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'येरूशलम को राजधानी नहीं माना, तो बंद होगी आर्थिक मदद'

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 21st, 2017 15:03 IST

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डिजिटल डेस्क, वॉशिंगटन। येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने के बाद अकेले पड़े अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने अब दुनिया के बाकी देशों को धमकी दी है। ट्रंप ने कहा है कि जो भी देश को येरूशलम को इजरायल की राजधानी नहीं मान रहे हैं, उनको दी जाने वाली आर्थिक मदद रोक दी जाएगी। बुधवार को व्हाइट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ये बात कही। ट्रंप ने ये भी कहा कि वो हमसे अरबों डॉलर की मदद लेते हैं और फिर हमारे ही खिलाफ वोटिंग करते हैं। बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने इसी महीने येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी है।


क्या कहना है ट्रंप का? 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि 'यूनाइटेड नेशन में येरूशलम को इजरायल की राजधानी नहीं मानने वाले देशों की आर्थिक मदद रोक दी जाएगी।' ट्रंप का कहना है कि 'वो हमसे अरबों डॉलर की मदद लेते हैं और हमारे खिलाफ ही वोटिंग करते हैं। उन्हें वोटिंग करने दो, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।' ट्रंप का ये बयान उस वक्त सामने आया है, जब कुछ ही दिनों में यूनाइटेड नेशन में येरूशलम को इजरायल की राजधानी नहीं मानने वाले प्रपोजल पर वोटिंग होनी है। माना जा रहा है कि ट्रंप ने ये धमकी इसलिए दी है, ताकि देश उसके पक्ष में वोटिंग कर दें। हालांकि जानकारों का ये भी मानना है कि ट्रंप की ये धमकी खोखली है।

अमेरिका लगा चुका है वीटो

इससे पहले यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल (UNSC) में येरूशलम पर लिए गए ट्रंप के फैसले पर चर्चा हुई और इस फैसले को रद्द करने का प्रपोजल पेश किया गया। इस प्रपोजल पर अमेरिका ने वीटो लगा दिया था। जिसके बाद इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हो सकी। इस प्रपोजल पर UNSC के सभी 14 देशों ने समर्थन दिया था, लेकिन अमेरिका ने इसे 'अपमान' बताते हुए वीटो का इस्तेमाल किया था। डोनाल्ड ट्रंप के प्रेसिडेंट बनने के बाद पहली बार अमेरिका ने वीटो का इस्तेमाल किया है। इससे पहले साल 2011 में अमेरिका ने वीटो का इस्तेमाल किया था। उस वक्त भी येरूशलम और इजरायल का ही मुद्दा था।

मुस्लिम देशों ने भी की थी अपील

हाल ही में मुस्लिम देशों के ग्रुप ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) ने अपील की है कि इंटरनेशनल कम्युनिटी फिलिस्तीनी क्षेत्र को अलग राष्ट्र की मान्यता देकर येरूशलम को उसकी राजधानी माने। इस ऑर्गनाइजेशन में 57 मुस्लिम देश शामिल है। वहीं फिलिस्तीनी प्रेसिडेंट महमूद अब्बास ने भी इस मामले में यूनाइटेड नेशन को आगे आने की बात कही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंस्तांबुल में हुई OIC की एक समिट के बाद प्रेस रिलीज जारी कर कहा है कि 'अमेरिका का येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता देना अमान्य है। अमेरिका का ये फैसला लेना बताता है कि उसने अब मिडिल-ईस्ट में शांति-वार्ता से हाथ पीछे खींच लिया है।' प्रेस रिलीज में अमेरिका के इस फैसले को 'एकतरफा' कहते हुए कहा गया है कि 'अमेरिका का ये फैसला कानूनी तौर पर अमान्य है और ये फिलिस्तीनी लोगों पर एक हमले की तरह है।'

ट्रंप के फैसले से बढ़ेगा आतंकवाद

इसके आगे OIC ने ये भी कहा था कि 'अमेरिका ने इस फैसले को लेकर दोनों देशों के बीच शांति की कोशिशों को नुकसान पहुंचाया है।' इस्लामिक कोऑपरेशन ने ये भी चेतावनी दी थी कि अमेरिका के इस कदम से आतंकवाद को भी बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा OIC ने ये भी कहा है कि 'अगर अमेरिका अपने इस गैरकानूनी फैसले को वापस नहीं लेता है तो इसके नतीजों की जिम्मेदारी वॉशिंगटन की होगी।' इसके साथ ही OIC ने सभी 57 मुस्लिम देशों से अपील की है कि वो फिलिस्तीनी क्षेत्र को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दें और येरूशलम को इसकी राजधानी मानें। उन्होंने इस मामले में यूनाइटेश नेशंस से भी आगे आने की अपील की है।

तीन धर्मों के लिए महत्वपूर्ण है ये जगह

येरूशलम वो जगह है, जिसपर इजरायल और उससे ही लगा फिलिस्तीन देश दोनों ही अपना-अपना हक जताते रहते हैं। इजरायल है तो यहूदियों का देश, लेकिन इसकी राजधानी येरूशलम यहूदियों के साथ-साथ मुस्लिम और ईसाईयों के लिए भी बहुत महत्व रखती है। येरूशलम में टेंपल माउंट है, जो यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल है। वहीं अल-अक्सा मस्जिद को मुसलमान बेहद पाक मानते हैं। उनकी मान्यता है कि अल-अक्सा मस्जिद ही वो जगह है जहां से पैगंबर मोहम्मद जन्नत पहुंचे थे। इसके अलावा कुछ ईसाइयों की मान्यता है कि येरूशलम में ही ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। यहां मौजूद सपुखर चर्च को ईसाई बहुत ही पवित्र मानते हैं। बताया ये भी जाता है कि यहां पर यहूदियों का पवित्र स्थल सुलेमानी मंदिर हुआ करता था, जिसे रोमनों ने नष्ट कर दिया था।

इजरायल हमेशा से मानता रहा है राजधानी

1948 में इजरायल एक आजाद देश बना और इसके एक साल बाद येरूशलम का बंटवारा हो गया। येरूशलम पर इजरायल और फिलिस्तीन दोनों ही दावे करते रहे हैं। इसके बाद इजरायल ने करीब 6 दिनों तक फिलिस्तीनियों से लड़ने के बाद इस शहर पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 1980 में इजरायल ने येरूशलम को अपनी राजधानी बनाने की घोषणा की, लेकिन यूनाइटेड नेशंस ने इस कब्जे की निंदा की। यही वजह है कि येरूशलम को कभी भी इजरायल की राजधानी के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली। वहीं फिलिस्तीन ने भी हमेशा से इस शहर को अपनी राजधानी बनाने की मांग करते आ रहे हैं।

क्यों है येरूशलम को लेकर विवाद? 

दरअसल, येरूशलम इजरायल का बहुत बड़ा शहर है। इसके साथ ही ये इस्लाम, ईसाई और यहूदियों के लिए भी काफी अहम जगह है। इसी जगह पर यहूदियों का दुनिया में सबसे स्थान है, जबकि इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद ये तीसरा सबसे पवित्र स्थान है। इसके साथ ईसाईयों की भी मान्यता है कि यहां पर जीजस क्राइस को सूली पर चढ़ाया गया था। येरूशलम के पूर्वी हिस्से में मुस्लिम आबादी ज्यादा है, जबकि पश्चिमी हिस्सों में यहूदी आबादी रहती है। इसके साथ ही यहां मौजूद अल अक्सा मस्जिद में इजरायल 18-50 साल के लोगों को जाने से रोकता है, क्योंकि उसका मानना है कि ये लोग अक्सर यहां प्रदर्शन करते हैं।

इजरायल और फिलिस्तीन के बीच क्यों है विवाद? 

फिलिस्तीन एक अरब देश था और पहले वर्ल्ड वॉर के बाद यहां नई सरकार बनी। इसी के बाद से दुनियाभर के यहूदियों ने फिलिस्तीन में बसना शुरू कर दिया। शुरुआत में यहां पर यहूदियों की आबादी 30 फीसदी थी, जो अगले 30 सालों में बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई। इसके बाद यहूदियों ने अरब लोगों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी। इसके बाद ब्रिटेन ने यहूदियों के फिलिस्तीन जाने पर पाबंदी लगा दी। इसके बाद यहूदियों ने अपना एक अलग देश होने की मांग की। आखिरकार 1947 में यूनाइटेड नेशंस में एक रिजोल्यूशन पास किया गया, जिसके तहत इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। इसका एक हिस्सा अरब देश बना और दूसरा यहूदियों का राज्य- इजरायल बना। अलग होने के बाद से ही दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया। इसकी वजह थी येरूशलम। येरूशलम वो हिस्सा था, जहां यहूदी और मुसलमान दोनों रहते थे। इसलिए यूएन ने फैसला लिया कि येरूशलम को अंतर्राष्ट्रीय सरकार चलाएगी। येरूशलम के अलावा यहां की 'गाजा पट्टी' भी हमेशा से दोनों देशों के बीच विवाद का कारण रही है।

अलग होने के बाद बढ़ा विवाद

अलग होने के बाद ही फिलिस्तीन और इजरायल के बीच असली जंग शुरू हुई। इसके बाद फिलिस्तीन की पीएलओ यानी पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ने इजरायल के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी। इस लड़ाई में तकरीबन 100 यहूदियों को और 1000 अरब लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसी के बाद 'हमास' जो इजरायल विरोधी आतंकवादी संगठन है, उसका जन्म हुआ। हालांकि वक्त के साथ-साथ पीएलओ तो इजरायल के समर्थन में आ गया लेकिन हमास ने इसे कभी देश नहीं माना। आखिरकार 1993 में दोनों देशों के बीच 'ओस्लो समझौता' हुआ, जिसके तहत इजरायल को एक देश के तौर पर मान्यता दी गई और इजरायल ने भी पीएलओ को मान्यता दी। इससे पहले पीएलओ को भी आतंकी संगठन माना जाता था।

6 दिसंबर को ट्रंप ने दी थी मान्यता 

इसी महीने 6 दिसंबर को अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी थी। येरूशलम वो इलाका है, जिसपर इजरायल और फिलीस्तीन दोनों ही देश अपना दावा करते हैं। व्हाइट हाउस में दिए अपने भाषण में ट्रंप ने कहा था कि 'अब समय आ गया है कि येरूशलम को इजरायल की राजधानी बनाया जाए।' उन्होंने कहा कि 'फिलीस्तीन से विवाद के बावजूद येरूशलम पर इजरायल का अधिकार है।' ट्रंप ने अपने इस कदम को शांति स्थापित करने वाला कदम बताते हुए कहा है कि 'येरूशलम को इजरायल की राजधानी की मान्यता देने में देरी की पॉलिसी शांति स्थापित नहीं कर पाई और इससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ।' ट्रंप ने ये भी कहा कि हम एक ऐसा समझौता चाहते हैं जो इजरायल और फिलीस्तीन दोनों के लिए बेहतर हो।

इजरायल ने क्या कहा था? 

अमेरिकी प्रेसिडेंट के इस फैसले पर इजरायल ने खुशी जाहिर की है। इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ऐतिहासिक दिन बताते हुए कहा है कि 'येरूशलम 70 साल से इजरायल की राजधानी रही है। ये हमारी उम्मीदों, सपनों और प्रार्थनाओं का केंद्र रहा है। इसके साथ ही पिछले 3,000 सालों से ये यहूदियों की राजधानी रही है।' नेतन्याहू ने आगे कहा कि 'येरूशलम वही जगह है, जहां हमारे पवित्र धर्म स्थल रहे हैं और हमारे राजाओं ने शासन किया है।' उन्होंने कहा कि 'दुनिया के कोने-कोने से यहूदी उदास होकर येरूशलम लौटे, ताकि वो यहां के पवित्र पत्थर को छू सके।' वहीं फिलिस्तीनियों ने ट्रंप के इस फैसले की आलोचना की है।

कई देशों ने की ट्रंप ने की निंदा

वहीं येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने पर दुनियाभर में ट्रंप की निंदा भी होने लगी है। मुस्लिम देशों ने ट्रंप के इस फैसले को शांति के खिलाफ और हिंसा भड़काने वाला बताया है। तुर्की के फॉरेन मिनिस्टर ने इस फैसले को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए ट्वीट किया जिसमें लिखा है कि 'ये फैसला इंटरनेशनल लॉ और यूनाइटेड नेशंस के इस बारे में पास किए गए प्रपोजल्स के खिलाफ है।' वहीं सऊदी अरब का भी कहना है कि इस फैसले से शांति को नुकसान पहुंचेगी और इलाके में तनाव बढ़ेगा। इसके अलावा इजिप्ट के प्रेसिडेंट अब्दुल फतह अल सीसी ने भी कहा है कि इस फैसले से शांति की उम्मीदें कमजोर होंगी। इसके साथ ही ट्रंप के इस फैसले के विरोध में पाकिस्तान में निंदा प्रस्ताव भी पारित हो चुका है। वहीं इस मामले में यूरोपियन यूनियन भी कह चुका है जब तक शांति समझौता नहीं हो जाता, तब तक येरूशलम को इजरायल की राजधानी नहीं माना जाएगा। 

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