कोरोना काल में संकट मोचक बनी मनरेगा, 11 करोड़ गरीबों का दूर कर रही दुख (एक्सक्लूसिव)

MNREGA becomes distress in the Corona period, removing 11 crore poor people (Exclusive)
कोरोना काल में संकट मोचक बनी मनरेगा, 11 करोड़ गरीबों का दूर कर रही दुख (एक्सक्लूसिव)
कोरोना काल में संकट मोचक बनी मनरेगा, 11 करोड़ गरीबों का दूर कर रही दुख (एक्सक्लूसिव)

नई दिल्ली, 20 मई (आईएएनएस)। लॉकडाउन के कारण दिल्ली, मुंबई, सूरत आदि महानगरों से गांवों की तरफ लौटे प्रवासी मजदूरों के लिए अब संकट की घड़ी में मनरेगा मददगार बन गई है। देश में इस वक्त 11 करोड़ से अधिक मजदूरों को मनरेगा से गांव में ही रोजी-रोटी मिल रही है। चालू वित्त वर्ष में 11 हजार करोड़ रुपये खर्च कर सरकार 18.78 करोड़ मानव कार्य दिवसों का सृजन कर चुकी है।

उत्तर प्रदेश, बिहार सहित सभी राज्यों में तेजी से मनरेगा के कार्यो का संचालन शुरू हुआ है। यूपी में इन दिनों प्रतिदिन 30 लाख लोगों को मनरेगा से रोजगार मिल रहा है। जिससे उत्साहित योगी सरकार ने हर दिन मनरेगा से 50 लाख रोजगार पैदा करने की दिशा में काम शुरू किया है।

खास बात है कि देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिने जाने वाला बुंदेलखंड आज मनरेगा से गांवों में रोजगार देने के मामले में उत्तर प्रदेश में अव्वल चल रहा है। मनरेगा के क्रियान्वयन के मामले में बुंदेलखंड के चित्रकूट मंडल के सभी चार जिले महोबा, चित्रकूट, हमीरपुर और बांदा उत्तर प्रदेश के 75 जिलों की सूची में टॉप 15 में जगह बनाने में सफल हुए हैं। मनरेगा के तहत रोजगार देने के मामले में बुंदेलखंड का चित्रकूट जैसा जिला उत्तर प्रदेश में नंबर वन है। चित्रकूट मंडल के चार जिलों में 12 मई तक 1,14,812 से अधिक मजदूरों को रोजगार मिल चुका है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सब कुछ ठप हो जाने के बाद गांवों में किस तरह से मनरेगा ने गरीबों को दो जून की रोटी मुहैया कराने में अहम भूमिका निभाई है।

भारत सरकार के केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद के सदस्य रह चुके संजय दीक्षित ने आईएएनएस से कहा, संकट की इस घड़ी में मनरेगा ने फिर से अपनी उपयोगिता साबित कर दी है। मनरेगा में भले ही बाजार रेट तीन सौ रुपये से कम सिर्फ तकरीबन दो सौ रुपये मजदूरी मिलती है, मगर आज बाजार में रोजगार नहीं है लेकिन गांव में दो सौ रुपये ही सही कम से कम मनरेगा से दो जून की रोटी तो मजदूरों को मिल रही है।

संजय दीक्षित ने कहा, आज मनरेगा के तहत गांवों में जल संरक्षण के लिए तालाब की खुदाई, मेड़बंदी, गांव में सड़क आदि निर्माण का कार्य चल रहा है। इससे जहां महानगरों से लौटे लोगों को रोजगार मिल रहा है, वहीं गांवों का विकास भी हो रहा है। हालांकि मेरा मानना है कि अगर मनरेगा से देश के 90 प्रतिशत लघु एवं सीमांत किसानों को जोड़ दिया जाए तो फिर चमत्कारी परिवर्तन देखने को मिलेगा।

लाखों प्रवासियों के शहरों से रिवर्स पलायन के कारण गांवों में रोजगार देने की चुनौती केंद्र सरकार के सामने खड़ी है। इस चुनौती से निपटने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों मनरेगा के तहत 40 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन किया था। जिससे 300 करोड़ कार्य दिवसों का रोजगार पैदा हो सके।

खास बात है कि बजट 2020-21 की घोषणा करते समय मनरेगा के लिए मोदी सरकार ने 61500 करोड़ रुपये का आवंटन किया था, जबकि 2019-20 में करीब 70 हजार करोड़ रुपये का बजट जारी किया था। मगर, अब 40 हजार करोड़ के अतिरिक्त आवंटन से वित्तीय वर्ष 2020-21 में मनरेगा से और अधिक रोजगार दिया जा सकेगा।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की मनरेगा वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में मनरेगा के तहत कुल 26.6 करोड़ मजदूर पंजीकृत हैं। जिसमें इस वक्त सक्रिय मजदूरों की संख्या 11.72 करोड़ है। मौजूदा वित्तीय वर्ष 2020-21 में सरकार अब तक 11,202.99 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। जिससे 18.78 करोड़ मानव कार्य दिवस (परसन डेज) सृजित किए गए हैं।

Created On :   20 May 2020 2:00 PM GMT

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