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तीस हजारी कांड : 31 साल बाद सिपाही-हवलदारों को फिर क्यों याद आईं किरण बेदी?

तीस हजारी कांड : 31 साल बाद सिपाही-हवलदारों को फिर क्यों याद आईं किरण बेदी?

हाईलाइट

  • भारत की पहली दबंग महिला आईपीएस किरण बेदी
  • तीस हजारी कोर्ट का मामला सामने आने के बाद सिपाहीयों को यादा आई किरण बेदी

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जिक्र दिल्ली पुलिस और दिल्ली की तीस हजारी अदालत का हो, ऐसे में भारत की पहली दबंग महिला आईपीएस किरण बेदी हवलदार सिपाहियों को याद न आएं, ऐसा असंभव है। हां, यह अलग बात है कि बेबाक-बेखौफ किरण बेदी गाहे-ब-गाहे तिहाड़ जेल के कैदियों को भी याद आती हैं।

17 फरवरी, 1988 को दिल्ली की इसी तीस हजारी कोर्ट में वकीलों से सीधा मुचैटा लेने वाली, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कार को दिल्ली का दिल समझे जाने वाले कनाट प्लेस में सरेआम लदवा कर उठवा ले जाने के बाद क्रेन-बेदी के नाम से चर्चित हुईं किरण बेदी, देश में मौजूद भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) लॉबी (गुट) को कभी फूटी आंख नहीं सुहाई थीं। जिसका नतीजा ही रहा कि किरण बेदी आईपीएस रहते-रहते अपनी जिंदगी में कभी भी दिल्ली की पुलिस कमिश्नर नहीं बन पाईं।

किसी जमाने में अपनो के कथित घात का शिकार बनी वही दबंग किरण बेदी मंगलवार को दिल्ली में पुलिस मुख्यालय के बाहर सड़क पर उतरे हवलदार सिपाहियों को बहुत याद आईं। मंगलवार को पुलिस मुख्यालय घेरने वालों में शामिल एक बीमार महिला हवलदार ने आईएएनएस से अपना नाम उजागर न करने की शर्त पर दो टूक कहा, हमारा यह गॉल्फ-1 (मौजूदा पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक) किसी काम का नहीं है। आज इसकी जगह पर अगर किरण बेदी मैडम होतीं, तो हमें मजबूर होकर सड़क पर भला क्यों उतरना पड़ता?

किरण मैडम (किरण बेदी) महकमे के हवलदार सिपाहियों की बहुत सुनती थीं। मैंने तो यही सुना है। यह कमिश्नर तो तीस हजारी कोर्ट में मरते-मरते बचे अस्पताल में दाखिल कर्मचारियों को देखने भी नहीं गया। दफ्तर में बैठे बैठे ही मोनिका मैडम (डीसीपी उत्तरी जिला मोनिका भारद्वाज) और संजय सिंह (तीस हजारी कांड में उत्तरी परिक्षेत्र के विशेष पुलिस आयुक्त कानून-व्यवस्था की कुर्सी से हाथ धो चुके) ने अपनी गर्दन बचाने के लिए नीचे वालों को ही सस्पेंड कर दिया। जबकि नीचे वालों ने वही किया जो अफसरों ने कहा। किरण बेदी मैडम तो सबसे आगे खड़ी होकर पहले सब कुछ अपने ही ऊपर ले लेतीं।

धरना-प्रदर्शन कर रहे नाराज पुलिसकर्मी अपने मौजूदा अफसरों की मौजूदगी में ही चीख-चिल्ला रहे थे कि किरण बेदी लाओ दिल्ली पुलिस बचाओ। नाराज पुलिस कर्मियों के इस व्यवहार से साफ जाहिर हो रहा था कि, वे दिल्ली पुलिस के मौजूदा पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक से किस कदर खफा हैं।

अगर इस कदर खून के आंसू अमूल्य पटनायक ने मातहतों को तीस हजारी कांड में न रुलाये होते तो शायद हवलदार सिपाही मंगलवार को सड़क घेर कर अपनो का न तो दिन अमंगल करते, न ही शायद उन्हें 17 फरवरी, 1988 यानी अब से करीब 31 साल पहले हुए तीस हजारी कांड की लीडर कही-सुनी जाने वाली किरण बेदी, अमूल्य पटनायक की पुलिस के दौर में याद आतीं।

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छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खात्मा ठोस रणनीति से संभव - अभय तिवारी

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का खात्मा ठोस रणनीति से संभव - अभय तिवारी

डिजिटल डेस्क, भोपाल। 21वीं सदी में भारत की राजनीति में तेजी से बदल रही हैं। देश की राजनीति में युवाओं की बढ़ती रूचि और अपनी मौलिक प्रतिभा से कई आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। बदलते और सशक्त होते भारत के लिए यह राजनीतिक बदलाव बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा ऐसी उम्मीद हैं।

अलबत्ता हमारी खबरों की दुनिया लगातार कई चहरों से निरंतर संवाद करती हैं। जो सियासत में तरह तरह से काम करते हैं। उनको सार्वजनिक जीवन में हमेशा कसौटी पर कसने की कोशिश में मीडिया रहती हैं।

आज हम बात करने वाले हैं मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस (सोशल मीडिया) प्रभारी व राष्ट्रीय समन्वयक, भारतीय युवा कांग्रेस अभय तिवारी से जो अपने गृह राज्य छत्तीसगढ़ से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं और छत्तीसगढ़ को बेहतर बनाने के प्रयास के लिए लामबंद हैं।

जैसे क्रिकेट की दुनिया में जो खिलाड़ी बॉलिंग फील्डिंग और बल्लेबाजी में बेहतर होता हैं। उसे ऑलराउंडर कहते हैं अभय तिवारी भी युवा तुर्क होने के साथ साथ अपने संगठन व राजनीती  के ऑल राउंडर हैं। अब आप यूं समझिए कि अभय तिवारी देश और प्रदेश के हर उस मुद्दे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगातार अपना योगदान देते हैं। जिससे प्रदेश और देश में सकारात्मक बदलाव और विकास हो सके।

छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या बहुत पुरानी है. लाल आतंक को खत्म करने के लिए लगातार कोशिशें की जा रही है. बावजूद इसके नक्सल समस्या बरकरार है।  यह भी देखने आया की पूर्व की सरकार की कोशिशों से नक्सलवाद नहीं ख़त्म हुआ परन्तु कांग्रेस पार्टी की भूपेश सरकार के कदम का समर्थन करते हुए भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर अभय तिवारी ने विश्वास जताया है कि कांग्रेस पार्टी की सरकार एक संवेदनशील सरकार है जो लड़ाई में नहीं विश्वास जीतने में भरोसा करती है।  श्री तिवारी ने आगे कहा कि जितने हमारे फोर्स हैं, उसके 10 प्रतिशत से भी कम नक्सली हैं. उनसे लड़ लेना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन विश्वास जीतना बहुत कठिन है. हम लोगों ने 2 साल में बहुत विश्वास जीता है और मुख्यमंत्री के दावों पर विश्वास जताया है कि नक्सलवाद को यही सरकार खत्म कर सकती है।  

बरहाल अभय तिवारी छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री बघेल के नक्सलवाद के खात्मे और छत्तीसगढ़ के विकास के संबंध में चलाई जा रही योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं. ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने यह कई बार कहा है कि अगर हथियार छोड़ते हैं नक्सली तो किसी भी मंच पर बातचीत के लिए तैयार है सरकार। वहीं अभय तिवारी  सर्कार के समर्थन में कहा कि नक्सली भारत के संविधान पर विश्वास करें और हथियार छोड़कर संवैधानिक तरीके से बात करें।  कांग्रेस सरकार संवेदनशीलता का परिचय देते हुए हर संभव नक्सलियों को सामाजिक  देने का प्रयास करेगी।  

बीते 6 महीने से ज्यादा लंबे चल रहे किसान आंदोलन में भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अभय तिवारी की खासी महत्वपूर्ण भूमिका हैं। युवा कांग्रेस के बैनर तले वे लगातार किसानों की मदद के लिए लगे हुए हैं। वहीं मौजूदा वक्त में कोरोना की दूसरी लहर के बाद बिगड़ी स्थितियों में मरीजों को ऑक्सीजन और जरूरी दवाऐं निशुल्क उपलब्ध करवाने से लेकर जरूरतमंद लोगों को राशन की व्यवस्था करना। राजनीति से इतर बेहद जरूरी और मानव जीवन की रक्षा के लिए प्रयासरत हैं।

बहरहाल उम्मीद है कि देश जल्दी करोना से मुक्त होगा और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ देगा। देश के बाकी संपन्न और विकासशील राज्यों की सूची में जल्द शामिल होगा। लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब अभय तिवारी जैसे युवा और विजनरी नेता निरंतर रणनीति के साथ काम करेंगे तो जल्द ही छत्तीसगढ़ भी देश के संपन्न राज्यों की सूची में शामिल होगा।