दैनिक भास्कर हिंदी: ट्रिपल तलाक बिल लोकसभा में पेश, AIMIM प्रेसिडेंट ओवैसी का विरोध

December 28th, 2017

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ट्रिपल तलाक का ऐतिहासिक बिल आज लोकसभा में पेश किया गया। एआईएमआईएम के प्रेसिडेंट असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में इस बिल का विरोध करते हुए इसे संविधान के खिलाफ बताया। लोकसभा की कार्यसूची में मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 को आज जगह दी गई थी। हिन्दुस्तान में तीन तलाक को खत्म करना केंद्र की मोदी सरकार के मुख्य एजेंडे में से एक है। बिल को आसानी से पास कराने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी सांसदों को 28, 29 दिसंबर के लिए व्हिप जारी किया है और  इस मौके पर सभी को सदन में मौजूद रहने को कहा गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ लेफ्ट, कांग्रेस, टीएमसी और एनसीपी समेत विपक्ष का एक बड़ा तबका इसके विरोध मे था। लेकिन  देर रात कांग्रेस ने भी इस बिल पर अपनी सहमति दे दी। अब लोकसभा में बिल को पास करने का रास्ता और भी ज्यादा आसान हो गया है। उम्मीद की जा रही है कि इसी शीतकालीन सत्र में तीन तलाक का मसौदा कानून बन जाएगा।

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बुधवार देर रात कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अगुवाई में इस मुद्दे पर बैठक की गई। जानकारी के मुताबिक बैठक तीन तलाक बिल के समर्थन में सभी की सहमति बनती दिखी। अब बहुत मुमकिन है कि आज जब लोकसभा में बिल को पेश किया जाएगा तो कांग्रेस भी बीजेपी का समर्थन करेगी। कांग्रेस प्रवक्ता रंदीप सुरजेवाला ने कहा कि कांग्रेस पार्टी इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को बैन करने का समर्थन करती है। हलांकि सेक्शन 3 और 4 को परिभाषित करने की जरुरत है। इंस 

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बिल को लोकसभा में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पेश करेंगे। इस बिल को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अगुआई में एक अंतरमंत्रालयी समूह ने तैयार किया है। अगर सर्वसम्मति से ये विधेयक लोकसभा में पास हो गया तो फिर इस राज्यसभा में लाया जाएगा और कानून बनने के बाद तीन तलाक देना गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आ जाएगा। ऐसा करने वाले को तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। वहीं इस बिल में जुर्माने का भी प्रावधन किया गया है।

 

प्रस्तावित बिल महिला विरोधी

बीते रविवार को लखनऊ में इस संबंध में पर्सनल लॉ बोर्ड की वर्किंग कमेटी की बैठक हुई थी। इस बैठक में तीन तलाक पर प्रस्तावित बिल को लेकर चर्चा की गई। कई घंटों चली बैठक के बाद बोर्ड ने इस बिल को खारिज करने का निर्णय लिया। इतना ही नहीं ट्रिपल तलाक पर लाए जा रहे इस बिल को बोर्ड ने महिला विरोधी बताया है।

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बिना मुस्लिम संगठन की राय के बना बिल

इस बिल को लेकर सरकार की ओर से केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का बयान सामने आया है। रविशंकर प्रसाद ने बुधवार को कहा कि ट्रिपल तलाक बिल को तैयार करने के लिए मुस्लिम संगठनों से विचार-विमर्श नहीं किया गया। दरअसल संसद में इसे लेकर प्रश्न पूछा गया था। जिसके लिखित जवाब में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि 'सरकार का मानना है कि यह मुद्दा लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा की मानवीय अवधारणा से जुड़ा हुआ है और इसका आस्था और धर्म से कोई संबंध नहीं है।' इसीलिए मुस्लिम संगठनों से राय नहीं ली गई। 

 

बिल की प्रमुख बातें

- गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आएगा ट्रिपल तलाक
- बिल में है तीन साल तक की जेल का प्रावधान
- जम्मू कश्मीर में ये कानून लागू नहीं होगा
- ट्रिपल तलाक की पीड़ित महिला को गुजारा भत्ता का अधिकार
- मजिस्ट्रेट तय करेंगे गुजारा भत्ता

 

कैबिनेट से मिली थी हरी झंडी

इससे पहले शुक्रवार को आयोजित हुई केंद्रीय कैबिनेट मीटिंग में तीन तलाक से जुड़े बिल को हरी झंडी दिखा दी गई थी। मोदी सरकार 'द मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स इन मैरिज एक्ट' नाम से इस बिल को लेकर आ रही है। कानून बनने के बाद यह सिर्फ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) पर लागू होगा। बिल में कहा गया है कि अगर कोई पति तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहकर डिवोर्स लेता है तो फिर इसे गैर जमानती अपराध माना जाएगा और आरोपी को तीन साल की जेल की सजा होगी। इसमे जुर्माने का प्रावधान भी है। मेजिस्ट्रेट इस बात को तय करेंगे की आरोपी पर कितना जुर्माना लगाना है।

 

गठित हुआ था मंत्री समूह

पीएम नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक पर कानून बनाने के लिए एक मंत्री समूह बनाया था, जिसमें राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, रविशंकर प्रसाद, पीपी चौधरी और जितेंद्र सिंह शामिल थे। केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिछले दिनों कहा था कि नरेंद्र मोदी सरकार मुस्लिमों में तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने के लिए कानून लाने वाले है।

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सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंध

तीन तलाक पर शीर्ष अदालत ने प्रतिबंध लगा दिया था। तलाक-ए-बिद्दत मुस्लिम समाज में लंबे समय से चली आ रही एक प्रथा है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को एक बार में तीन तलाक बोलकर रिश्ता खत्म कर सकता है। इसको सायरा बानो नामक महिला ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी और इसी पर शीर्ष अदालत ने 22 अगस्त को फैसला सुनाया था।