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आदिवासियों से ज्यादा पर्यटकों से वन्यजीवों को खतराः हाईकोर्ट

आदिवासियों से ज्यादा पर्यटकों से वन्यजीवों को खतराः हाईकोर्ट

डिजिटल डेस्क,मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेलघाट अभ्यारण्य से सात गांवों के लोगों को हटाए जाने को दुखद बताते हुए कहा है कि वन्यजीवों के लिए मुक्त विचरण क्षेत्र तय करने के लिए पारदर्शी व निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए और अगली सुनवाई के दौरान वन्य जीव विचरण क्षेत्र तय करने के लिए गठित की गई विशेषज्ञ कमेटी की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नांदराजोग की खंडपीठ ने कहा कि वन्य जीवों को आदिवासियों से ज्यादा खतरा पर्यटकों से है। आदिवासी वनों के बेहतर संरक्षक होते हैं। इस दौरान अदालत ने राज्य सरकार को फटकार लगाई।  इससे पहले सामाजिक कार्यकर्ता पूर्णिमा उपाध्याय ने खंडपीठ के सामने कहा कि मेलघाट अभ्यारण्य से जिन सात गांव के लोगों को हटाया जा रहा है, उनमे में डोलर, केलपानी, धरगाध, गलरघट, सेसमना, चुरनी व वैरट शामिल हैं। इन सात गांवों में से तीन गांव के लोगों को निष्कासित किया जा चुका है जबकि चार गांवों के ग्रामीणों को निकाले जाने की प्रकिया जारी है।

आदिवासियों के अधिकारों पर विचार किए बिना उन्हें निकाला जा रहा है यह वन अधिकार कानून के प्रावधानों के खिलाफ है। सरकार ने प्राणियों के विचरण क्षेत्र को तय करने के लिए विशेषज्ञ कमेटी गठित की है लेकिन इस कमेटी में आदिवासियों के मुद्दे को कौन देखेगा उसके नाम का जिक्र भी नहीं किया गया है।  इस पर खंडपीठ ने कहा कि विशेषज्ञ कमेटी में संतुलन होना जरूरी है और सभी पक्षों को निष्पक्षता से सुना जाना आवश्यक है। ताकि टकराव की स्थिति से बचा जा सके। खंडपीठ ने कहा कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिए मानव हस्तक्षेप रहित क्षेत्र होना ही चाहिए। अन्यथा वन्य जीवों की सख्या कैसे बढ़ेगी। खंडपीठ ने कहा कि पर्यटकों को बाघ दिखाने के नाम पर लोग ऐसे क्षेत्र तक पहुंच जाते हैं जहां नहीं जाना चाहिए।

आदिवासियों की अपेक्षा पर्यटक प्राणियों के लिए खतरा है।   वन्य जीवों के सरंक्षण के लिए मुक्त विचरण क्षेत्र चिन्हित किए जाने की मांग को लेकर वन शक्ति नामक गैर सरकारी संस्था ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। सोमवार को खंडपीठ के सामने याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता जमान अली ने कहा कि वन्य जीवों के सरंक्षण के लिए पर्याप्त कदम न उठाने के चलते कई पक्षी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इस पर खंडपीठ ने कहा कि वन विभाग को बाघ व भालू सहित अन्य सभी जीवों के सरक्षण के लिए पर्याप्त कदम उठाने चाहिए। खंडपीठ ने कहा कि वन विभाग जानता सब कुछ है पर वह कुछ करना नहीं चाहता । अदालत ने सरकार के रवैए पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार के लोग कोर्ट में सिर्फ ओठ हिलाने का कार्य कर रहे हैं। 
 

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