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कुछ इस तरह बीता था महात्मा गांधी का आखिरी दिन

BhaskarHindi.com | Last Modified - January 30th, 2018 08:33 IST

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Source : Youtube


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली।
उस दिन शुक्रवार था। तारीख थी 30 जनवरी 1948। ठंड का मौसम था और जाड़े की वजह से धूप आंख-मिचौली खेल रही थी। हर दिन की तरह ही महात्मा गांधी उस दिन भी तड़के साढ़े तीन बजे सोकर उठ गए थे। उठकर उन्होंने प्रार्थना की और कांग्रेस की नई जिम्मेदारियों के मसौदे पर काम किया। फिर सुबह 6 बजे सोने चले गए और 8 बजे उठे। किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था, कि महात्मा गांधी का आज आखिरी दिन है और इसके बाद वो इतिहास में सदा के लिए अमर हो जाएंगे। महात्मा गांधी का आखिरी दिन भी बाकी आम दिन की तरह ही था। वहीं शहर के दूसरे कोने में नाथूराम गोड़से अपने तीन साथियों के साथ अभी भी सो रहे थे। आइए जानते हैं कि किस तरह बीता था महात्मा गांधी का 'आखिरी दिन'?

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महात्मा गांधी उठ गए, हत्यारे अभी भी सो रहे थे

महात्मा गांधी की आदत थी कि वो रोज सुबह जल्दी उठकर सारे काम निपटाते थे। उस दिन भी महात्मा गांधी तड़ते 3:30 बजे सोकर उठ गए थे। उठकर उन्होंने पहले प्रार्थना की और फिर अपना कुछ जरूरी काम करने लगे। महात्मा गांधी यहां सोकर उठ चुके थे, लेकिन शहर के दूसरे कोने में नाथूराम गोड़से, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे अभी भी गहरी नींद में सो रहे थे। उसी दिन गांधी जी की शाम को 4 बजे सरदार पटेल और फिर 7 बजे जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात होने वाली थी। उससे पहले सुबह-सुबह गांधी जी की दो सहयोगियों मनु और आभा ने नाश्ता तैयार किया। उस दिन नाश्ते में गांधी जी के लिए बकरी का दूध, उबली हुई सब्जियां, टमाटर, मूली और गाजर खाई। संतरे का जूस भी उन्होंने पिया। उसी दिन गांधी जी से डरबन से उनके पुराने साथी रुस्तम सोराबाजी भी मिलने आए थे।

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चरखा चलाते-चलाते की पटेल से बात

दोपहर में लोगों से मिलने-जुलने के बाद शाम के 4 बज चुके थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल गांधी जी से मिलने पहुंच चुके थे। गांधी जी बैठे चरखा चला रहे थे और साथ ही शाम का नाश्ता भी कर रहे थे। पटेल भी उनके बाजू में बैठे हुए थे और बात कर रहे थे। बात करते-करते पता ही नहीं चला कि कब शाम के 5 बज गए। गांधी जी को बिड़ला हाउस निकलना था प्रार्थना सभा के लिए। गांधी जी को थोड़ी भी देरी बर्दाश्त नहीं थी और सामने पटेल जैसा नेता बैठा हुआ था तो मनुबेन की भी हिम्मत नहीं हुई कि गांधी जी को याद दिला दिया जाए। आखिरकार मनुबेन ने हिम्मत जुटाई और गांधी जी को प्रार्थना सभा में जाने को मिला। गांधी जब उठे, उस वक्त 5 बजकर 10 मिनट हो रहे थे। रोज गांधी जी 5 बजकर 10 मिनट तक प्रार्थना सभा में पहुंच जाते थे और शायद ये पहली बार था जब गांधी जी लेट हो रहे थे।

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और फिर निकल पड़े बिड़ला हाउस की तरफ...

मनुबेन के हस्तक्षेप के बाद गांधी जी ने तुरंत अपनी चप्पल पहनी और बायां हाथ मनु और दायां हाथ आभा के कंधे पर डालकर सभा के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने आभा का मजाक भी उड़ाया। मजाक-मस्ती के बीच आभा ने गांधी जी से कहा कि 'आज आपकी घड़ी भी सोच रही होगी कि उसको नजरअंदाज किया जा रहा है।' इसके बाद गांधी जी गंभीर होकर बोले 'तुम्हारी वजह से मुझे 10 मिनट की देरी हो गई। एक नर्स का ये काम होता है वो अपना काम करे, चाहे वहां भगवान भी क्यों न मौजूद हो। प्रार्थना सभा में एक मिनट की देरी से भी मुझे चिढ़ है।' बात करते-करते जब महात्मा गांधी प्रार्थना सभा में पहुंचे, तो उन्होंने कंधों से हाथ निकालकर लोगों का अभिवादन किया।

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उधर गोड़से भी निकल पड़ा था 

उधर नाथूराम गोड़से अपने दो साथियों विष्णु करकरे और नारायण आप्टे के साथ दिल्ली रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में ठहरे हुए थे। बिड़ला हाउस निकलने से पहले नाथूराम गोड़से ने मूंगफली खाने की इच्छा जताई और फिर आप्टे ने जहां-तहां से ढूंढकर उनके लिए मूंगफली का इंतजाम किया। मूंगफली खाने के बाद गोड़से बिड़ला हाउस की तरफ निकल पड़े। सवा 4 बजे के करीब गोड़से और उनके साथियों ने कनाट प्लेस के लिए एक तांगा किया और वहां उतर गए। फिर उन्होंने दूसरा तांगा किया और बिड़ला हाउस से थोड़ी दूर पहले उतर गए।

फिर वो हुआ, जिसने पूरे देश को रुला दिया

गांधी जी बिड़ला हाउस पहुंच चुके थे और नाथूराम गोड़से भी वहां पहुंच चुके थे। गांधी जी प्रार्थना सभा पहुंचकर लोगों से मिल रहे थे। तभी नाथूराम गोड़से भी वहां पहुंच गया। गांधी जी की सहयोगी मनु और आभा को लगा कि वो गांधी के पैर छूने की कोशिश कर रहे हैं। तभी आभा ने गोडसे को मना करते हुए कहा कि वैसे ही बहुत देर हो चुकी है। तभी गोडसे ने मनु को धक्का दिया और पिस्टल निकाल ली और एक के बाद एक तीन गोलियां गांधी जी के सीने और पेट में उतार दी। गांधी जी के मुंह से निकला 'राम...रा...म...' और फिर उनका शरीर नीचे गिरने लगा।

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आखिरी भाषण देते वक्त इंदिरा को हो गया था मौत का एहसास !

फायर करने के बाद वहीं खड़ा रहा गोडसे

गांधी जी की हत्या करने के बाद नाथूराम गोड़से वहीं खड़ा रहा और पिस्टर को पकड़कर ऊपर हाथ को उठाए रखा और पुलिस-पुलिस चिल्लाने लगा। गोडसे ने अपने भाई गोपाल गोडसे को बताया कि 'वो दिखाना चाहता था कि उसने गांधी जी की हत्या जानबूझकर की इसलिए उसने न ही पिस्टल को फेंकने या वहां से भागने की कोशिश की।' गांधी जी की हत्या के आरोप में गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया और गांधी जी को बिड़ला हाउस के अंदर ले जाया गया।

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गांधी जी की मौत के गम में लोगों ने सिर मुंडवा लिए

गांधी जी की मौत के अगले दिन यानी 31 जनवरी 1948 को उनका अंतिम संस्कार किया जाना था। पूरे देश में गम का माहौल था और न जाने कितने ही लोगों ने अपने सिर मुंडवा रखा था। देशभर से लोग देसी घी लेकर गांधी जी की अत्येष्टि में शामिल होने पहुंचे। गांधी जी की शवयात्रा बिड़ला हाउस से होते हुए जनपथ, कनाट प्लेस और आईटीओ होते हुए राजघाट पहुंची। उनकी शवयात्रा में हजारों-लाखों लोग शामिल हुए थे और पूरा देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया गांधी जी की मौत का दुख मना रही थी। 

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