पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: दशकों तक कांग्रेस का दबदबा फिर छूटी पकड़! जानें कैसे बना भवानीपुर ममता बनर्जी का गढ़

डिजिटल डेस्क, कोलकाता। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव जीतने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। अमूमन चुनाव में किसी भी पार्टी के उम्मीदवार की जीत का रास्ता उसके निर्वाचन क्षेत्र के इतिहास और मजबूत पकड़ से होकर गुजरता है। कुछ ऐसा ही इतिहास पश्चिम बंगाल की भवानीपुर सीट का भी है। भवानीपुर सीट राज्य की हॉट सीटों में से एक हैं। इस सीट का इतिहास कांग्रेस के दबदबे से शुरू होकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के गढ़ में जाकर बदला है। लेकिन, आपको जानकर हैरानी होगी कि सीट बनने के बाद कई सालों तक भवानीपुर में टीएमसी का कुछ खास प्रभाव नहीं रहा था।
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कांग्रेस का गढ़ रह चुका भवानीपुर
हाल ही में तृणमूल कांग्रेस पार्टी की मुखिया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी के नेताओं के साथ मीटिंग की थी। इस मीटिंग में ममता बनर्जी ने नेताओं को सतर्क रहने के लिए कहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है। 3 दिनों में 50 लोगों को हटाया जा चुका है। इसके अलावा उन्होंने कई पार्षदों की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अपने निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर के बारे में बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा, "भवानीपुर में हर कोई मुझे जानता है। घर बदलने की बात होने के बावजूद मैंने भवानीपुर नहीं छोड़ा। मेरी मां ने मुझे यह घर बदलने नहीं दिया।
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, आजादी के बाद से दक्षिण कोलकाता के अंतर्गत आने वाली भवानीपुर सीट पर कांग्रेस ने दशकों तक राज किया है। दरअसल, यह सीट राजनीतिक हस्तियों का गृह क्षेत्र रही है। पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने कांग्रेस के टिकट पर इस सीट पर चुनाव लड़ा था। इसके बाद अगला चुनाव भी उन्होंने यहीं से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा और जीता भी था। इसके अलावा मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार जैसे अन्य कांग्रेस के दिग्गजों नेताओं ने भी यही से चुनाव लड़ा और जीता भी। यही वजह है कि भवानीपुर को मजबूत कांग्रेसी गढ़ों के रूप में पहचान मिली।
सियासी नक्शे से हटा था भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र
बता दें, कई दशकों तक भवानीपुर कांग्रेस का अभेद किला रहा है। हालांकि, साल 1969 में कुछ समय तक यह सीट वामपंथी के पाले में आ गई थी। इसके बाद इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट निर्वाचन क्षेत्र कर दिया गया। साल 1953 में सीपीआई (एम) नेता साधन गुप्ता यहीं से भारत के पहले दृष्टिबाधित सांसद चुने गए। इसके बाद साल 1972 में भवानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने दिलचस्प मोड़ लिया। जब परिसीमन के बाद यह निर्वाचन क्षेत्र सियासी नक्शे से हट गया।
करीब 4 दशकों तक राजनीतिक पटल से गायब रहने के बाद भवानीपुर सीट को साल 2011 के परिसीमन में फिर से जीवित किया गया। इसी बीच बंगाल की राजनीति में नाटकीय उथल-पुथल देखने को मिली थी। उसी साल वाम मोर्चे के 34 वर्षीय शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी की दबदबे की शुरुआत हुई।
Created On :   23 March 2026 6:26 PM IST












