कर्नल सोफिया कुरैशी पर टिप्पणी का मामला: क्या सरकार को देना पडे़गी मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन को मंजूरी?

क्या सरकार को देना पडे़गी मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन को मंजूरी?
अभियोजन की मंजूरी के साथ ही विजय शाह को अदालती कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है, नैतिकता के आधार पर उन्हें मंत्री पद से रिजाइन भी देना पड़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो शाह पूरे देश में अपने बोल वचन की वजह से कैबिनेट दो बार इस्तीफा देने वाले पहले मंत्री होगे।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। सुप्रीम कोर्ट से फटकार मिलने के बाद क्या मध्यप्रदेश सरकार को देना पडे़गी मंत्री विजय शाह के खिलाफ अभियोजन को मंजूरी। ऐसा हुआ तो बोलवचन के कारण दूसरी बार जाएगी शाह की कुर्सी ,देश के पहले कैबिनेट मंत्री होंगे जिनको अपने विवादित बयानों के कारण हटाना पड़ेगा। इसका आदिवासी वोट बैंक पर कितना पड़ सकता है असर, सरकार को फैसले लेने में देरी की क्या है वजह, क्या फैसला लेने में डर ही सरकार। यहां पढ़िए विजय शाह के सियासी सफर के बोल वचन जिनकी सार्वजनिक स्तर पर हुई आलोचना।

सुप्रीम कोर्ट में मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह की कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी केस की अगली सुनवाई पर प्रदेश के साथ साथ पूरे देश की नजर टिकी हुई है। क्योंकि पिछली सुनवाई में शीर्ष कोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए विजय शाह पर एक्शन लेने की बात कही थी, अब देखना है कि टॉप कोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले मध्यप्रदेश सरकार विजय शाह पर क्या एक्शन लेती है?, देश के गर्व और गौरव की बात करने वाली बीजेपी सरकार सीमा पर दिन रात देश और नागरिकों की रक्षा में खड़ी रहने वाली राष्ट्र की बेटी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले अपने बोल वचन मंत्री के खिलाफ यदि अभियोजन की मंजूरी देती तो मंत्री विजय को ट्रायल कोर्ट में आपराधिक कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा।

नैतिकता के आधार पर मंत्री को अपने पद और मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना चाहिए, और यदि ऐसा होता है तो देश में ये पहली बार होगा जबकि किसी कैबिनेट मंत्री को अपने बोल वचन की वजह से दो बार मंत्री कुर्सी गंवानी पड़ी। होना भी क्यों नहीं चाहिए, विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का टैग लिए वाली बीजेपी पार्टी की सरकार यदि राष्ट्र गौरव की बात करती है तो उसकी अस्मिता पर अभद्र टिप्पणी करने वाले मंत्री के खिलाफ सुको में पेश होने वाली अनुपालन रिपोर्ट में अभियोजन को मंजूरी देकर देश की बेटियों को ये साफ संदेश दे सकती है कि बहन- बेटियों के मान सम्मान से बढ़कर कुछ भी नहीं है

आपको बता दें पिछले साल मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस ने शाह के खिलाफ मामला तो दर्ज कर लिया था, लेकिन पुलिस ने सरकार से अभियोजन की मंजूरी मांगी है, इसी को लेकर शाह का मामला पुलिस...सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच में फंसा है, इससे पहले पुलिस पर शाह को बचाने के आरोप भी लगे। सरकार को सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार से पहले पुलिस कोर्ट से फटकार खा चुकी है। क्योंकि उसने शुरुआत में एफआईआर में शाह के अपराध का जिक्र तक नहीं किया था, कोर्ट के आदेश पर पुलिस को अपराध का जिक्र करना पडा।

पूर्व CM ने पत्नी पर टिप्पणी करने के चलते सरकार से किया था बाहर

आपको बता दें पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी पर टिप्पणी करने के चलते विजय शाह को शिवराज ने अपनी सरकार से बाहर कर दिया था, हालांकि कुछ समय बाद उनकी फिर से वापसी हुई। इस वापसी की वजह विजय शाह का बड़ा आदिवासी चेहरा, आदिवासी समुदाय में अच्छी पैठ होना बताया जाता है। कुछ भी हो जब एक CM की पत्नी पर टिप्पणी करने के आरोप में मंत्रिमंडल से बाहर किया जा सकता है तो राष्ट्र की बेटी पर टिप्पणी करने वाले ऐसे बोल वचन वाले मंत्री पर अभी तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जबकि देश की सर्वोच्च अदालत भी राज्य सरकार की कड़े शब्दों में निंदा के साथ फटकार लगा चुकी है। सरकार आदिवासी वोट बैंक की वजह से मंत्री विजय पर बड़ा एक्शन लेने से कतरा रही है और भाजपा को आदिवासी वोट बैंक खोने का डर है।

आदिवासियों की बहुत बड़ी आबादी पर शाह की मजबूत पकड़

आपको बता दें मध्यप्रदेश में अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी मतदाताओं की संख्या करीब 22 फीसदी है, जो राज्य की एक बहुत बड़ी आबादी है। 230 विधानसभा सीट वाले मध्यप्रदेश में 84 सीटों पर इनका सीधा असर पड़ता है। 47 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। जबकि 37 अनारक्षित सामान्य सीटें ऐसी है, जहां एसटी वोटर्स अच्छी खासी तादाद में है जो निर्णायक भूमिका में होता है ,जहां यह वोट बैंक चुनावी हार -जीत तय करता है। प्रदेश की सत्ता की चाबी आदिवासी वोट बैंक और इन्हीं सीटों से होकर ही निकलती। आदिवासी समुदाय में विजय शाह की किंग वाली भूमिका है। जिसे सरकार नाराज नहीं करना चाहती , वरना आदिवासी मतदाता रूठ जाएंगे और आगामी चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

आदिवासियों के हाथ में सत्ता की चाबी

मध्यप्रदेश में आदिवासियों की संख्या अधिक होने से हमेशा से राज्य सत्ता की चाबी आदिवासियों के हाथ में रही है , जिस पार्टी ने इन सीटों पर अधिक जीत हासिल की, वहीं सत्ता की कुर्सी पर बैठी। 2023 के चुनाव में ST आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी ने 24 सीटें जीती जबकि कांग्रेस के खाते में 22 और एक अन्य को मिली बीजेपी को अधिक ST सीट मिली,उसकी सरकार बनी। इससे पहले 2018 में बीजेपी को 18 , कांग्रेस को 30 मिली , कांग्रेस की सरकार बनी। जबकि 2013, 2008 और 2003 में बीजेपी को क्रमश: 31, 29, 31 सीटें जबकि कांग्रेस को 15,17 ,15 आदिवासी आरक्षित सीटों पर जीत मिली, तीनों ही चुनावों में ST आरक्षित सीटों पर बीजेपी की बढ़त रही, बीजेपी की सरकार बनी।

मकड़ाई राजघराने से संबंध रखने वाले विजय शाह 8 बार से विधायक है, साल 2003 में उमा भारती सरकार में पहली बार कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। इसके बाद बाबूलाल गौर ,शिवराज सिंह चौहान और अब मोहन यादव की सरकार में भी वो मंत्री हैं। उनकी गिनती बीजेपी के वरिष्ठ आदिवासी नेताओं में होती है। साल 1998 से निरंतर हरसूद विधानसभा सीट का निर्वाचित होकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश में आदिवासी वोटर्स का इतना असर है कि पीएम मोदी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को अपने चुनावी प्रचार अभियान की शुरुआत आदिवासी इलाकों से करनी पड़ी थी। पीएम मोदी ने 15 नवंबर को बिरसा मुंडा जयंती बनाने की घोषणा की, हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम गोंड रानी के नाम पर कमलापति करना पड़ा। एसटी समुदाय के हित में सरकार की ओर से कई योजनाएं चल रही है।

शाह का बयान,HC का संज्ञान

आपको बता दें मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मंत्री विजय शाह की ओर से सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर टिप्पणी करने के केस में स्वत: संज्ञान लेते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। ये कोई पहला मौका नहीं था, जब विजय शाह अपने बोल वचन से विवादों में रहे, इससे पहले भी उन्होंने अपने सियासी सफर में कई बार ऐसे विवादित बयान दिए जिनकी सार्वजनिक आलोचनाएं हुई और वो सुर्खियों में रहे। एक बार तो उन्हें इस्तीफा देना तक पड़ गया था।

शाह के सियासी सफर में भद्दे बयानों की सूची

2013 में विजय शाह ने खंडवा में एक कार्यक्रम के दौरान तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान की पत्नी पर कमेंट्स किया था, उन्हें जनजातीय कार्य मंत्री से इस्तीफा देना पड़ा।

2013 बालिकाओं को टी -शर्ट बांटते समय विजय शाह ने कहा था, दो-दो दे दो, मुझे नहीं पता ये नीचे क्या पहनती हैं, उनके बयान की समाज से लेकर सियासी गलियारों में सार्वजनिक रूप से खूब निंदा हुई थी।

2018 में मंत्री शाह ने शिक्षक दिवस समारोह के दौरान मंच से ताली बजाने को लेकर एक बयान दिया जिस पर विवाद खड़ा हुआ था।

साल 2020 में वन मंत्री रहे विजय शाह ने बॉलीवुड अभिनेत्री विद्या बालन की फिल्म शेरनी की शूटिंग के दौरान क्री की गाड़ियों को जंगल में एंट्री नहीं होने दी। अभिनेत्री बालन की इतनी गलती थी, कि वो शाह के खाने पर नहीं गई थी।

2022 में शाह ने खंडवा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी की शादी को लेकर टिप्पणी की थी, जिस पर खूब राजनीति हुई।

आपको बता दें 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर की पहली बर्षगांठ पूरे देश में मनाई, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी मध्यप्रदेश सरकार ने सेना की महिला अधिकारी पर अभद्र टिप्पणी करने वाले मंत्री पर ना तो कोई एक्शन लिया ,ना ही एफआईआर के बाद पुलिस को अभियोजन की मंजूरी दी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट भी राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगा चुका है। अब जब कोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार से विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने में हो रही देरी पर जवाब मांगा है, शीर्ष कोर्ट ने अपनी पिछली सुनवाई में साफ कहा कि कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, जब एसआईटी ने सरकार से अभियोजन की मंजूरी मांगी है तो सरकार को तुरंत फैसला लेना चाहिए। अभी तक क्यों नहीं लिया। शीर्ष कोर्ट ने एसआईटी रिपोर्ट के आधार पर शाह के पुराने अभद्र, आपत्तिजनक, नफरत भरे, भद्दे, भड़काऊ और अपमानजनक बयानों की सूची देखकर कहा इन्हें इस तरह की कमेंट्स करने की विजय को आदत है। अब बर्दाश्त नहीं होगा, हमारे आदेश का पालन कीजिए।

Created On :   17 May 2026 2:30 PM IST

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