दैनिक भास्कर हिंदी: भारत की चीन चुनौती

June 25th, 2020

हाईलाइट

  • भारत की चीन चुनौती

तिब्बत के दक्षिणी किनारे पर स्थित यादोंग में भारत व चीन का मिलन होता है। ल्हासा से यादोंग का एक दिन का रास्ता तय करके आप दुनिया की छत पर पहुंच जाते हैं। जैसे ही मैं ल्हासा से निकला और भारत में दक्षिण की ओर बढ़ा, लंबे और घुमावदार सड़क मार्ग से प्राचीन झील पीछे छूट रही थी। हमारी यात्रा यादोंग के चुम्बी घाटी शहर में समाप्त हुई, जहां एक छोटी सी चौकी है, जो भारत-चीन संबंधों का एक आदर्श स्नैपशॉट प्रस्तुत करती है।

यादोंग सिक्किम से सीमा के पार नाथू ला दर्रा से तिब्बत की तरफ पड़ता है और यह दो विशाल अर्थव्यवस्थाओं के बीच का प्रवेश द्वार है।

यह सोच बनी हुई है कि 72 दिनों तक चले डोकलाम संकट के समय भारत व चीन के संबंध जितने खराब हो सकते थे, उतने हुए। डोंगलांग घटना (इसे चीन में इसी नाम से पुकारा जाता है) बीजिंग में टैक्सी की सवारी के दौरान बातचीत का एक दैनिक विषय बन गया। कुछ भारतीय व्यापारी चीनी साझेदारों (पार्टनर) से सुन रहे थे कि यह अनौपचारिक रूप से भारत के साथ व्यापार न करने का समय है। यहां तक कि चीन के सबसे प्रिय भारतीय फिल्म अभिनेता आमिर खान को भी चुपचाप फिल्म रिलीज को रोकना (होल्ड) पड़ा।

बीजिंग में मैंने जिन लोगों से बात की थी, उनका मानना था कि सेना के सबसे व्यापक सुधारों के बीच डोकलाम की घटना पर चीन की दादागीरी कोई संयोग नहीं था। शी जिनपिंग के नेतृत्व में सैन्य परिवर्तन ने तनाव और अनिश्चितता पैदा कर दी थी और ऐसी परिस्थितियों ने सैना को एक कठिन मुद्रा अपनाने के लिए प्रेरित किया था।

हाल की स्मृति में 2018 और 2019 सीमा पर दो सबसे शांतिपूर्ण वर्षों के तौर पर चिह्न्ति हुए हैं। ऐसा लग रहा था कि शांति बनाए रखने के लिए उच्चतम स्तर एकमत हैं। दूरदर्श तरीके से देखें तो यह चेतावनी के संकेत रहे और दबाव बन रहा था।

न तो भारत और न ही चीन संघर्ष की इच्छा रखता है और न ही इसकी अपेक्षा की जाती है। समस्या यह है कि युद्ध कभी-कभार डिजाइन किए होते हैं। मई 2020 की घटनाएं सामने आईं, हालांकि दोनों पक्षों के बीच शांति बनाए रखने के लिए आकर्षक कारण थे।

वुहान और चेन्नई के शिखर सम्मेलन ने हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि मोदी और शी दोनों आर्थिक संबंध बढ़ने के बाद, खासकर भारत में चीनी निवेश के संदर्भ में सीमा के मुद्दे पर रिश्तों को खराब नहीं करना चाहते। उसी समय, वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास भारत के परीक्षण की पीएलए की रणनीति जारी रही और इसी समय संवेदनशील क्षेत्रों में भारत के बुनियादी ढांचे का निर्माण हुआ।

अगर एलएसी को स्पष्ट करना, इन सभी परेशान करने वाले रुझानों का स्पष्ट समाधान होगा, तो ऐसा लगता था कि बीजिंग ऐसा करने के मूड में ही नहीं है। उसने अस्पष्टता को प्राथमिकता देते हुए कई क्षेत्रीय और समुद्री विवादों के साथ अपने ²ष्टिकोण को चिह्न्ति किया है।

इतिहास सीमा विवाद को हल नहीं करेगा। हम और भी 100 वर्षों तक ऐतिहासिक दावों पर बहस करते रहेंगे। इसका क्या हल होगा, विवाद सरकारों द्वारा लिया गया एक राजनीतिक निर्णय है, जो इस निष्कर्ष पर आता है कि निपटान के लाभ लागत से आगे निकल जाएंगे।

(यह अनंत कृष्णन की किताब इंडियाज चाइना चैलेंज : ए जर्नी थ्रू चाइना राइज एंड व्हाट इट मीन्स फॉर इंडिया का एक अंश है। इस किताब का प्रकाशन हार्पर कॉलिन्स न किया है)