Meerut Blue Drum Case: मुस्कान-साहिल को फांसी की सजा के बाद क्या होगा? हाईकोर्ट से राष्ट्रपति तक, क्या कानूनी विकल्प शेष, समझिए पूरा प्रोसेस

मुस्कान-साहिल को फांसी की सजा के बाद क्या होगा? हाईकोर्ट से राष्ट्रपति तक, क्या कानूनी विकल्प शेष, समझिए पूरा प्रोसेस
मेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा दी गई है। अब दोनों के पास सजा को चुनौती देने के कानूनी विकल्प मौजूद हैं। चलिए जानते हैं क्या?

डिजिटल डेस्क, लखनऊ। फांसी का फंदा या जिंदगी की नई उम्मीद? मेरठ के नीले ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद अब हर किसी की नजर इस बात पर है कि आगे क्या होगा। सौरभ राजपूत की बेरहमी से हत्या के मामले में दोनों को दोषी ठहराया गया है। अदालत के फैसले के बाद अब उनकी कानूनी लड़ाई के अगले कदम चर्चा में हैं। क्या दोनों इस सजा को चुनौती दे सकते हैं? क्या उम्रकैद में सजा बदलने की मांग कर सकते हैं? या फिर उनके पास कोई और रास्ता भी है? तो चलिए समझते हैं कि कानून के तहत दोनों के पास कौन-कौन से ऑप्शन मौजूद हैं?

सबसे पहले हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

जब किसी निचली अदालत से किसी दोषी को फांसी की सजा मिलती है तो उसे तुरंत फांसी नहीं दी जाती है। कानून के मुताबिक, इस सजा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी होगी। इसके लिए निचली अदालत अपना फैसला और मामले से जुड़े डॉक्यूमेंट्स हाईकोर्ट भेजेगी। हाईकोर्ट पूरे मामले की जांच करेगा। वह देखेगा कि सबूत और गवाहों के आधार पर फांसी की सजा देना सही है या नहीं। अगर हाईकोर्ट चाहे तो फांसी की सजा बरकरार रख सकता है। इसके अलावा वह इसे उम्रकैद में भी बदल सकता है। अगर उसे लगे कि दोष साबित नहीं होता है तो वह दोषियों को बरी भी कर सकता है।

हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दे सकते हैं

मुस्कान और साहिल को जिला अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार है। इसके लिए वे अपने वकीलों की मदद ले सकते हैं। अपील में उनके वकील बता सकते हैं कि उनके अनुसार निचली अदालत के फैसले में क्या गलती है। हाईकोर्ट मामले के सबूतों, गवाहों और दूसरे जरूरी तथ्यों को देखेगा। इसके बाद अदालत तय करेगी कि पहले सुनाई गई सजा सही है या उसमें बदलाव होना चाहिए। यानी फांसी की सजा मिलने के बाद भी इस स्तर पर राहत मिलने की संभावना रहती है।

सुप्रीम कोर्ट में भी जा सकते हैं

अगर हाईकोर्ट भी फांसी की सजा को बरकरार रखता है तो दोनों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता हो सकता है। वे विशेष अनुमति याचिका यानी SLP (Special Leave Petition) दाखिल कर सकते हैं। इसके जरिए वे सुप्रीम कोर्ट से अपने मामले की सुनवाई करने की मांग कर सकते हैं। हालांकि, ऐसी याचिका दाखिल करने का मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट सुनवाई की अनुमति जरूर देगा। अगर सुप्रीम कोर्ट मामले को सुनता है तो वह कानून और मामले से जुड़े जरूरी पहलुओं की जांच करेगा। अदालत के फैसले के आधार पर सजा में बदलाव हो सकता है या पहले का फैसला बरकरार रह सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दोबारा विचार की मांग

अगर सुप्रीम कोर्ट भी राहत नहीं देता है तो दोषियों के पास पुनर्विचार याचिका यानी रिव्यू पिटिशन का ऑप्शन हो सकता है। इसमें दोषी अदालत से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग करते हैं। उनके वकीलों को यह बताना होता है कि फैसले में ऐसी कौन-सी गंभीर कानूनी गलती हुई है जिस पर फिर से ध्यान देना जरूरी है। हालांकि, पुनर्विचार याचिका का मतलब पूरे मामले की सुनवाई नए सिरे से होना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट इसे तय कानूनी नियमों के आधार पर देखता है।

क्यूरेटिव पिटिशन भी दाखिल कर सकते हैं

पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद क्यूरेटिव पिटिशन का रास्ता भी हो सकता है। इसे सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जाता है। इसमें दोषियों को यह दिखाना होता है कि मामले में न्याय के साथ गंभीर चूक हुई है या उनके साथ ऐसी कानूनी गलती हुई है जिस पर अदालत का ध्यान जाना जरूरी है। यह राहत पाने का बहुत सीमित रास्ता है। अदालत हर क्यूरेटिव पिटिशन को स्वीकार नहीं करती। इसके लिए तय नियमों और शर्तों को पूरा करना पड़ता है।

राष्ट्रपति से मांग सकते हैं 'दया'

अदालतों में कानूनी रास्ते आजमाने के बाद दोषियों के पास दया याचिका का विकल्प भी हो सकता है। मौत की सजा के मामलों में राष्ट्रपति को संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत दया देने का अधिकार है। इस याचिका में दोषी अपनी सजा माफ करने या उसे कम करने की मांग कर सकते हैं। राष्ट्रपति सजा को माफ कर सकते हैं या उसे कम कर सकते हैं। इसके अलावा, कानून के अनुसार सजा के स्वरूप में बदलाव भी किया जा सकता है। राष्ट्रपति इस मामले में अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया में केंद्र सरकार की सलाह की भी अहम भूमिका होती है। हालांकि, दया याचिका देने से राहत मिलना तय नहीं होता है।

क्या फांसी की सजा तुरंत लागू हो जाएगी?

आपको बता दें कि, ऐसा नहीं होगा। फांसी की सजा सुनाए जाने और उसे लागू किए जाने के बीच कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। पहले हाईकोर्ट को मौत की सजा की पुष्टि करनी होगी। इसके बाद अपील और दूसरी कानूनी याचिकाओं से जुड़ी प्रक्रिया हो सकती है। दया याचिका का ऑप्शन भी कानून के अनुसार उपलब्ध हो सकता है। इसलिए जिला अदालत का फैसला आने के बाद तुरंत फांसी नहीं दी जाती है। आगे क्या होगा यह अदालतों के फैसलों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। मुस्कान और साहिल को राहत मिलेगी या नहीं, यह अभी पहले से तय नहीं माना जा सकता है।

Created On :   15 Oct 2026 6:16 PM IST

Tags

Next Story