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मध्यप्रदेश में एक और बांध बनाने की तैयारी, डूबेंगे तीन जिलों के 23 गांव

मध्यप्रदेश में एक और बांध बनाने की तैयारी, डूबेंगे तीन जिलों के 23 गांव

हाईलाइट

  • यह बांध नर्मदा और गंजाल नदी पर संयुक्त सिंचाई परियोजना के तहत बनाया जाना प्रस्तावित है
  • इस परियोजना से तीन जिलों के 23 गांवों के प्रभावित होने का अनुमान है, लोग कर रहे विरोध

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्यप्रदेश में सरदार सरोवर बांध से मिले जख्म अभी भरे भी नहीं हैं कि एक और बांध बनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। यह बांध नर्मदा और गंजाल नदी पर संयुक्त सिंचाई परियोजना के तहत बनाया जाना प्रस्तावित है। इस परियोजना से तीन जिलों के 23 गांवों के प्रभावित होने का अनुमान है। डूब से आशंकित लोग इस बांध का विरोध कर रहे हैं। इस बांध के निर्माण के लिए निविदाएं भी आमंत्रित कर ली गई हैं। इस परियोजना से तीन जिलों- हरदा, होशंगाबाद और बैतूल के लगभग 2371 हेक्टेयर में फैले जंगलों का डूब में आना तय है।

जिंदगी बचाओ अभियान की शमारुख धारा ने आईएएनएस को बताया कि नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) को वर्ष 2012 में टीओआर मिला था, जिसकी वैधता दो साल की थी, मगर इसे बढ़ाकर चार साल किया गया। तीन साल बाद नवंबर, 2015 में इस परियोजना से प्रभावित होने वाले तीनों जिलों में जन-सुनवाई की गई थी। उस समय भी इसका जमकर विरोध हुआ था। फिर भी इस परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी के लिए प्रभाव का आकलन कर रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय को भेजी गई।

मोरंड-गंजाल संयुक्त सिंचाई परियोजना का विरोध करने वालों का दावा है कि पर्यावरण मंत्रालय ने मार्च, 2017 में कहा था कि इस परियोजना को पर्यावणीय मंजूरी तभी मिलेगी, जब एनवीडीए को वन विभाग की स्वीकृति मिल जाएगी। कानूनी प्रक्रिया के अनुसार, वन विभाग की स्वीकृति मिले बिना पर्यावरणीय मंजूरी के लिए आवेदन देना गैरकानूनी है। शमारुख ने सूचना के अधिकार के तहत हासिल की हुई जानकारी का हवाला देते हुए कहा, इस परियोजना के लिए न तो फॉरेस्ट क्लियरेंस मिला और न ही पर्यावरणीय मंजूरी, उसके बावजूद निविदाएं आमंत्रित कर ली गई हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता अमूल्य निधि का कहना है कि इस परियोजना से तीनों जिलों के 23 गांवों के जंगल और आबादी वाले आठ गांव प्रभावित होने वाले हैं। इस तरह बांध निर्माण का बड़ी आबादी पर बुरा असर पड़ेगा। इन गांवों में आदिवासियों की संख्या ज्यादा है। आशंका है कि उनके साथ उनकी आजीविका भी पानी में डूब जाएगी।

उपलब्ध ब्यौरे से पता चलता है कि पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2012 में इस परियोजना की लागत 1434 करोड़ रुपये बताई गई, जिसे शिवराज सरकार ने वर्ष 2017 में बढ़ाकर 2800 करोड़ रुपये कर दिया और इसकी प्रशासकीय स्वीकृति भी दे दी। अब इस परियोजना की जो निविदा जारी की गई है, वह 1800 करोड़ रुपये की है। यह अनुमानित लागत सिर्फ निर्माण कार्य की है, पुनर्वास पर अलग से खर्च होगा।

गुजरात सरकार द्वारा सरदार सरोवर बांध का जलस्तर बढ़ाए जाने से सरकारी रिकार्ड के अनुसार, 178 गांव बैक वाटर में डूब रहे हैं, वहां के हजारों परिवारों का जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष जारी है। इन प्रभावितों का अभी पुनर्वास भी हुआ नहीं है, आर्थिक समस्या का हवाला दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एनवीडीए ने एक और बांध बनाने के लिए निविदाएं आमंत्रित कर ली है।

बांध प्रभावितों की लड़ाई लड़ने वाले समूहों का कहना है कि एक तरफ सरकार पानी का अधिकार लागू करने की बात कर रही है, इसके लिए बनाई गई समितियों के सदस्य बने बांधों का विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नया बांध बनाने की कवायद तेज कर दी गई है। वर्तमान सरकार को इन स्थितियों की समीक्षा करना चाहिए, क्योंकि जहां मंडोर-गंजाल बांध बनाया जा रहा है, वहां पानी की समस्या नहीं है और न ही सिंचाई के लिए पानी की जरूरत है। सवाल उठ रहा है कि तब यह बांध क्यों? एनवीडीए का कोई भी अधिकारी इस नई परियोजना पर बोलने को तैयार नहीं है।

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