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जानिए - आखिर संघ क्यों हो रहा सरकार से इतना गदगद

जानिए - आखिर संघ क्यों हो रहा सरकार से इतना गदगद

डिजिटल डेस्क, नागपुर। केंद्र सरकार को लेकर संघ गदगद है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी दल या सरकार का समर्थन नहीं करता है। सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत का यह दावा विजयादशमी उत्सव में अतीत का हिस्सा बनता चला गया। सरसंघचालक के संबोधन की शुरुआत ही सरकार की प्रशंसा के साथ हुई। कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार को नकारात्मकता से घिरी व गिरी दर्शाते हुए सरसंघचालक ने भाजपा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार को जनता की पसंद ठहराया। इतना ही नहीं,सरसंघचालक ने कांग्रेस सरकार के समय के लोकतंत्र काे भी शब्दों के कटघरे में खड़ा कर दिया। बकौल सरसंघचालक-2014 में आया परिवर्तन केवल 2014 के पहले की सरकार के प्रति मोहभंग से उत्पन्न हुई एक नकारात्मक राजनीतिक लहर का परिणाम है, अथव विशिष्ठ दिशा में जाने के लिए जनता ने अपना मन बना लिया है,यह 2019 के चुनावों में दिखाई देना था। विश्व का ध्यान उस ओर भी था। जनता ने अपनी दृढ़ राय प्रकट की और देश में प्रजातंत्र, विदेशों से आयातित नई अपरिचित बात नहीं है, बल्कि देश के जनमानस ने सदियों से चलती आयी प्रजातंत्र तथा स्वातंत्रयोत्तर काल में प्राप्त अनुभव व प्रबाेधन के परिणाम स्वरुप प्रजातंत्र में रहना व प्रजातंत्र को सफलतापूर्वक चलाना यह समाज का मन बन गया है। सीमा सुरक्षा के मामले में सरसंघचालक लगभग हर विजयादशमी उत्सव में सरकार का कर्तव्य का स्मरण कराते रहे। इस बार कहा,बाहर ही नहीं भीतर भी सुरक्षा की उपाययोजना बढ़ी है। अनुच्छेद 370 हटाने के मामले में प्रधानमंत्री के साथ ही गृहमंत्री की पीठ थपथपाते हुए कहा गया कि सत्ता में पहुंचे दल ने अपना जन्म का संकल्प पूरा किया है।

भाजपा का नाम लिए बिना कहा कि जनसंघ के बाद जो दल बना उसका पहला संकल्प कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना ही था। यह भी कहा कि जो अच्छे कार्य दिख रहे हैं उसकी सीख का केंद्र संघ ही है। संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक ऐसे कार्यों के लिए ही सत्ता में भेजे जाते हैं। आर्थिक मामले में तो सरकार का खुलकर बचाव किया गया। मंदी के प्रश्न को ही निराधार ठहरा दिया गया। मंदी दर्शानेवाली जीडीपी पर प्रश्न उठा दिए। दावा किया, 4 तो क्या 1 प्रतिशत भी जीडीपी दर हो तो आर्थिक मंदी नहीं मानी जा सकती है। भ्रष्टाचार के मामले विरोधकों के आराेपों का इन शब्दों में उत्तर दिया कि अब तो भ्रष्टाचार के छिद्र भरने का काम हो रहा है। स्वदेशी पर संघ सरकार को अक्सर तंग करता रहा है। एफडीए पर आंख दिखाते रहा है। लेकिन इस मामले पर भी संघ ने राय बदल दी। बतौर सरसंघचालक-विश्व की आर्थिक व्यवस्था चक्र की गति में आयी मंदी सर्वत्र कुछ न कुछ परिणाम करती है। अमेरिका व चीन में चली आर्थिक स्पर्धा के परिणाम भी भारत सहित सभी देशों को भुगतने पड़ते हैं। इस स्थिति से राहत देनेवाले कई उपाय सरकार ने डेढ़ माह में किए है। तथाकथित मंदी के चक्र से हम निश्चिम रुप से बाहर आएंगे। अर्थव्यवस्था में बल भरने के लिए विदेशी सीधे पूंजी निवेश का अनुमति देना व उद्योगों का निजीकरण के लिए सरकार को बाध्य होना पड़ा है। 

 

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