मतदान की निगरानी: 'चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में काफी मुश्किल...' निर्वाचन आयोग को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने दी सलाह

चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में काफी मुश्किल... निर्वाचन आयोग को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने दी सलाह
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने निर्वाचन आयोग को लेकर बड़ा बयान दिया है।

डिजिटल डेस्क, पटना। देश में मौजूदा समय में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिनकी तारीखों का ऐलान भी हो गया है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना का बड़ा बयान सामने आया है। उनका कहना है कि अगर निर्वाचन आयोग राजनीति पार्टियों द्वारा घोषित किए गए प्रत्याशियों पर निर्भरता रहता है तो ऐसे में चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में काफी मुश्किल होती है। उन्होंने ये बयान बिहार की राजधानी पटना में चाणक्या विधि विश्वविद्यालय में राजेद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान के दौरान दिया है। इसके साथ ही उन्होंने मतदान की निगरानी करने वाले अधिकारियों की नियुक्ति की स्वतंत्रता पर भी गंभीर चिंता व्यक्त है।

उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक फैसले का हवाला दिया और कहा, "एक बार फिर यह संरचनात्मक चिंता है कि यदि चुनाव संचालित करने वाले, चुनाव लड़ने वालों पर निर्भर हों तो प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।"

चुनावों को लेकर क्या कहा?

समाचार एजेंसी पीटीआई ने जस्टिस बीवी के हवाले से लिखा कि चुनाव समय-समय पर होने वाली कोई घटना नहीं हैं, बल्कि वे एक प्रक्रिया है, जिसके जरिए नई सरकार का गठन किया जाता है। उन्होंने आगे कहा, "हमारी संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था ने यह प्रदर्शित किया है कि समय पर चुनाव होने से सरकारों का सुचारू रूप से परिवर्तन संभव हुआ है। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तों पर नियंत्रण के समान है।"

उन्होंने आगे कहा कि सत्ता सिर्फ औपचारिक संस्थाओं के माध्यम से नहीं होती है, बल्कि उन प्रक्रियाओं के जरिए भी संचालित की जाती है, जिनसे चुनाव, सार्वजनिक वित्त और विनियमन होती है। उन्होंने आगे कहा कि सत्ता को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक संरचना को इन 'चौथे स्तंभ' पर भी ध्यान देना चाहिए।

जस्टिस बीवी ने आयोग को दी सलाह

बीवी नागरत्ना ने आगे अपने संबोधन में कहा कि भले ही ये संस्थाएं तीन स्तंभों (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) में नहीं आती हो, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने में इनकी अहम भूमिका होती है। उन्होंने आगे कहा, "संरचना का विघटन तब होता है जब संस्थाएं एक-दूसरे पर नजर रखना बंद कर देती हैं। उस समय, चुनाव जारी रह सकते हैं, अदालतें काम कर सकती हैं, संसद द्वारा कानून बनाए जा सकते हैं, फिर भी, सत्ता पर प्रभावी रूप से कोई लगाम नहीं लगती क्योंकि संरचनात्मक अनुशासन का अस्तित्व ही समाप्त गया होता है।"

Created On :   5 April 2026 8:56 PM IST

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