विधानसभा चुनाव 2027: आगामी चुनाव में क्यों 'हाथी' की सवारी करना चाहती हैं सपा-कांग्रेस? बसपा पहले ही अकेले चुनाव लड़ने का कर चुकी है ऐलान

डिजिटल डेस्क, भोपाल। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रही बीएसपी अध्यक्ष मायावती 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के मैदान में अकेले उतरने का कई मौकों पर ऐलान कर चुकी है। ना केवल यूपी बल्कि देश के किसी भी प्रदेश में होने वाले चुनाव में बीएसपी बिना गठबंधन के ही अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है। आखिर कार इसके पीछे की वजह क्या है, जबकि कोई भी दल बीएसपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने के लिए राजी है। कांग्रेस और सपा में अपने अपने दबदबे और सीट बंटवारे पर बनी खींचतान और छटपटाहट लगातार बढ़ रही है। बिना समय लिए हुए कांग्रेस नेता तो बीएसपी चीफ मायावती से मुलाकात करने उनके आवास के गेट तक पहुंच गए, वहां से बिना मुलाकात लौटे कांग्रेस नेताओं ने सियासी गलियारों में खूब चिल्लाया, जो सोशल मीडिया से लेकर मीडिया सुर्खियां में रही।
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आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस और सपा दोनों ही असहज है, दूसरी तरफ साल 2007 में जिस ब्राह्मण- दलित वर्ग के सहारे बीएसपी ने यूपी में अपने अकेले के दम पर सरकार बनाई थी, उस सामाजिक समीकरण को बीएसपी फिर से भुनाने में लगी हुई है। 2027 में अकेले चुनाव लड़ने वाली बसपा ने अपनी अगली चुनावी रणनीति के दम पर फिर से सत्ता बनाने का दावा कर रही है। बीएसपी नेताओं का मानना है कि यूपी की जनता के मूड़ में है अबकी बार फिर से हाथी की सरकार बनाना है। बीएसपी पांचवीं बार यूपी में सरकार बनाएगी।
आपको बता दें 403 विधानसभा सीट वाले यूपी में बीएसपी ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है, भले ही चुनाव में अभी करीब आठ महीने बाकी हैं, लेकिन बीएसपी ने कई विधानसभाओं में पार्टी प्रभारी और प्रत्याशियों की नियुक्तियां और घोषणाएं शुरु कर दी है, हालांकि अभी चुनावी उम्मीदवारों की आधिकारिक लिस्ट जारी नहीं की है। बीएसपी ना केवल दलित-ब्राह्मण वर्ग पर फोकस कर रही है, बल्कि बनिया, मुस्लिम भाईचारा और ओबीसी वोटर्स पर फोकस करते हुए 2007 के सामाजिक समीकरण को आगे बढ़ाते हुए दलित-ओबीसी -ब्राह्मण -बनिया समीकरण बनाने की रणनीति बनाने की खबर है। अबकी चुनाव में मुस्लिम और बनिया वोटर्स अहम भूमिका में हो सकते है। सामाजिक समीकरण को अभी से चुनावी हवा देने के लिए कुछ चुनिंदा सीटों पर उम्मीदवारी के लिए प्रभारियों के तौर पर नामों की घोषणा की है। मौजूदा शासन को लेकर मुस्लिम समुदाय में बुलडोजर का डर है, मुस्लिम वोटर्स का मानना है कि इतने समय से कांग्रेस समाजवादी पार्टी का साथ देने से क्या हासिल हुआ है। आपको बता दें सैकड़ों सीटों पर मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों में निर्णायक मोड़ में होती है। ऐसे में अन्य दलों से मुस्लिम मतदाताओं का मोह भंग होता नजर आ रहा है, जिसका असर आगामी चुनाव में पड़ सकता है।
Created On :   4 Jun 2026 6:49 PM IST














