में से एक थे। वह शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव भी रहे। 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों, हिरासत में मौतों और अज्ञात व्यक्तियों के रूप में किए गए अंतिम संस्कारों की उन्होंने विस्तृत पड़ताल की। खालड़ा ने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड को स्टडी किया। उनका दावा था कि जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच बड़ी संख्या में लोगों का अंतिम संस्कार लावारिस के तौर पर किया गया, जबकि उनमें से कई कथित तौर पर पुलिस कार्रवाई में मारे गए थे। उनके इन खुलासों ने देशभर में मानवाधिकारों और पुलिस जवाबदेही को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी।


1995 में हुआ था अपहरण

CBI की जांच के अनुसार, खालड़ा की जांच और खुलासों से कुछ स्थानीय पुलिस अधिकारियों में नाराजगी बढ़ गई थी। आरोप है कि उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही थीं और अपनी गतिविधियां बंद करने का दबाव बनाया जा रहा था। 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर से कुछ पुलिसकर्मी उन्हें कथित तौर पर जबरन एक सफेद मारुति वैन में उठाकर ले गए।

पत्नी परमजीत कौर ने लड़ी आगे की लड़ाई

उनकी पत्नी परमजीत कौर ने उसी दिन पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और अगले दिन अपहरण का मामला दर्ज हुआ। जांच और अदालत की सुनवाई के दौरान उन्होंने लगातार गवाहों, सबूतों और न्यायिक प्रक्रिया का समर्थन किया और वर्षों तक केस को जिंदा रखा। उन्होंने भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मामले को उठाया। बाद में परमजीत कौर मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहीं और उन्होंने "जसवंत सिंह खालड़ा मेमोरियल ट्रस्ट" के माध्यम से मानवाधिकार और न्याय से जुड़े मुद्दों पर काम जारी रखा।


CBI जांच में क्या सामने आया?

मामले की जांच बाद में CBI को सौंपी गई। जांच के दौरान कई अहम गवाह सामने आए। कुलवंत सिंह नाम के एक व्यक्ति ने दावा किया कि उसने खालड़ा को थाना जबाल में हिरासत के दौरान देखा था। सबसे महत्वपूर्ण गवाही स्पेशल पुलिस ऑफिसर कुलदीप सिंह की मानी गई। उन्होंने CBI को बताया कि खालड़ा को गैरकानूनी हिरासत में रखा गया था और उनके साथ लगातार मारपीट की जाती थी। उनके अनुसार, कुछ दिनों बाद उन्होंने गोलियां चलने की आवाज सुनी और बाद में खालड़ा का खून से लथपथ शव देखा, जिसे कथित तौर पर वाहन में रखकर हरिके क्षेत्र की नहर में फेंक दिया गया। हालांकि, खालड़ा का शव आज तक बरामद नहीं हो सका।

अदालतों ने क्या फैसला दिया?

CBI ने मामले में नौ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। एक आरोपी ने आरोप तय होने से पहले आत्महत्या कर ली। अन्य पुलिस अधिकारियों पर अपहरण, आपराधिक साजिश और हत्या सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा चला। साल 2005 में पटियाला की अदालत ने कई आरोपियों को अपहरण का दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई। वहीं, तत्कालीन DSP जस्पाल सिंह और एक अन्य आरोपी को हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा दी गई। इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। 2007 में हाईकोर्ट ने एक आरोपी को बरी कर दिया, लेकिन चार बाकी दोषियों सतनाम सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर सिंह और प्रतिपाल सिंह की सजा सात साल से बढ़ाकर उम्रकैद कर दी।

साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि जांच के दौरान पंजाब पुलिस ने CBI को अपेक्षित सहयोग नहीं दिया और पुलिस अधिकारियों ने अपने साथियों को बचाने की कोशिश की, जिससे निष्पक्ष जांच प्रभावित हुई। CBI ने अदालत को यह भी बताया था कि केवल तरनतारन जिले में ही 984 शवों का अंतिम संस्कार लावारिस के रूप में किया गया था। वहीं, 1996 की अपनी रिपोर्ट में राज्यभर में 2,097 अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार किया गया था। अदालत ने इन मामलों में आगे की जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई के निर्देश भी दिए थे।

कभी नहीं मिला शव

जसवंत सिंह खालड़ा का मामला आज भी भारत के सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकार मामलों में गिना जाता है। उनका शव कभी बरामद नहीं हो सका, लेकिन उपलब्ध सबूतो और गवाहों के आधार पर कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। यह मामला पुलिस जवाबदेही, मानवाधिकार संरक्षण और न्यायिक प्रक्रिया की अहम मिसाल माना जाता है।

'सतलुज' को OTT से क्यों हटाया गया?

फिल्म 'सतलुज' हाल ही में OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज हुई थी। हालांकि, रिलीज के कुछ समय बाद ही इसे भारत में प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। ZEE5 ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि फिल्म को दर्शकों का जबरदस्त प्यार और समर्थन मिला है। बयान के मुताबिक, "अगले आदेश तक 'सतलुज' भारत में उपलब्ध नहीं होगी। इसे जल्द से जल्द दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी उचित विकल्पों पर काम किया जा रहा है।" हालांकि, प्लेटफॉर्म ने यह स्पष्ट नहीं किया कि फिल्म को हटाने के पीछे किस आदेश या कानूनी को लगाया गया है।

दिलजीत दोसांझ ने क्या कहा?

फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा का रोल निभाने वाले एक्टर और गायक दिलजीत दोसांझ ने फिल्म हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, "अब यह फिल्म रुकने वाली नहीं है। खालड़ा साहिब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता।" उनकी इस पोस्ट के बाद फिल्म को लेकर बहस और तेज हो गई।

‘पंजाब 95' से ‘सतलुज' बनने तक का विवाद

यह फिल्म पहले ‘पंजाब 95' नाम से बनाई गई थी और 2022 में थिएटर रिलीज के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास भेजी गई थी। अधिकारियों के मुताबिक, सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 127 बदलाव सुझाए थे, जिन्हें निर्माताओं ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद फिल्म की थिएटर रिलीज रुक गई। बाद में इसका नाम बदलकर ‘सतलुज' रखा गया और इसे सीधे चुपके से ओटीटी पर रिलीज कर दिया गया, क्योंकि ओटीटी कंटेंट पर सीबीएफसी का अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता। लेकिन केंद्र सरकार की जानकारी में आते ही उन्होंने संज्ञान लेते हुए इसकी रिलीज रोक दी।

ये है सबसे बड़ा सवाल

जसवंत सिंह खालड़ा का मामला 1995 का है। उस समय पंजाब और केंद्र, दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। खालड़ा का कथित अपहरण और बाद में उनकी हत्या का मामला उसी दौर से जुड़ा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तीन दशक पुराने इस मामले पर बनी फिल्म आज, जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार है, तब विवादों में क्यों है और भारत में इसकी स्ट्रीमिंग क्यों रोक दी गई?

Created On :   8 July 2026 4:29 PM IST

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