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गाय और भैंस की हड्डियों से बनी क्रॉकरी में पीते हैं आप चाय

July 30th, 2018 20:28 IST

डिजिटल डेस्क। भारत में इस वक्त कई मुद्दों पर चर्चा हो रही है, लेकिन जिस पर सबसे ज्यादा संवेदनशीलता देखी जा रही है वो है 'गाय' । भहर में गाय को भले ही अपने घरों में कोई जगह नहीं देता, लेकिन इसकी रक्षा के लिए एक पूरी फौज खड़ी है। ना जाने कहां से ये गौरक्षक अचानक से आ जाते है और गौ हत्या के आरोप में मार-पीट से लेकर खुद हत्यारा बनने में देर नहीं लगाते, लेकिन क्या आप जानते है गायों की रक्षा करने वाले खुद गाय और भैंसों की हड्डियों से बने बर्तनों में चाय पीते है और खाना खाते हैं। आपको ये सुन कर झटका लगा होगा और शायद आप यकीन भी नहीं करेंगे, लेकिन हम आज आपको ऐसे बर्तनों के बारे में बताने जा रहे हैं जो गाय और भैंस की हड्डियों से बने होते है और समाज के हर तबके का इंसान इनका इस्तेमाल करता है। 

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क्या है बोन चाइना क्रॉकरी?

बोन चाइना क्रॉकरी, इस तरह की खास क्रॉकरी जो सफेद, पतली और अच्छी कलाकारी से बनी हो है, बोन चाइना कहलाती है। ये क्रॉकरी आज लगभग हर घर में आसानी से देखी जा सकती है। ये वो क्रॉकरी है जिसे लोग अपना स्टेटस सिंबल समझते हैं। कोई खास मेहमान  घर आए तो इन्हीं बर्तनों में उन्हें खाना, चाय और नाश्ता दिया जाता है। इस पर लिखे शब्द बोन का वास्तव में सम्बंध बोन (हड्डी) से ही है। इसका मतलब ये है कि आप किसी गाय या बैल की हड्डियों की सहायता से खा-पी रहे है। बोन चाइना एक खास तरीके का पॉर्सिलेन है जिसे ब्रिटेन में विकसित किया गया और इस उत्पाद का बनाने में बैल की हड्डी का प्रयोग मुख्य तौर पर किया जाता है। इसके प्रयोग से सफेदी और पारदर्शिता मिलती है।

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कैसे बनती है ये क्रॉकरी?

बोन चाइना इसलिए महंगा होता है क्योंकि इसके उत्पादन के लिए सैकड़ों टन हड्डियों की जरुरत होती है, जिन्हें कसाईखानों से जुटाया जाता है। इसके बाद इन्हें उबाला जाता है, साफ किया जाता है और खुले में जलाकर इसकी राख प्राप्त की जाती है। बिना इस राख के चाइना कभी भी बोन चाइना नहीं कहलाता है। 

जानवरों की हड्डी से चिपका हुआ मांस और चिपचिपापन अलग कर दिया जाता है। इस चरण में प्राप्त चिपचिपे गोंद को अन्य इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है। शेष बची हुई हड्डी को 1000 सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे इसमें मौजूद सारा कार्बनिक पदार्थ जल जाता है। 

इसके बाद इसमें पानी और अन्य आवश्यक पदार्थ मिलाकर कप, प्लेट और अन्य क्राकरी बना ली जाती है और गर्म किया जाता है। इस तरह बोन चाइना अस्तित्व में आता है। 50 % हड्डियों की राख 26 % चीनी मिट्टी और बाकी चाइना स्टोन से मिलकर तैयार होती है ये खूबसूर क्राकरी । खास बात यह है कि बोन चाइना जितना ज्यादा महंगा होगा, उसमें हड्डियों की राख की मात्रा भी उतनी ही अधिक होगी।

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गाय और भैंस की सुरक्षा के लिए बंद करें बोन चाइना का इस्तेमाल 

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या शाकाहारी लोगों को बोन चाइना का इस्तेमाल करना चाहिए? या फिर सिर्फ शाकाहारी ही क्यों, क्या किसी को भी बोन चाइना का इस्तेमाल करना चाहिए। देखिए बात एक दम साफ है, अगर आप जानवरों के पक्ष में हैं, चाहे मांसाहारी हो या शाकाहारी तो आपको बोन चाइना का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

क्योंकि जानवरों को सिर्फ उनकी हड्डियों के लिए नहीं मारा जाता है। हड्डियां तो उनको मारने के बाद प्राप्त हुआ एक उप-उत्पाद है, लेकिन भारत के मामले में ये कुछ अलग है। भारत में भैंस और गाय को उनके मांस के लिए नहीं मारा जाता क्योंकि उनकी मांस खाने वालों की संख्या काफी कम है और जो खाते भी तो उन्हें धर्म और पाप-पुण्य का पाठ पढ़ा कर रोक दिया जाता है। भारत में मांस खाना पाप है, लेकिन फैक्ट्रियों में उन्हें उन्की चमड़ी और हड्डियों के लिए मार दिया जाता है और इस पर ना तो कोई गौरक्षक आगे आते है और ना ही कोई धर्म कानून का हवाला देता है। 

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भारत में सबसे बड़ी चमड़ी मंडी 

भारत में दुनिया की सबसे बड़ी चमड़ी मंडी है और यहां ज्यादातर गाय के चमड़े का ही प्रयोग किया जाता है। हम जानवरों को उनकी हड्डियों के लिए भी मारते है। देखा जाए तो वर्क बनाने का पूरा उद्योग ही गाय को सिर्फ उसकी आंत के लिए मौत के घाट उतार देता है। 

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मेनका गांधी ने की बोन चाइन इस्तेमाल ना करने की अपील

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भी बोन चाइना क्रॉकरी इस्तेमाल ना करने की अपनी की है। उन्होंने एक वीडियो के जरिए कहा कि अगर आप गाय और भैंसों को बचाना चाहते है तो बोन चाइन इस्तेमाल रोक दें। असल आप जनवरों को नहीं मारते, लेकिन आप या आपका परिवार बोन चाइना खरीदने के साथ ही उन हत्याओं का साझीदार हो जाता है, क्योंकि बिना मांग के उत्पादन अपने आप ही खत्म हो जायेगा।

चाइना सैट की परम्परा बहुत पुरानी है और जानवर लम्बे समय से मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। यह सच है, लेकिन आप इस बुरे काम को रोक सकते हैं। इसके लिए सिर्फ आपको यह काम करना है कि आप बोन चाइना की मांग करना बंद कर दें।

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डिजिटल डेस्क, जबलपुर। किसी के लिए भी प्रॉपर्टी खरीदना जीवन के महत्वपूर्ण कामों में से एक होता है। आप सारी जमा पूंजी और कर्ज लेकर अपने सपनों के घर को खरीदते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इसमें इतनी ही सावधानी बरती जाय जिससे कि आपकी मेहनत की कमाई को कोई चट ना कर सके। प्रॉपर्टी की कोई भी डील करने से पहले पूरा रिसर्च वर्क होना चाहिए। हर कागजात को सावधानी से चेक करने के बाद ही डील पर आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि कई बार हमें मालूम नहीं होता कि सही और सटीक जानकारी कहा से मिलेगी। इसमें bhaskarproperty.com आपकी मदद कर सकता  है। 

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ध्यान रखें की प्रॉपर्टी RERA अप्रूव्ड हो 
कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इस बात का ध्यान रखे कि वो भारतीय रियल एस्टेट इंडस्ट्री के रेगुलेटर RERA से अप्रूव्ड हो। रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवेलपमेंट एक्ट, 2016 (RERA) को भारतीय संसद ने पास किया था। RERA का मकसद प्रॉपर्टी खरीदारों के हितों की रक्षा करना और रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देना है। राज्य सभा ने RERA को 10 मार्च और लोकसभा ने 15 मार्च, 2016 को किया था। 1 मई, 2016 को यह लागू हो गया। 92 में से 59 सेक्शंस 1 मई, 2016 और बाकी 1 मई, 2017 को अस्तित्व में आए। 6 महीने के भीतर केंद्र व राज्य सरकारों को अपने नियमों को केंद्रीय कानून के तहत नोटिफाई करना था।