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हर पाकिस्तानी के ऊपर अब 1 लाख 75 हजार रुपए का कर्ज

हर पाकिस्तानी के ऊपर अब 1 लाख 75 हजार रुपए का कर्ज

हाईलाइट

  • कुल रोजकोषीय घाटा जीडीपी का 8.6 फीसदी रहा
  • ऋण नीति कार्यालय ने वित्त मंत्रालय को सौंपी 11 पन्नों की रिपोर्ट
  • ज्यादातर महत्वपूर्ण जानकारियां रिपोर्ट से गायब रहीं

डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। पाकिस्तान की सरकार ने संसद में बताया है कि पिछले वित्तीय वर्ष के अंत में पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति का कर्ज बढ़कर अब 1 लाख 75 हजार रुपए हो गया है। इसके साथ ही दो साल के अंदर हर पाकिस्तानी नागरिक के ऊपर 54,901 रुपए का अतिरिक्त बोझ बढ़ा है। यह करीब 46 फीसद का इजाफा है।

बीबीसी कि रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2020-21 के राजकोषीय नीति बयान में वित्त मंत्रालय ने यह भी माना है कि सरकार राजकोषीय घाटे को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के चार फीसद तक कम करने में नाकाम रही है। इस तरह से उसने 2005 के ऋण सीमा अधिनियम (एफआरडीएल एक्ट) का उल्लंघन किया है।

कुल रोजकोषीय घाटा जीडीपी का 8.6 फीसदी रहा
बीबीसी के अनुसार कुल रोजकोषीय घाटा जीडीपी का 8.6 फीसद रहा है जो कि इस अधिनियम के तहत निर्धारित सीमा से दोगुना कम रहा है। पाकिस्तान की संसद में राजकोषीय घाटे को लेकर यह रिपोर्ट गुरुवार को पेश की गई। हालांकि यह संभवतः अब तक की सबसे कम जानकारी वाली राजकोषीय रिपोर्ट है।

ऋण नीति कार्यालय ने वित्त मंत्रालय को सौंपी 11 पन्नों की रिपोर्ट
पाक अधिकारियों का कहना है कि ऋण नीति कार्यालय ने तो वित्त मंत्रालय को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी, लेकिन उसे महज 11 पन्नों का करने का आदेश हुआ। जबकि एफआरडीएल एक्ट के तहत सरकार इस बात को लेकर बाध्य है कि राजकोषीय नीति के ऊपर आई रिपोर्ट में “केंद्र सरकार की ओर से राजकोष को लेकर सभी संभावित नीतियों के फैसले का विस्तार से विश्लेषण शामिल किया जाए।”

ज्यादातर महत्वपूर्ण जानकारियां रिपोर्ट से गायब रहीं
पाकिस्तानी अख़बार एक्सप्रेस ट्रिब्युन के अनुसार 11 पन्नों की इस रिपोर्ट में कई अप्रासंगिक जानकारियां दी गई हैं और ज्यादातर महत्वपूर्ण जानकारियां जो 2019-20 के दौरान नीतियों का हिस्सा रही हैं, वो गायब थीं। 

अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से कुल व्यय 21 सालों में सबसे ज्यादा
राजकोषीय नीति पर आई इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पांच राज्य सरकारों का व्यय पिछले वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान 28 सालों में सबसे ज्यादा रहा है। उसकी तुलना में अर्थव्यवस्था के कुल आकार के हिसाब से विकास के मद में खर्च 10 सालों में सबसे कम रहा है। अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से कुल व्यय 21 सालों में सबसे ज्यादा रहा है। यह जीडीपी का 23.1 फीसद रहा है।

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