Gait Analysis Explainer: चेहरा नहीं दिखा तो भी बचना मुश्किल! अब चाल-ढाल की होगी पूरी स्टडी, जानें क्या है गेट एनालिसिस?

चेहरा नहीं दिखा तो भी बचना मुश्किल! अब चाल-ढाल की होगी पूरी स्टडी, जानें क्या है गेट एनालिसिस?
केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में चाल पहचानने वाली तकनीक पर भरोसा करके अब चेतन की चाल-ढाल से पता लगाएगा कि उनका इस पूरे मामले में क्या रोल रहा है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में अब एक नई तकनीक का इस्तेमाल हुआ है, जो बिना चेहरा साफ दिखे भी आरोपी तक पहुंचने में मदद कर सकती है। जांच एजेंसियों की तरफ से आरोपी चेतन चौधरी की पहचान के लिए उसकी चाल-ढाल मिलाने की तैयारी कर रही हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कैमरे में चेहरा साफ नहीं दिखता है, आरोपी मास्क पहन लेता है या हेलमेट लगा लेता है और ऐसे में पहचान कर पाना बहुत ही ज्यादा मुश्किल हो जाता है। लेकिन अब जांच एजेंसियां सिर्फ चेहरे पर ही नहीं ब ल्कि, चलने के तरीके पर भी की जा रही है। इस वजह से ही इस तकनीक को आज के समय में काफी ज्यादा अहम माना जा रहा है।

क्या है चाल पहचानने की तकनीक?

इस तकनीक में किसी इंसान के चलने के पूरे तरीके को ध्यान से देखा जाता है। जैसे हर व्यक्ति के फिंगर प्रिंट्स अलग होते हैं वैसे ही हर व्यक्ति के चलने का अंदाज भी अलग होता है। कोई लंबे कदम रखता है, कोई छोटे कदमों से चलता है। किसी के हाथ ज्यादा हिलते हैं तो किसी के कम। कुछ लोग चलते समय थोड़ा झुक जाते हैं, जबकि कुछ बिल्कुल सीधे चलते हैं। पैरों का जमीन पर पड़ने का तरीका, घुटनों का मुड़ना और शरीर का संतुलन भी इसमें देखा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हर व्यक्ति की चाल लगभग 90-95 फीसदी तक अलग होती है। जैसे किसी के उंगलियों के निशान अलग होते हैं, उसी तरह उसकी चाल भी उसकी पहचान बन सकती है। ऐसा माना जाता है कि बचपन के बाद चलने का तरीका धीरे-धीरे तय हो जाता है और 15-20 साल की उम्र तक यह लगभग स्थिर हो जाता है।

जांच में कैसे होता है इस तरीके का इस्तेमाल?

इस तरह की जांच दो तरीकों से की जाती है। पहले तरीके में विशेषज्ञ कैमरे की रिकॉर्डिंग को एक-एक तस्वीर के हिसाब से देखते हैं। फिर आरोपी के पुराने वीडियो से उसकी चाल का मिलान किया जाता है। ये वीडियो घर के कार्यक्रम, सड़क पर चलते समय या दूसरे किसी मौके के हो सकते हैं। वहीं, दूसरे तरीके में मॉडर्न टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाता है। इसमें खास कंप्यूटर और नई तकनीक की मदद से शरीर के अलग-अलग हिस्सों की हरकत को समझा जाता है। इसके बाद दोनों वीडियो को एकसाथ रखकर मिलाया जाता है। अगर रिकॉर्डिंग अच्छी हो तो इस तरीके से पहचान करना काफी मजबूत मानी जाती है।

केतन हत्याकांड में क्यों है गेट एनालिसिस खास?

इस मामले में जांच एजेंसियों के पास कैमरे की रिकॉर्डिंग तो है, लेकिन आरोपी का चेहरा पूरी तरह साफ नजर नहीं आ रहा। ऐसे में सिर्फ चेहरे के आधार पर पहचान कर पाना आसान नहीं है। इसलिए अब उसकी चाल को मिलाया जाएगा। जांच टीम आरोपी के पुराने वीडियो जुटा रही है। इसके बाद उसके कदमों की लंबाई, चलने की रफ्तार, शरीर का संतुलन और बाकी कई बातों की तुलना कैमरे में दिख रहे व्यक्ति से की जाएगी। अगर दोनों में 80 प्रतिशत तक कि समानता मिलती है तो यह जांच के लिए एक मजबूत कड़ी बन सकती है। हालांकि अदालत में इसे अकेले सबूत नहीं माना जाता, बल्कि दूसरे सबूतों के साथ देखा जाता है।

दुनिया के कई देशों में पहले से हो रहा इस्तेमाल

यह तरीका सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। ब्रिटेन में 2000 के दशक से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। वहां ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें चेहरे की पहचान नहीं हो पाई, लेकिन चाल के आधार पर आरोपी तक पहुंचा गया। अमेरिका और यूरोप की जांच एजेंसियां भी गेट एनालिसिस का इस्तेमाल करती हैं। कई अध्ययनों में सामने आया है कि अच्छी रिकॉर्डिंग मिलने पर इसकी सटीकता 85-95 प्रतिशत तक भी पहुंच सकती है। वहीं, भारत में भी अब इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में कई मामलों की जांच में इस तकनीक की मदद ली गई है। पिछले कुछ सालों में वीडियो जांच से जुड़े मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

क्या है गेट एनालिसिस की खासियत?

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यही है कि अगर चेहरा छिपा भी हो तब भी जांच आगे बढ़ सकती है। दूर लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग से भी कई बार जरूरी जानकारी मिल जाती है। नई तकनीक की वजह से पहले के मुकाबले कम समय में नतीजे मिलने लगे हैं। इसमें एक और बड़ी बात यह है कि कोई व्यक्ति थोड़ी देर के लिए अपनी चाल बदल सकता है, लेकिन लंबे समय तक बिल्कुल अलग तरीके से चलना आसान नहीं होता। इसलिए जांच के दौरान उसकी असली चाल सामने आने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

इस तकनीक की क्या हैं कमियां?

हर तकनीक की तरह इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। अगर कैमरे की रिकॉर्डिंग धुंधली हो, रोशनी कम हो या कैमरे का कोण ठीक न हो तो पहचान करना काफी मुश्किल हो सकता है। अगर कोई जानबूझकर लंगड़ाकर चले या बहुत ढीले और मोटे कपड़े पहन ले तो जांच में थोड़ी परेशानी हो सकती है। इसके अलावा भारत में अभी ऐसे विशेषज्ञों की संख्या भी कम है, जो इस तरह की जांच में पूरी तरह प्रशिक्षित हैं। इसलिए पुलिस इस तकनीक को दूसरे सबूतों के साथ जोड़कर ही इस्तेमाल करती है।

आने वाले समय में बढ़ सकता है इस्तेमाल

देश में अब जांच के नए तरीकों पर तेजी से काम हो रहा है। कई राज्यों में आधुनिक जांच केंद्र तैयार किए जा रहे हैं, जहां नई तकनीक की मदद से अपराध की जांच होगी। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले समय में चाल पहचानने की यह तकनीक और ज्यादा इस्तेमाल की जाएगी। अगर केतन अग्रवाल हत्याकांड में यह तरीका जांच को मजबूत करने में सफल रहता है, तो दूसरे मामलों में भी इसका इस्तेमाल बढ़ सकता है। इससे साफ है कि अब सिर्फ चेहरा छिपा लेने से बचना आसान नहीं होगा।

Created On :   1 July 2026 5:47 PM IST

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