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रानी लक्ष्मी बाई जयंती: मणिकर्णिका ऐसे बनीं झांसी की रानी और फिर छुड़ाए अंग्रेजों के छक्के

रानी लक्ष्मी बाई जयंती: मणिकर्णिका ऐसे बनीं झांसी की रानी और फिर छुड़ाए अंग्रेजों के छक्के

हाईलाइट

  • नारी शक्ति के रूप में मनाई जाती है रानी लक्ष्मी बाई जयंती
  • सिर्फ 29 साल की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य से जद्दोजहद की
  • झांसी में रानी ने 14000 बागियों की सेना तैयार की थी

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी। ये कविता रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की गाथा को बयां करती है। 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में  हिस्सा लेने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती 19 नवबंर को मनाई जाती है, जो आज देशभर में मनाई जा रही है। उनकी जयंती के मौके पर आइए जानते हैं रानी लक्ष्मी बाई के बारे में कुछ खास बातें...

रानी लक्ष्मीबाई की जयंती को नारी शक्ति के रूप में मनाया जाता है। रानी लक्ष्मीबाई  ने झांसी की रक्षा के लिए सेना में महिलाओं की भर्ती की थी। लक्ष्मी बाई ने महिलाओं को युद्ध का प्रशिक्षण दिया था। साधारण जनता ने भी अंग्रेजों से झांसी को बचाने के लिए हुए इस संग्राम में सहयोग दिया था।

अंग्रेजों को चटाई थी धूल
एक समय था जब कई राजाओं ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेक दिए थे, ऐसे में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को धूल चटाई थी। 1857 में विद्रोह की जो चिनगारी सुलगी, वही आगे चलकर भारत को आजादी दिखाने वाली मुकम्मल रोशनी सााबित हुई। उन्होंने सिर्फ 29 साल की उम्र में अंग्रेज साम्राज्य की सेना से जद्दोजहद की। उनके इस साहस के लिए उन्हें मर्दानी की उपाधि दी गई।  

मणिकर्णिका ऐसे बनी लक्ष्मी बाई
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1835 को हुआ था और उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें लोगों द्वारा मनु कहा जाता था। उनकी मां का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। रानी लक्ष्मीबाई का विवाह सन् 1842 में झांसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झांसी की रानी बनीं। शादी होने के बाद उनका नाम रानी लक्ष्मीबाई रखा गया। 

दत्तक पुत्र
1851 में उन्होंने एक पुत्र का जन्म दिया लेकिन महज चार माह की उम्र में ही उसकी मौत हो गई। इसके बाद उन्हें बच्चा गोद लेने की सलाह दी गई। लड़का गोद लेने के बाद नवंबर 1853 में राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

शुरु हुई अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई
जैसे ही राजा का देहांत हुआ अंग्रेजों ने चाल चलकर लार्ड डलहौजी ने ब्रिटिश साम्राज्य के पैर पसारने के लिए झांसी का रुख किया। अंग्रेजों ने दामोदर को झांसी के राजा का उत्तराधिकारी स्वीकार करने से इनकार कर दिया। झांसी की रानी को सालाना 60000 रुपए पेंशन लेने और झांसी का किला खाली कर चले जाने के लिए कहा गया।

14000 बागियों की सेना
लेकिन झांसी को बचाने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने बागियों की फौज तैयार करने का फैसला किया। 1857 की बगावत ने अंग्रेजों का फोकस बदला और झांसी में रानी ने 14000 बागियों की सेना तैयार की। 18 जून 1858 को ह्यूरोज खुद जंग के मैदान में आ गया। 

लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं
जब वे अंग्रेजों से युद्ध करते हुए सोनरेखा नाले की और बढ़ीं, तो लेकिन रानी का घोड़ा इस नाले को पार नहीं कर सका। तभी एक अंग्रेज ने पीछे से तलवार से हमला कर दिया। इस मले में रानी लक्ष्मी बाई को काफी गहरी चोट आई और 18 जून 1858 को 23 वर्ष की आयु में रानी वीरगति को प्राप्त हो गई। 

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