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मात्र 10 रुपये में आगंतुकों को यहां मिलती ठहरने और खाने की सुविधा

June 15th, 2018 13:21 IST

हाईलाइट

  • दैनिक जीवन में बुनियादी जरूरतों को पूरा करना अभी भी सबसे ज्यादा संघर्ष भरा है।
  • हैदराबाद में सेवा भारती ट्रस्ट न केवल वंचित और गरीबों को आश्रय प्रदान करता है बल्कि लोगों को एक दिन में दो बार भोजन भी प्रदान करता है।
  • भारती ट्रस्ट ने मात्र 10 रुपये की मामूली कीमत पर भोजन और आश्रय प्रदान करने के लिए एक अनूठी पहल शुरू की है।
  • इस पहल के तहत यह ट्रस्ट सरकारी अस्पताल के रोगी और उनके सहायकों को दोपहर का भोजन और रात्रिभोज भी प्रदान करता हैं। साथ ही साथ ठहरने की सुविधा भी देता है।
  • ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य निकटतम सरकारी अस्पताल में दूरदराज के स्थानों से आने वाले मरीजों और उनके परिवार के सदस्यों की सेवा करना है।

डिजिटल डेस्क, हैदाराबाद। दैनिक जीवन में बुनियादी जरूरतों को पूरा करना अभी भी सबसे ज्यादा संघर्ष से भरा है। ऐसे में हैदराबाद में सेवा भारती ट्रस्ट न केवल वंचित और गरीबों को आश्रय प्रदान करता है बल्कि लोगों को एक दिन में दो बार भोजन भी प्रदान करता है। दरअसल सेवा भारती ट्रस्ट ने मात्र 10 रुपये की मामूली कीमत पर भोजन और आश्रय प्रदान करने के लिए एक अनूठी पहल शुरू की है। इस पहल के तहत यह ट्रस्ट सरकारी अस्पताल के रोगी और उनके सहायकों को दोपहर का भोजन और रात्रिभोज भी प्रदान करता हैं। साथ ही साथ ठहरने की सुविधा भी देता है। ट्रस्ट का इसका मुख्य उद्देश्य निकटतम सरकारी अस्पताल में दूरदराज के स्थानों से आने वाले मरीजों और उनके परिवार के सदस्यों की सेवा करना है। 

सेवा भारती, नरसिम्हा मूर्ति के सचिव ने एएनआई को बताया, "यह ट्रस्ट 2013 में बनाया गया था। जब गांधी अस्पताल के पूर्व अधीक्षक ने मरीजों के आगंतुकों के लिए आश्रय बनाने के लिए अपने से पूछा था। फिर हमने इस आश्रय (शेल्टर shelter) को तीन महीने के भीतर बनाया, लेकिन पहले इस आश्रय में केवल 10 सदस्य रह सकते थे। अब, यहां हर दिन करीब 250 लोग और प्रति सप्ताह 7000 सदस्य यहां आते हैं। 

हम पेशेंट के साथ आने वाले अटेंडर का अस्पताल की गेटपास और उनके आईडी फ्रू के जरिए पहचान करने के बाद उन्हें यहां आश्रय और खाना देते हैं। जिसके लिए उनसे केवल 10 रुपये लिया जाता है। हम अब यहां रहने वाले लोगों को नाश्ता भी देना शुरू कर दिया हैं। 

उपचार के लिए अलग-अलग स्थानों से आने वाले कई लोगों के लिए यहां आश्रय लेते हैं। यहा आश्रय लेने वाले आगंतुकों ने पहल की सराहना की। आगंतुकों ने कहा, यहां भोजन में दाल और चावल बहुत अच्छी गुणवत्ता का मिलता है। 

आश्रय में एक आगंतुक विजया लक्ष्मी ने कहा, मैं रामोजी फिल्म सिटी से आ रहा हूं, जो यहां से बहुत दूर है। मैं पीठ दर्द से पीड़ित हूं और डॉक्टरों ने कहा कि मुझे आराम से लगातार दवा की जरूरत है। लेकिन मैं अपने बारे में चिंतित था आवास क्योंकि मैं अच्छे होटलों का जोखिम नहीं उठा सकता था। अब, मैं आश्रय में हूं और सिर्फ 10 रुपये का भुगतान कर रहा हूं। यह दो दिन हो गया है कि मैं यहां रहा हूं, और किसी भी समस्या का सामना नहीं किया। 

एक और आगंतुक ने कहा, "हम दोपहर का भोजन, रात का खाना और आश्रय ले रहे हैं और हम यहां भी स्नान कर सकते हैं। मेरे जैसे कई लोग हैं जो पूरे देश में लंबी दूरी से आते हैं और बाहरी खर्चों को नहीं उठा सकते हैं। लेकिन अब, हमें चिंता करने की जरूरत नहीं है ऐसी सभी चीजें जैसे कि हम सबकुछ सिर्फ 10 रुपये पर प्राप्त कर रहे हैं। 

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VIRDA RAM SAINI June 16th, 2018 03:38 IST

THIS MUST BE START NOT ONLY IN HYDRABAD IT MUST BE ALL INDIA INFRANT OF ALL GOVT.HOSPITAL BY TRUST&BHAMASHAH .THANKAS AND REGARDS

krishan gopal June 15th, 2018 16:38 IST

this must be started in each tahsil /taluka and distric /popular city and near by . if you start in Boisar and Palghar we would support . thanks and regards, we appreciates your efforts. krishan gopal

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साप्ताहिक राशिफल: कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक


मेष लग्नराशि (Aries):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह मेष राशि वालों को शुरुआत में सेहत सम्बन्धी दिक्क्त हो सकती है। कार्यस्थल पर कार्य का बोझ अधिक बना रह सकता है। व्यापारिक वर्ग के लोगो के लिए अधिक भागदौड़ बनी रह सकती है। छात्र वर्ग के लिए यह सप्ताह तरक्की देने वाला रहेगा। संतान सुख की प्राप्ति आपको मिल सकती है। मकान या जमीन सम्बंधित कार्यो में अवरोध का सामना करना पड़ सकता है। कार्यस्थल पर अधिकारी तथा सहकर्मियों के साथ बहस से बचे। सप्ताह का अंत धन लाभ दे सकता है।  

वृषभ लग्नराशि (Taurus):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह वृषभ राशि वालों को व्यर्थ के तनाव तथा वाद विवाद का सामना करना पड़ सकता है। सेहत के लिहाज से यह सप्ताह आपको तकलीफ देने वाला रहेगा। शारीरिक दर्द तथा सर दर्द की समस्या आपको परेशान कर सकती है। कार्यक्षेत्र में आपके अधिकारों तथा आपके प्रभाव में वृद्धि हो सकती है। प्रॉपर्टी से सम्बंधित किसी प्रकार का लाभ आपको मिल सकता है। छात्र वर्ग इस सप्ताह अपना समय व्यर्थ के कार्यो में नष्ट कर सकते है। पारिवारिक जीवन में आपकी कटु वाणी आपको हानि पंहुचा सकती है। व्यर्थ के खर्च आपको परेशान कर सकते है।

मिथुन लग्नराशि (Gemini) :➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह मिथुन राशि वालों को मिले जुले फल प्राप्त होंगे। इस सप्ताह संयम बनाकर काम करना आपके लिए लाभप्रद सिद्ध होगा। नौकरी वर्ग के लोगो को अधिक परिश्रम करना पड़ सकता है। पार्टनरशिप में किये जा रहे कार्यो में थोड़ी सतर्कता रखनी पड़ सकती है अन्यथा नुक्सान संभव है। जीवनसाथी के साथ वाद विवाद में न पड़े तथा उनकी सेहत का ध्यान रखे। छात्रों के लिए सप्ताह सामान्य बना रहेगा। सप्ताह का अंतिम भाग आपको तनाव दे सकता है। सेहत का विशेष ध्यान रखे आलस्य तथा धन का खर्च बढ़ सकता है अतः सचेत रहे।  

कर्क लग्नराशि (Cancer):➤  कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह कर्क राशि वालों की धन सम्बन्धी परेशानियां दूर हो सकती है। कार्यक्षेत्र में आपको थोडा अधिक परिश्रम करना पड़ सकता है। व्यापार में लाभ की उम्मीद में नुकसान उठाना पड सकता है, अतः सतर्क रहे। जीवनसाथी तथा व्यापारिक साझेदारो के साथ आपके वैचारिक मतभेद रह सकते है। स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानी हो सकती है। चोट चपेट का भय रहेगा। इस सप्ताह कोई उत्तम समाचार मिलने से आपकी प्रसनत्ता बढ़ सकती है। यात्राओं की अधिकता बनी रह सकती है। संतान सुख आपको प्राप्त होगा।   

सिंह लग्नराशि (Leo): ➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह सिंह राशि वालों को व्यापार के लिए किये जा रहे प्रयास पूर्ण होते नज़र आएंगे। कार्यस्थल पर स्थितियां आपके पक्ष में बनी रह सकती है। यात्राएं हो सकती है। धार्मिक कार्य में आपकी भागीदारी बढ़ सकती है। सप्ताह की शुरूआती भाग में छात्रों को आलस्य बना रह सकता है। संतान की सेहत आपको चिंतित कर सकती है। जीवनसाथी के प्रति प्रेमभाव बढ़ सकता है। सरकारी कार्यो में मिल रही रुकावटें दूर हो सकती है। स्वास्थ्य अच्छा बना रहेगा। मकान या जमीन से सम्बंधित कार्यो पर आपका धन व्यय हो सकता है।

कन्या लग्नराशि (Virgo):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह कन्या राशि वालों को स्वास्थ्य को लेकर हो रही तकलीफों में राहत मिल सकती है। आपको भाई-बहनो का सहयोग भरपूर प्राप्त होगा। अचानक धन प्राप्ति के योग बन सकते है। नौकरी तथा व्यापार की तलाश में भटक रहे जातको को अच्छे अवसर की प्राप्ति हो सकती है। अचानक से खर्चे में वृद्धि होने की संभावना बन सकती है। छोटी मोटी यात्राएं हो सकती है। माता की सेहत का ध्यान रखे। छात्रों को उनके कार्यो में अवरोध हो सकता है। जीवनसाथी के प्रति आपका प्रेम भाव बढ़ेगा।  

तुला लग्नराशि (Libra):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह तुला राशि वालों को धन लाभ की प्राप्ति के योग बन सकते है। आपकी इनकम के सोर्स में वृद्धि होने की संभावना है। आपकी आर्थिक स्तिथि को मजबूती मिल सकती है। सरकारी तथा राजनितिक क्षेत्रों से जुड़े जातको के लिए सप्ताह विशेष लाभ देने वाला साबित हो सकता है। किसी कार्य तथा किसी चीज को लेकर आप थोड़े परेशान बने रह सकते है। इस राशि से सम्बंधित कुछ जातको को पदलाभ तथा स्थानपरिवर्तन मिल सकता है। पारिवारिक जीवन सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आप कुछ व्यर्थ की उलझनों से घिरे रह सकते है।

वृश्चिक लग्नराशि (Scorpio):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह वृश्चिक राशि वालों को कार्यक्षेत्र तथा सामाजिक क्षेत्र में मान सम्मान की प्राप्ति होगी। कार्यक्षेत्र में प्रभाव में वृद्धि होगी। उच्च अधिकारी वर्ग के साथ आपके सम्बन्ध मधुर बने रहेंगे। इस राशि से सम्बंधित कुछ जातको को अपने कार्यक्षेत्र में अच्छे तथा लाभकारी अवसर मिल सकते है। छात्र वर्ग के लिए सप्ताह सामान्य बना रहेगा। सप्ताह का मध्य भाग आपको कुछ चिंतित कर सकता है। सेहत का ध्यान रखे। अपनी वाणी व्यवहार पर संयम बनाये रखे। अहंकार तथा क्रोध में वृद्धि हो सकती है अतः इससे बचे अन्यथा नुकसान मिल सकता है।

धनु लग्नराशि (Sagittarius):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह धनु राशि वालों को भाग्यवश अचानक कोई अच्छा लाभ मिल सकता है। सेहत से जुडी कोई समस्या बनी हुयी है तो उसमे सुधार मिलेगा। सरकारी तथा राजनितिक क्षेत्रों में किये जा रहे प्रयास में आपको सफलता मिल सकती है। किसी कार्य को लेकर मन में उथल पुथल बनी रह सकती है। पारिवारिक लोगो के साथ आपके मतभेद हो सकते है अतः सचेत रहे तथा अपनी वाणी पर संयम रखे। धार्मिक कार्यो में आपकी भागीदारी बढ़ सकती है। घर में कोई धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हो सकता है। सप्ताह का अंतिम भाग धन लाभ दे सकता है।    

मकर लग्नराशि (Capricorn):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह मकर राशि वालों को सप्ताह के शुरुआती दिनों में कुछ तकलीफ बनी रह सकती है। धन लाभ के योग इस सप्ताह बने रहेंगे। इस सप्ताह अपनी सेहत का ध्यान रखे। आपकी वाणी में कटुता बढ़ सकती है इसलिए अपनी वाणी पर संयम रखे। कोर्ट कचेहरी में चल रहे मामलों में आपको सफलता मिल सकती है। सरकारी रुके हुए कार्य पूर्ण हो सकते है। छात्र वर्ग को आलस्य से दूर रहने की सलाह दी जाती है। व्यर्थ की दौड़ भाग तथा खर्च संभव है।   

कुंभ लग्नराशि (Aquarius):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह कुंभ राशि वालों का आत्मविश्वास बहुत अच्छा बना रहेगा। धन लाभ को लेकर इस सप्ताह स्थितियां अच्छी बनी रह सकती है। आपका क्रोध तथा अहंकार आपकी छवि खराब कर सकता है अतः सतर्कता बनाये रखे। कार्यो को लेकर यात्रा अधिक हो सकती है तथा धन का व्यय भी अधिक हो सकता है। संतान तथा जीवनसाथी के साथ कुछ दिक्क़ते सामने आ सकती है। व्यापारिक वर्ग के जातको को अच्छे अवसर के योग बन रहे है। छात्र वर्ग को इस सप्ताह अधिक परिश्रम करना पड़ेगा तभी सफल होंगे। नकारात्मक विचारो से दूर बने रहने की सलाह है।

मीन लग्नराशि (Pisces):➤ कलाशांति ज्योतिष साप्ताहिक राशिफल 17 फरवरी से 23 फरवरी तक:- ॐ इस सप्ताह मीन राशि वालों को कार्यस्थल पर अधिक भाग दौड़ बनी रह सकती है। कार्यक्षेत्र में अधिकारी वर्ग के साथ बहसबाज़ी से बचे। लाभ को लेकर किये जा रहे प्रयासों में आपको अवरोध प्राप्त हो सकते है। शत्रु पक्ष के लोग आपकी छवि को धूमिल करने की कोशिश कर सकते है। यात्राओं में कष्ट मिल सकता है। इस सप्ताह धन का खर्च अधिक बना रह सकता है। छात्र वर्ग को सप्ताह के मध्य में कुछ परेशानी मिल सकती है। आपका पारिवारिक तथा वैवाहिक जीवन सामान्य बना रहेगा। कोई उपहार इस सप्ताह आपको मिल सकता है।  
 

कलाशान्ति ज्योतिष
Call: - +91-6261231618
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Live Darshan : श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन


डिजिटल डेस्क, उज्जैन। उज्जैन ही नहीं, भारत के प्रमुख देवस्थानों में श्री महाकालेश्वर का मन्दिर अपना विशेष स्थान रखता है। भगवान महाकाल काल के भी अधिष्ठाता देव रहे हैं। पुराणों के अनुसार वे भूतभावन मृत्युंजय हैं, सनातन देवाधिदेव हैं।

मंदिर के बारे में कुछ तथ्य:

मंदिर का इतिहास:-
उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है । उज्जयिनी भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही । यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही । इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। सांस्कृतिक राजधानी रही। यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही। इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।

...................आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।
...................भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

जहाँ महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान है । बताया जाता है, वही धरा का केन्द्र है -

...................नाभिदेशे महाकालोस्तन्नाम्ना तत्र वै हर: ।

बहुधा पुराणों में महाकाल की महिमा वर्णित है। भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकाल की भी प्रतिष्ठा हैं । सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन, उज्जैन मे महाकाल, डाकिनी में भीमशंकर, परली मे वैद्यनाथ, ओंकार में ममलेश्वर, सेतुबन्ध पर रामेश्वर, दारुकवन में नागेश, वाराणसी में विश्वनाथ, गोमती के तट पर ॥यम्बक, हिमालय पर केदार और शिवालय में घृष्णेश्वर। महाकाल में अंकितप्राचीन मुद्राएँ भी प्राप्तहोती हैं ।

उज्जयिनी में महाकाल की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है । शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई । महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काल या निराकार रुप में पूजा होती है। सकल अथवा साकार रुप में उनकी नगर में सवारी निकलती है।

महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिंग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठ है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ। महाकाल के इस ज्योतिर्लिंग की पूजा अनजाने काल से प्रचलित है और आज तक निरंतर है। पुराणों में महाकाल की महिमा की चर्चा बार-बार हुई है। शिवपुराण के अतिरिक्त स्कन्दपुराण के अवन्ती खण्ड में भगवान् महाकाल का भक्तिभाव से भव्य प्रभामण्डल प्रस्तुत हुआ है। जैन परम्परा में भी महाकाल का स्मरण विभिन्न सन्दर्भों में होता ही रहा है।

महाकवि कालिदास ने अपने रघुवंश और मेघदूत काव्य में महाकाल और उनके मन्दिर का आकर्षण और भव्य रुप प्रस्तुत करते हुए उनकी करते हुए उनकी सान्ध्य आरती उल्लेखनीय बताई। उस आरती की गरिमा को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी रेखांकित किया था।

...................महाकाल मन्दिरेर मध्ये
...................तखन, धीरमन्द्रे, सन्ध्यारति बाजे।

महाकवि कालिदास ने जिस भव्यता से महाकाल का प्रभामण्डल प्रस्तुत किया उससे समूचा परवर्ती बाड्मय इतना प्रभावित हुआ कि प्राय: समस्त महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने जब भी उज्जैन या मालवा को केन्द्र में रखकर कुछ भी रचा तो महाकाल का ललित स्मरणअवश्य किया।

चाहे बाण हो या पद्मगुप्त, राजशेखर हो अथवा श्री हर्ष, तुलसीदास हो अथवा रवीन्द्रनाथ। बाणभट्ट के प्रमाण से ज्ञात होता है कि महात्मा बुद्ध के समकालीन उज्जैन के राजा प्रद्योत के समय महाकाल का मन्दिर विद्यमान था। कालिदास के द्वारा मन्दिर का उल्लेख किया गया।

पंचतंत्र, कथासरित्सागर, बाणभट्ट से भी उस मन्दिर की पुष्टि होती है।

समय -समय पर उस मन्दिर का जीर्णोंद्धार होता रहा होगा। क्योंकि उस परिसर से ईसवीं पूर्व द्वितीय शताब्दी के भी अवशेष प्राप्त होते हैं।

दसवीं सदी के राजशेखर ग्यारहवी सदी के राजा भोज आदि ने न केवल महाकाल का सादर स्मरण किया, अपितु भोजदेव ने तो महाकाल मन्दिर को पंचदेवाय्रान से सम्पन्न भी कर दिया था। उनके वंशज नर वर्मा ने महाकाल की प्रशस्त प्रशस्ति वहीं शिला पर उत्कीर्ण करवाई थी। उसके ही परमार राजवंश की कालावधि में 1235 ई में इल्तुतमिश ने महाकाल के दर्शन किये थे।

मध्ययुग में महाकाल की भिन्न-भिन्न ग्रंथों में बार-बार चर्चा हुई।

18वीं सदी के पूर्वार्द्ध मेेराणोजी सिन्धिया के मंत्री रामचन्द्रराव शेणवे ने वर्तमन महाकाल का भव्य मंदिर पुननिर्मित करवाया। अब भी उसके परिसर का यथोचित पुननिर्माण होता रहता है।

महाकालेश्वर का विश्व-विख्यात मन्दिर पुराण-प्रसिद्ध रुद्र सागर के पश्चिम में स्थित रहा है।

महाशक्ति हरसिद्धि माता का मन्दिर इस सागर के पूर्व में स्थित रहा है, आज भी है।

इस संदर्भ में महाकालेश्वर मन्दिर के परिसर में अवस्थित कोटि तीर्थ की महत्ता जान लेना उचित होगा। कोटि तीर्थ भारत के अनेक पवित्र प्राचीन स्थलों पर विद्यमान रहा है।

सदियों से पुण्य-सलिला शिप्रा, पवित्र रुद्र सागर एवं पावन कोटि तीर्थ के जल से भूतभावन भगवान् महाकालेश्वर के विशाल ज्योतिर्लिंग का अभिषेक होता रहा है। पौराणिक मान्यता है कि अवन्तिका में महाकाल रूप में विचरण करते समय यह तीर्थ भगवान् की कोटि पाँव के अंगूठे से प्रकट हुआ था।

उज्जयिनी का महाकालेश्वर मन्दिर सर्वप्रथम कब निर्मित हुआ था, यह कहना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन हैं। पुराणों में संदर्भ आये हैं कि इसकी स्थापना प्रजापिता ब्रह्माजी के द्वारा हुई थी। हमें संदर्भ प्राप्त होते हैं कि ई.पू. छठी सदी में उज्जैन के एक वीर शासक चण्डप्रद्योत ने महाकालेश्वर परिसर की व्यवस्था के लिये अपने पुत्र कुमारसेन को नियुक्त किया था। उज्जयिनी के चौथी - तीसरीसदी ई.पू. क़े कतिपय आहत सिक्कों पर महाकाल की प्रतिमा का अंकन हुआ है। अनेक प्राचीन काव्य-ग्रंथों में महाकालेश्वर मन्दिर का उल्लेख आया है।

राजपूत युग से पूर्व उज्जयिनी में जो महाकाल मन्दिर विद्यमान था, उस विषयक जो संदर्भ यत्र-तत्र मिलते हैं, उनके अनुसार मन्दिर बड़ा विशाल एवं दर्शनीय था। उसकी नींव व निम्न भाग प्रस्तर निर्मित थे। प्रारंभिक मन्दिर काष्ट-स्तंभों पर आधारित था। गुप्त काल के पूर्व मन्दिरों पर कोई शिखर नहीं होते थे, अत: छत सपाट होती रही। संभवत: इसी कारण रघुवंश में महाकवि कालिदास ने इसे निकेतन का संज्ञा दी है।

इसी निकेतन से नातिदूर राजमहल था। पूर्व मेघ में आये उज्जयिनी के कितना विवरण से भी त्कालीन महाकालेश्वर मन्दिर का मनोहारी विवरण प्राप्त होता है। ऐसा लगता है कि महाकाल चण्डीश्वर का यह मन्दिर तत्कालीन कलाबोध का अद्भुत उदाहरण रहा होगा। एक नगर, के शीर्ष उस नगर को बनाते हों, उसके प्रमुख आराध्य का मन्दिर जिसकी वैभवशाली रहा होगा,इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। मन्दिर कंगूरेनुमा प्राकार व विशाल द्वारों से युक्त रहा होगा। संध्या काल में वहाँ दीप झिलमिलाते थे। विविध वाद्ययंत्रों की ध्वनि से मन्दिर परिसर गूंजता रहता था। सांध्य आरती का दृश्य अत्यंत मनोरम होता था। अलंकृत नर्तकियों से नर्तन ये उपजी नूपुर-ध्वनि सारे वातावरण का सौन्दर्य एवं कलाबोध से भर देती थी। निकटवर्ती गंधवती नदी में स्नान करती हुई ललनाओं के अंगरागों की सुरभि से महाकाल उद्यान सुरभित रहता था। मन्दिर प्रांगण में भक्तों की भीड़ महाकाल की जयकार करती थी। पुजारियों के दल पूजा - उपासना में व्यस्त रहा करते थे। कर्णप्रिय वेद-मंत्र एवं स्तुतियों से वातावरण गुंजित रहता था। चित्रित एवं आकर्षक प्रतिमाएँ इस सार्वभौम नगरी के कलात्मक वैभव को सहज ही प्रकट कर देती थीं।

गुप्त काल के उपरांत अनेक राजवंशों ने उज्जयिनी की धरती का स्पर्श किया। इन राजनीतिक शक्तियों में उत्तर गुप्त, कलचुरि, पुष्यभूति, गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सबने भगवान् महाकाल के सम्मुख अपना शीश झुकाया और यहाँ प्रभूत दान-दक्षिणा प्रदान की। पुराण साक्षी है कि इस काल में अवन्तिका नगर में अनेक देवी-देवताओं के मन्दिर, तीर्थस्थल, कुण्ड, वापी, उद्यान आदि निर्मित हुए। चौरासी महादेवों के मन्दिर सहित यहाँ शिव के ही असंख्य मन्दिर रहे।

जहाँ उज्जैन का चप्पा-चप्पा देव - मन्दिरों एवं उनकी प्रतिमाओं से युक्त रहा था, तो क्षेत्राधिपति महाकालेश्वर के मन्दिर और उससे जुड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिवेश के उन्नयन की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इस काल में रचित अनेक काव्य-ग्रंथों में महाकालेश्वर मन्दिर का बड़ा रोचक व गरिमामय उल्लेख आया है। इनमें बाणभट्ट के हर्षचरित व कादम्बरी, श्री हर्ष का नैपधीयचरित, पुगुप्त का नवसाहसांकचरित मुख्य हैं।परमार काल में निर्मित महाकालेश्वर का यह मन्दिर शताब्दियों तक निर्मित होता रहा था। परमारों की मन्दिर वास्तुकला भूमिज शैली की होती थी। इस काल के मन्दिर के जो भी अवशेष मन्दिर परिसर एवं निकट क्षेत्रों में उपलब्ध हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह मन्दिर निश्चित ही भूमिज शैली में निर्मित था। इस शैली में निर्मित मन्दिर त्रिरथ या पंचरथ प्रकार के होते थे। शिखर कोणों से ऊरुशृंग आमलक तक पहुँचते थे। मुख्य भाग पर चारों ओर हारावली होती थी। यह शिखर शुकनासा एवं चैत्य युक्त होते थे जिनमें अत्याकर्षक प्रतिमाएँ खचित रहती थीं। क्षैतिज आधार पर प्रवेश द्वार, अर्ध मण्डप, मण्डप, अंतराल, गर्भगृह एवं प्रदक्षिणा-पथ होते थे। ये अवयव अलंकृत एवं मजबूत स्तम्भों पर अवस्थित रहते थे। विभिन्न देवी -देवताओं, नवगृह, अप्सराओं, नर्तकियों, अनुचरों, कीचकों आदि की प्रतिमाएँ सारे परिदृश्य को आकर्षक बना देती थीं। इस मन्दिर का मूर्ति शिल्प विविधापूर्ण था। शिव की नटराज, कल्याणसुन्दर, रावणनुग्रह, उमा-महेश्वर, त्रिपुरान्तक, अर्धनारीश्वर, गजान्तक, सदाशिव, अंधकासुर वध, लकुलीश आदि प्रतिमाओं के साथ-साथ गणेश, पार्वती, ब्रह्मा, विष्णु, नवग्रह, सूर्य, सप्त-मातृकाओं की मूर्तियाँ यहाँ खचित की गइ थीं।

नयचन्द्र कृत हम्मीर महाकाव्य से ज्ञात होता है कि रणथम्बौर के शासक हम्मीर ने महाकाल की पूजा-अर्चना की थी।

उज्जैन में मराठा राज्य अठारहवीं सदी के चौथे दशक में स्थापित हो गया था। पेशवा बाजीराव प्रथम ने उज्जैन का प्रशासन अपने विश्वस्त सरदार राणोजी शिन्दे को सौंपा था। राणोजी के दीवान थे सुखटनकर रामचन्द्र बाबा शेणवी। वे अपार सम्पत्ति के स्वामी तो थे किन्तु नि:संतान थे। कई पंडितों एवं हितचिन्तकों के सुझाव पर उन्होंने अपनी सम्पत्ति को धार्मिक कार्यों में लगाने का संकल्प लिया। इसी सिलसिले में उन्होंने उज्जैन में महाकाल मन्दिर का पुनर्निर्माण अठारहवीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक में करवाया।

मंदिर के बारे में:-

महान धार्मिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा राजनैतिक नगरी उज्जयिनी जो विश्व के मानचित्र पर २३-११ उत्तर अक्षांश तथा ७५-४३ पूर्व रखांश पर उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी के पूर्वी तट पर भूमध्यरेखा और कर्क रेखा के मिलन स्थल पर, हरिशचन्द्र की मोक्षभूमि, सप्तर्षियों की र्वाणस्थली, महर्षि सान्दीपनि की तपोभूमि, श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली, भर्तृहरि की योगस्थली, सम्वत प्रवर्त्तक सम्राट विक्रम की साम्राज्य धानी, महाकवि कालिदास की प्रिय नगरी, विश्वप्रसिद्ध दैवज्ञ वराह मिहिर की जन्मभूमि, जो अवन्तिका अमरावती उज्जयिनी कुशस्थली, कनकश्रृंगा, विशाला, पद्मावती, उज्जयिनी आदि नामों से समय-समय पर प्रसिद्धि पाती रही, जिसका अनेक पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में विषद वर्णन भरा पड़ा है, ऐसे पवित्रतम सप्तपुरियों में श्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र में स्वयंभू महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में मणिपुर चक्र नाभीस्थल सिद्धभूमि उज्जयिनी में विराजित हैं।

आज जो महाकालेश्वर का विश्व-प्रसिद्ध मन्दिर विद्यमान है, यह राणोजी शिन्दे शासन की देन है। यह तीन खण्डों में विभक्त है। निचले खण्ड में महाकालेश्वर बीच के खण्ड में ओंकारेश्वर तथा सर्वोच्च खण्ड में नागचन्द्रेश्वर के शिवलिंग प्रतिष्ठ हैं। नागचन्द्रेश्वर के दर्शन केवल नागपंचमी को ही होते हैं। मन्दिर के परिसर में जो विशाल कुण्ड है, वही पावन कोटि तीर्थ है। कोटि तीर्थ सर्वतोभद्र शैली में निर्मित है। इसके तीनों ओर लघु शैव मन्दिर निर्मित हैं। कुण्ड सोपानों से जुड़े मार्ग पर अनेक दर्शनीय परमारकालीन प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं जो उस समय निर्मित मन्दिर के कलात्मक वैभव का परिचय कराती है। कुण्ड के पूर्व में जो विशाल बरामदा है, वहाँ से महाकालेश्वर के गर्भगृह में प्रवेश किया जाता है। इसी बरामदे के उत्तरी छोर पर भगवान्‌ राम एवं देवी अवन्तिका की आकर्षक प्रतिमाएँ पूज्य हैं। मन्दिर परिसर में दक्षिण की ओर अनेक छोटे-मोटे शिव मन्दिर हैं जो शिन्दे काल की देन हैं। इन मन्दिरों में वृद्ध महाकालेश्वर अनादिकल्पेश्वर एवं सप्तर्षि मन्दिर प्रमुखता रखते हैं। ये मन्दिर भी बड़े भव्य एवं आकर्षक हैं। महाकालेश्वर का लिंग पर्याप्त विशाल है।

कलात्मक एवं नागवेष्टित रजत जलाधारी एवं गर्भगृह की छत का यंत्रयुक्त तांत्रिक रजत आवरण अत्यंत आकर्षक है। गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त गणेश, कार्तिकेय एवं पार्वती की आकर्षक प्रतिमाएँ प्रतिष्ठ हैं। दीवारों पर चारों ओर शिव की मनोहारी स्तुतियाँ अंकित हैं। नंदादीप सदैव प्रज्ज्वलित रहता है। दर्शनार्थी जिस मार्ग से लौटते हैं, उसके सुरम्य विशाल कक्ष में एक धातु-पत्र वेष्टित पाषाण नंदी अतीव आकर्षक एवं भगवान्‌ के लिंग के सम्मुख प्रणम्य मुद्रा में विराजमान है। महाकाल मन्दिर का विशाल प्रांगण मन्दिर परिसर की विशालता एवं शोभा में पर्याप्त वृद्धि करता है।भगवान्‌ महाकालेश्वर मन्दिर के सबसे नीचे के भाग में प्रतिष्ठ है। मध्य का भाग में ओंकारेश्वर का शिवलिंग है। उसके सम्मुख स्तंभयुक्त बरामदे में से होकर गर्भगृह में प्रवेश किया जाता हैं। सबसे ऊपर के भाग पर बरामदे से ठीक ऊपर एक खुला प्रक्षेपण है जो मन्दिर की शोभा में आशातीत वृद्धि करता हैं। महाकाल का यह मन्दिर, भूमिज चालुक्य एवं मराठा शैलियों का अद्भुत समन्वय है। ऊरुश्रृंग युक्त शिखर अत्यंत भव्य है। विगत दिनों इसका ऊर्ध्व भाग स्वर्ण-पत्र मण्डित कर दिया गया है।ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर दक्षिणामूर्ति हैं। तंत्र की दृष्टि से उनका विशिष्ट महत्त्व है। प्रतिवर्ष लाखों तीर्थ यात्री उनके दर्शन कर स्वयं को कृतकृत्य मानते हैं। जैसाकि देखा जा चुका है महाकालेश्वर का वर्तमान मन्दिर अठारहवीं सदी के चतुर्थ दशक में निर्मित करवाया गया था। इसी समय तत्कालीन अन्य मराठा श्रीमंतों एवं सामन्तों ने मन्दिर परिसर में अनािद कल्पेश्वर, वृद्ध महाकालेश्वर आदि मन्दिरों व बरामदानुमा धर्मशाला का निर्माण भी करवाया था। मराठा काल में अनेक प्राचीनपरम्पराओं को नवजीवन मिला। पूजा-अर्चना, अभिषेक, आरती, श्रावण मास की सवारी,हरिहर-मिलन आदि को नियमितता मिली। ये परम्पराएँ आज भी उत्साह व श्रद्धापूर्वक जारी हैं। भस्मार्ती, महाशिवरात्रि, सोमवती अमावस्या, पंचक्रोशी यात्रा आदि अवसरों पर मन्दिर की छवि दर्शनीय होती है। कुंभ के अवसरों पर मन्दिर की विशिष्ट मरम्मत की जाती रही है। सन्‌ १९८० के सिंहस्थ पर्व के समय तो दर्शनार्थियों की सुविधा के निमित्त एकपृथक्‌ मण्डप का निर्माण भी करवाया गया था। १९९२ ई. के सिंहस्थ पर्व के अवसर पर भीम.प्र. शासन एवं उज्जैन विकास प्राधिकरण मन्दिर परिसर के जीर्णोद्धार, नवनिर्माण एवंदर्शनार्थियों के लिये विश्राम सुविधा जुटाने के लिये दृढ़तापूर्वक संकल्पित हुए थे। सन्‌ २००४ के सिंहस्थ के लिये भी इसी प्रकार की प्रक्रिया दिखाई दे रही है।महाकालेश्वर मन्दिर परिसर में अनेक छोटे-बड़े शिवालय, हनुमान, गणेश, रामदरबार, साक्षी गोपाल, नवग्रह, एकादश रुद्र एवं वृहस्पतिश्वर आदि की प्रतिमाएँ हैं। उनमें प्रमुख स्थान इस प्रकार है - मंदिर के पश्चिम में कोटितीर्थ ;जलाशयद्ध है जिसका अवन्तिखंड में विशेष वर्णन है। कोटि तीर्थ के चारों और अनेक छोटे-छोटे मन्दिर और शिव पिंडियाँ हैं। पूर्व में कोटेश्वर-रामेश्वर का स्थान है। पास ही विशाल कक्ष हैं, जहाँ अभिषेक पूजन आदिधार्मिक विधि करने वाले पण्डितगण अपने-अपने स्थान तख्त पर बैठते हैं। यहीं उत्तर में राम मंदिर और अवन्तिकादेवी की प्रतिमा है। दक्षिण में गर्भग्रह जाने वाले द्वार के निकट गणपति और वीरभद्र की प्रतिमा है। अन्दर गुफा में ;गर्भ ग्रह मद्ध स्वयंभू ज्योतिर्लिंग, महाकालेश्वर, शिवपंचायतन ;गणपति, देवी और स्कंदद्ध सहित विराजमान हैं। गर्भग्रह के समाने दक्षिण के विशाल कक्ष में नन्दीगण विराजमान हैं। शिखर के प्रथम तल पर ओंकारेश्वर स्थित है। शिखर के तीसरे तल पर भगवान शंकर-पार्वती नाग के आसन और उनके फनों की छाया में बैठी हुई सुन्दर और दुर्लभ प्रतिमा है। इसके दर्शन वर्ष में एक बार श्रावण शुक्ल पंचमी ;नागपंचमीद्ध के दिन होते हैं,यहीं एक शिवलिंग भी है। उज्जयिनी में स्कन्द पुराणान्तर्गत अवन्तिखंड में वर्णित ८४ लिंगों में से ४ शिवालय इसी प्रांगण में है। ८४ में ५वें अनादि कल्पेश्वर, ७वें त्रिविष्टपेश्वर, ७२वें चन्द्रादित्येश्वर और ८०वें स्वप्नेश्वर के मंदिर में हैं। दक्षिण-पश्चिम प्रांगण में वृद्धकालेश्वर ;जूना महाकालद्ध का विशाल मंदिर है। यहीं सप्तऋषियों के मंदिर, शिवलिंग रूप में है। नीलकंठेश्वर और गौमतेश्वर के मंदिर भी यहीं है। पुराणोक्त षड्विनायकों में से एक गणेश मंदिर उत्तरी सीमा पर है।


श्री महाकालेश्वर मंदिर के दैनिक पूजा समय सूची:-

चैत्र से आश्विन तककार्तिक से फाल्गुन तक
भस्मार्ती प्रात: 4 बजेभस्मार्ती प्रात: 4 बजे
प्रात: आरती 7 से 7-30 तकप्रात: आरती 7-30 से 8 तक
महाभोग प्रात: 10 से 10-30 तकमहाभोग प्रात: 10-30 से 11 तक
संध्या आरती 5 से 5-30 तकसंध्या आरती 5-30 से 6 तक
आरती श्री महाकालेश्वर संध्या: 7 से 7-30 तकआरती श्री महाकालेश्वर संध्या: 7-30 से 8 तक
शयन आरती रात्रि 11:00 बजेशयन आरती रात्रि 11:00 बजे


मंदिर के त्योहारों की जानकारी:

पूजा - अर्चना, abhishekaarati और अन्य अनुष्ठानों regulalrly  सभी वर्ष दौर का प्रदर्शन Mahakala मंदिर में कुछ विशेष पहलुओं के रूप में के तहत कर रहे हैं 

  1. नित्य यात्रा: यात्रा के लिए आयोजित किया जाएगा सुनाई है अवंती में के Khanda Skanada पुराण.इस यात्रा में,में स्नान ने के बाद पवित्र शिप्रा,(भागी) क्रमशः यात्री यात्राओं Nagachandresvara Kotesvara, Mahakalesvara, देवी Avanatika, goddess Harasiddhi और darshana लिए Agastyesvara.
  2. Sawari(जुलूस): Sravana महीने के हर सोमवार को अमावस्या तक अंधेरे पखवाड़े में भाद्रपद की और भी उज्ज्वल से Kartika के अंधेरे पखवाड़े पखवाड़े Magasirsha की,भगवान की बारात Mahakala के माध्यम से गुजरता है उज्जैन की सड़कों पर.पिछले Bhadrapadais में Sawari महान के साथ मनाया धूमधाम और दिखाने के और ड्रॉ लाख की उपस्थिति लोगों की. जुलूस Vijaydasami त्योहार पर Mahakala आने की समारोह at Dashahara मैदान है भी बहुत आकर्षक है.
  3. हरिहर Milana: चतुर्दशी पर Baikuntha, Mahakala प्रभु का दौरा एक बारात में मंदिर ध्य रात्रि के दौरान भगवान (दिन) से मिलने बाद में एक समान स पर बहुत बारात Dwarakadhisa रात महाकाल मंदिर का दौरा किया.यह त्यौहार के बीच सत्ता के प्रतीक दो महान लॉर्ड्स.

श्री महाकालेश्वर मंदिर की अन्य जानकारी:-

मंदिर का अन्नक्षेत्र -

अन्नक्षैत्र में मन्दिर में आने वाले दर्शनार्थियों को कूपन के आधार पर भोजन प्रसादी की व्यवस्था की गयी है। 2 आटोमैटिक चपाती मशीन भी यहां स्थापित की गयी है। प्रतिदिन 11 बजे से रात्रि 9 बजे के मध्य लगभग एक हजार से अधिक दर्शनार्थियों द्वारा भोजन प्रसादी का लाभ लिया जाता है। समिति द्वारा मन्दिर परिसर में दर्शनार्थियों को निःशुल्क कूपन दिये जाने हेतु काउन्टर संचालित किया जाता है। जिससे वह कूपन प्राप्त कर अन्नक्षैत्र जाकर भोजन प्रसादी का लाभ प्राप्त करते है। अन्नक्षैत्र की धनराशि की व्यवस्था हेतु मन्दिर समिति द्वारा दो दान काउन्टर भी संचालित किये जाते है जो एक मन्दिर परिसर में स्थित तथा दूसरा अन्नक्षैत्र में स्थित है। उक्त दान काउन्टरों पर रसीद के माध्यम से दान प्राप्त किया जाता है। तथा अन्नक्षैत्र में सीधे खाद्य सामग्री भी दान स्वरूप प्राप्त होती दर्शनार्थी अपनी इच्छानुसार जन्मदिवस विवाह वर्षगांठ या अपने पूर्वजों की स्मृति एवं पुण्यतिथि आदि के अवसर पर 25,000 रूपये एक दिन के भोजन का शुल्क या भोजन सामग्री का भेटस्वरूप देने पर दान करने वाले भेंटकर्ता का नाम अन्नक्षैत्र के बोर्ड पर लिखा जाता है।

श्री महाकालेश्वर मंदिर भस्म आरती बुकिंग - प्रक्रिया का विवरण 

श्री महाकालेश्वरमंदिर के ऑनलाइन पेार्टल से भस्म आरती दर्शन बुकिंग / अनुमति व्यवस्था का कम्प्युटराईजेशन श्रद्धालुओं की सुविधा एवं प्रक्रिया के सरलीकरण हेतु किया गया है, नवीन प्रक्रिया निम्नानुसार रहेगी:

  1. यह व्यवस्था अब श्रद्धालुओं के लिये ऑनलाइन उपलब्ध रहेगी तथा स्थानीय श्रद्धालुओं के लिये ऑनलाइन के साथ ऑफलाईन आवेदन कि सुविधा भी उपलब्ध रहेगी।
  2. जो श्रद्धालु कम्प्युटर का उपयोग नहीं जानते हैं, वह भी ऑफलाईन सुविधा के माध्यम से दर्शन की अनुमति प्राप्त करेंगे। ऑफलाइन आवेदन का समय प्रातः 10.00 से शाम 3.00 रहेगा ।
  3. नंदी हाल एवं बेरिकेट्स से दर्शन की अनुमति के लिये वर्तमान में क्रमशः 100 एवं 500 दर्शनार्थियों की संख्या निर्धारित की गई है।
  4. ऑनलाइन एवं ऑफलाइन में दर्शनार्थियों की अनुमति नंदी हाल एवं बेरिकेट्स से दर्शन हेतु संख्या पूर्व निर्धारित की जा सकेगी। यह संख्या आने वाले पर्वों के समय सुविधा अनुसार परिवर्तित भी की जा सकेगी।
  5. ऑनलाइन पर यह सुविधा दर्शन दिनांक से 15 दिन पूर्व से बुक की जा सकेगी यह सुविधा समय अनुसार परिवर्तित भी की जा सकेगी। साथ ही श्रद्धालुओं की आने वाली संख्या को दृष्टिगत रखते हुए ऑनलाइन बुकिंग कि दिनांको को लॉक भी किया जा सकेगा जिससे उन दिनांको के लिए ऑनलाइन बुकिंग नही होगी जैसे शिवरात्री, नागपंचमी, शाही सवारी का दिन आदि।
  6. देश के किसी भी कोने से इंटरनेट के माध्यम से श्रद्धालु इस सुविधा का लाभ ले सकेंगे। इसके लिये श्रद्धालुओं को ऑनलाइन आवेदन भरना होगा, जिसमें उसे फोटोग्राफ एवं आई.डी. प्रुफ भी समस्त श्रद्धालुओं के लिये डालना अनिवार्य होगा। यदि समस्त श्रद्धालुओं के फोटोग्राफ नही होने पर, समस्त श्रद्धालुओं के फोटोग्राफ के स्थान पर आवेदक के फोटोग्राफ डालना अनिवार्य होगा। अनुमति संख्या अनुसार यदि उपलब्धता होगी तो तत्काल उसे अनुमति प्राप्त हो जायेगी और रजिस्ट्रेशन नम्बर का SMS भी प्राप्त हो जायेगा। वेबासाइट से वह अपना अनुमति पत्र का प्रिन्ट भी निकाल सकेगा, जिसे प्रवेश के समय लाना आवश्यक होगा।
  7. यदि किसी कारण से श्रद्धालुगण नहीं आ पा रहे है तो उन्हें इंटरनेट के माध्यम से अपनी अनुमति निरस्त कराना होगीं।
  8. ऑफलाइन अनुमति के लिये मंदिर परिसर में भस्म आरती काउन्टर बनाया जा रहा है, जहां पर तीन कम्प्यूटर सेट स्थापित किये गये हैं। सभी कम्प्यूटरो पर श्रद्धालुओं के फोटो के लिये बेब केम की सुविधा है। श्रद्धालुओं को अपने आई.डी. की फोटाकापी नहीं लगानी होगी। उसका आई.डी. वहीं बेब केम के माध्यम से स्केन कर स्टोर कर लिया जायेगा तथा उसे एक रसीद जिस पर आवेदित श्रद्धालुओं के फोटो, आई.डी. एवं बार कोड प्रिन्ट होगा, का प्रिन्ट आउट दिया जायेगा, यही प्रिन्ट आउट अनुमति मिलने कि दशा में अनुमति पत्र का कार्य करेगा, इस व्यवस्था से श्रद्धालुओं को इस प्रक्रिया के लिए एक ही बार में कार्य पूर्ण हो जावेगा।
  9. ऑफलाइन से प्राप्त कुल आवेदनो की सूची, जिस पर श्रद्धालुओं के नाम, फोटो, आई.डी. प्रिन्ट होगा, प्रशासक, श्री महाकालेश्वरमंदिर के पास अनुमति हेतु भेजी जायेगी। प्रशासक द्वारा श्रद्धालुओं की संख्या और निर्धारित संख्या को देखते हुए सूची पर अनुमति प्रदान की जायेगी, जिसे कम्पयूटर में इन्द्राज करते ही श्रद्धालुओं के पास अनुमति के SMS प्राप्त हो जायेंगे, जिसमें अनुमति दिनांक, स्थान एवं रजिस्ट्रेशन नम्बर का उल्लेख होगा। श्रद्धालु सांय को लगने वाली सूची से भी अपनी अनुमति के संबंध में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे, या मंदिर की वेब साईट पर भी देख सकेंगे। श्रद्धालुओं को प्राप्त रसीद या SMS प्रातः प्रवेश के समय लाना आवष्यक होगा।
  10. मंदिर परिसर में नंदी हाल एवं बेरिकेट्स में जाने के लिये अलग-अलग प्रवेश द्वारों पर कम्प्यूटर लगाये गये हैं, जिसमें बार कोड स्केनर भी लगा है! श्रद्धालुओं को अपना प्रिन्ट आउट या SMS प्रवेश द्वार पर दिखाना होगा, जिसकी बार कोड स्केनर या सीधे एन्ट्री करने से स्क्रीन पर श्रद्धालुओं का फोटो एवं आई.डी. प्रदर्शित होगी। जिसे अनुमति प्राप्त नहीं हुइ्र्र है, उसके लिये स्क्रीन पर लाल पट्टी आयेगी एवं कम्प्यूटर के माध्यम से यह संदेश सुनाई देगा कि इन्हें अनुमति प्राप्त नहीं हुई है। तद्नुसार श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश दिया जायेगा। प्रवेश के समय नंदी हाल के श्रद्धालुओं को एक टोकन प्रदान किया जाएगा जिसे दिखा कर ही श्रद्धालु हरी ओम को जल चढ़ाने के पश्चात् नंदी हाल में उपस्थित रह सकेगें । यदि एक रजिस्ट्रेशन नम्बर पर किसी श्रद्धालु द्वारा प्रवेश प्राप्त कर लिया गया है तो पुनः उसी रजिस्ट्रेशन नम्बर दूसरे श्रद्धालु को प्रवेश प्राप्त नहीं होगा। यह सुविधा जालसाजी को रोकने के लिये की गई है। 

श्री महाकालेश्वर मंदिर भस्म आरती बुकिंग - वेबपोर्टल से कैसे होगी 

आवेदन पत्र का भरनाः- श्रद्धालु को सर्वप्रथम श्री महाकालेश्वर की वेब साईट www.mahakaleshwar.org.in या www.mahakaleshwar.nic.in पर इंटरनेट के माध्यम से जाना होगा। वेब साईट पर Bhasm Arti बटन पर क्लिक करने से केलेण्डर पेज आवेगा जिसमें निर्धारित दिनांक जिसके लिए भस्मआारती की बुकिंग की जा सकती है बुकिंग वाली दिनांक हरे रंग से दिखेगी और बाकी दिनांक कटी होगी जिसके लिए बुकिंग नहीं की जा सकेगी। श्रद्धालु मंदिर समिति द्वारा निर्धारित संख्या के अनुसार बुकिंग प्रथम आओ-प्रथम पाओ के आधार पर कर सकेंगें। 


महाकालेश्वर पर्व पंचांग -

क्रमांकमाहपखवाड़ातिथिविवरण
चैत्रअंधेरापंचमरंग पंचमी, फाग और ध्वज-पूजन
चैत्रउज्ज्वलप्रथमनई संवत्सर उत्सव और पंचांग - पूजन
वैसाखअंधेराप्रथमलगातार दो महीने के लिए जलधारा
वैसाखउज्ज्वलतिहाई (अक्षय - त्रतिया)जल-मटकी फल-दान
जैष्ठअंधेरानक्षत्रग्यारह दिनों के लिए पर्जन्य अनुष्ठान
असाडउज्ज्वलगुरु पूर्णिमामहीने के आगमन पर विशेष श्रींगार. चातुर्मास शुरू होता है
श्रावणअंधेराहर सोमवारसवारी
श्रावणअंधेराअमावस्यादीप-पूजन
श्रावणउज्ज्वलनाग-पंचमीनाग चंद्रेश्वर के दरसन
१०श्रावणउज्ज्वलपूर्णिमा (पूर्ण - चंद्रमा दिन)पर्व रक्षा सूत्र भोग, और श्रृंगार
११भाद्रपदअंधेराप्रत्येक सोमवार से अमावस्या तकसवारी
१२भाद्रपदअंधेराअष्टमीजन्मस्तामी समारोह शाम आरती होने के बाद
१३अस्वनीअंधेराएकादसीउमा - सांझी त्योहार शुरू होता है
१४अस्वनीउज्ज्वलदूसरा (द्वितीय)उमा - सांझी त्योहार के अंतिम दिन
१५अस्वनीउज्ज्वलदशमीविजयादशमी पर्व, सामी पूजन और सवारी
१६अस्वनीउज्ज्वलपूर्णिमा के दिनशरदोत्सव और क्षीरा का वितरण आधी रात को
१७कार्तिकअंधेरा14 वें दिन (चतुर्दसी)अन्नकूट
१८कार्तिकअंधेराअमावस्यादीपक के प्रकाश दीपावली त्यौहार पर
१९कार्तिकउज्ज्वलहर सोमवारसवारी (बारात)
२०कार्तिकउज्ज्वलबैकुंठ चतुर्दसीहरिहर-मिलाना (जुलूस)
२१मर्गासिर्षाअंधेराहर सोमवारसवारी
२२पौषउज्ज्वलधन-संक्रांति (एकादसी)अन्नकूट
२३माघअंधेराबसंत पंचमीविशेष पूजा
२४फाल्गुनअंधेरामहाशिवरात्रिमहोत्सव, विशेष पूजन और अभिषेक
२५फाल्गुनउज्ज्वलदूसरा (द्वितीय)शिव के पांच रूपों के दर्शन (पंच स्वरूप)
२६फाल्गुनउज्ज्वलपूर्णिमा के दिनसंध्या आरती होने के बाद होलिका उत्सव


उज्जैन सिटी का इतिहास
 
पुण्य-सलिला शिप्रा तट पर स्थित भारत की महाभागा अनादि नगरी उज्जयिनी को भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक काया का मणिपूर चक्र माना गया है। इसे भारत की मोक्षदायिका सप्त प्राचीन पुरियों में एक माना गया है। प्राचीन विश्व की याम्योत्तार; शून्य देशान्तरध्द रेखा यहीं से गुजरती थी। विभिन्न नामों से इसकी महिमा गाई गयी है। महाकवि कालिदास द्वारा वर्णित ''श्री विशाला-विशाला'' नगरी तथा भाणों में उल्लिखित ''सार्वभौम'' नगरी यही रही है। इस नगरी से ऋषि सांदीपनि, महाकात्यायन, भास, भर्तृहरि, कालिदास- वराहमिहिर- अमरसिंहादि नवरत्न, परमार्थ, शूद्रक, बाणभट्ट, मयूर, राजशेखर, पुष्पदन्त, हरिषेण, शंकराचार्य, वल्लभाचार्य, जदरूप आदि संस्कृति-चेता महापुरुषों का घनीभूत संबंध रहा है। वृष्णि-वीर कृष्ण-बलराम, चण्डप्रद्योत, वत्सराज उदयन, मौर्य राज्यपाल अशोक सम्राट् सम्प्रति, राजा विक्रमादित्य, महाक्षत्रप चष्टन व रुद्रदामन, परमार नरेश वाक्पति मुंजराज, भोजदेव व उदयादित्य, आमेर नरेश सवाई जयसिंह, महादजी शिन्दे जैसे महान् शासकों का राजनैतिक संस्पर्श इस नगरी को प्राप्त हुआ है। मुगल सम्राट् अकबर, जहाँगीर व शाहजहाँ की भी यह चहेती विश्राम-स्थली रही है।पुण्य-सलिला शिप्रा तट पर बसी अवन्तिका अनेक तीर्थों की नगरी है। इन तीर्थों पर स्नान, दान, तर्पण, श्राध्द आदि का नियमित क्रम चलता रहता है। ये तीर्थ सप्तसागरों, तड़ागों, कुण्डों, वापियों एवं शिप्रा की अनेक सहायक नदियों पर स्थित रहे हैं। शिप्रा के मनोरम तट पर अनेक दर्शनीय व विशाल घाट इन तीर्थ-स्थलों पर विद्यमान है जिनमें त्रिवेणी-संगम, गोतीर्थ, नृसिंह तीर्थ, पिशाचमोचन तीर्थ, हरिहर तीर्थ, केदार तीर्थ, प्रयाग तीर्थ, ओखर तीर्थ, भैरव तीर्थ, गंगा तीर्थ, मंदाकिनी तीर्थ, सिध्द तीर्थ आदि विशेष उल्लेखनीय है। प्रत्येक बारह वर्षों में यहाँ के सिंहस्थ मेले के अवसर पर लाखों साधु व यात्री स्नान करते हैं। सम्पूर्ण भारत ही एक पावन क्षेत्र है। उसके मध्य में अवन्तिका का पावन स्थान है। इसके उत्तार में बदरी-केदार, पूर्व में पुरी, दक्षिण में रामेश्वर तथा पश्चिम में द्वारका है जिनके प्रमुख देवता क्रमश: केदारेश्वर, जगन्नाथ, रामेश्वर तथा भगवान् श्रीकृष्ण हैं। अवन्तिका भारत का केन्द्रीय क्षेत्र होने पर भी अपने आप में एक पूर्ण क्षेत्र है, जिसके उत्तार में दर्दुरेश्वर, पूर्व में पिंगलेश्वर, दक्षिण में कायावरोहणेश्वर तथा पश्चिम में विल्वेश्वर महादेव विराजमान है। इस क्षेत्र का केन्द्र-स्थल महाकालेश्वर का मन्दिर है। भगवान् महाकाल क्षेत्राधिपति माने गये हैं। इस प्रकार भगवान् महाकाल न केवल उज्जयिनी क्षेत्र अपितु सम्पूर्ण भारत भूमि के ही क्षेत्राधिपति है। प्राचीन काल में उज्जयिनी एक सुविस्तृत महाकाल वन में स्थित रही थी। यह वन प्राचीन विश्व में विश्रुत अवन्ती क्षेत्र की शोभा बढ़ाता था। स्कन्द पुराण के अवन्तिखण्ड के अनुसार इस महावन में अति प्राचीन काल में ऋषि, देव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि की अपनी-अपनी तपस्या-स्थली रही है। अत: वहीं पर महाकाल वन में भगवान् शिव ने देवोचित शक्तियों से अनेक चमत्कारिक कार्य सम्पादित कर अपना महादेव नाम सार्थक किया। सहस्रों शिवलिंग इस वन में विद्यमान थे। इस कुशस्थली में उन्होंने ब्रह्मा का मस्तक काटकर प्रायश्चित्ता किया था तथा अपने ही हाथों से उनके कपाल का मोचन किया था। महाकाल वन एवं अवन्तिका भगवान् शिव को अत्यधिक प्रिय रहे हैं, इस कारण वे इस क्षेत्र को कभी नहीं त्यागते। अन्य तीर्थों की अपेक्षा इस तीर्थ को अधिक श्रेष्टत्व मिलने का भी यह एक कारण है। इसी महाकाल वन में ब्रह्मा द्वारा निवेदित भगवान् विष्णु ने उनके द्वारा प्रदत्ता कुशों सहित जगत् कल्याणार्थ निवास किया था। उज्जैन का कुशस्थली नाम इसी कारण से पड़ा। इस कारण यह नगरी ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश इन तीनों देवों का पुण्य-निवेश रही है। ''उज्जयिनी'' नामकरण के पीछे भी इस प्रकार की पौराणिक गाथा जुड़ी है। ब्रह्मा द्वारा अभय प्राप्त कर त्रिपुर नामक दानव ने अपने आतंक एवं अत्याचारों से देवों एवं देव-गण समर्पित जनता को त्रस्त कर दिया। आखिरकार समस्त देवता भगवान् शिव की शरण में आये। भगवान् शंकर ने रक्तदन्तिका चण्डिका देवी की आराधना कर उनसे महापाशुपतास्त्र प्राप्त किया, जिसकी सहायता से वे त्रिपुर का वध कर पाये। उनकी इसी विजय के परिणाम स्वरूप इस नगरी का नाम उज्जयिनी पड़ा। इसी प्रकार अंधक नामक दानव को भी इसी महाकाल वन में भगवान् शिव से मात खाना पड़ी, ऐसा मत्स्य पुराण में उल्लेख है। परम-भक्त प्रह्लाद ने भी भगवान् विष्णु एवं शिव से इसी स्थान पर अभय प्राप्त किया था। भगवान् शिव की महान् विजय के उपलक्ष्य में इस नगरी को स्वर्ग खचित तोरणों एवं यहॉ के गगनचुम्बी प्रासादों को स्वर्ग-शिखरों से सजाया गया था। अवन्तिका को इसी कारण कनकशृंगा कहा गया। कालान्तर में इस वन का क्षेत्र उज्जैन नगर के तेजी से विकास एवं प्रसार के कारण घटता गया। कालिदास के वर्णन से ज्ञात होता है कि उनके समय में महाकाल मन्दिर के आसपास केवल एक उपवन था, जिससे गंधवती नदी का पवन झुलाता रहता था। समय की विडम्बना! आज अवन्तिका उस उपवन से भी वंचित है।


उज्जैन नगरी के मुख्य स्थानों की यात्रा:-

उज्जैन में मुख्य स्थानों की यात्रा
1.    महाकालेश्वर
2.    कालभैरव
3.    हरसिद्धि
4.    वेद्शाला
5.    सांदीपनी आश्रम
6.    चिंतामणि गणेश
7.    त्रिवेणी नवग्रह
8.    मंगलनाथ
9.    सिद्धवट
10.  गोपाल मंदिर

उज्जैन नगरी कैसे पहुंचे?

1.    वायुमार्ग: निकटतम हवाई अड्डा इंदौर (53 के.एम.) है.मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, ग्वालियर से पहुंचने उड़ानों.
2.    रेलवे: उज्जैन सीधे अहमदाबाद, राजकोट, मुम्बई, फ़ैज़ाबाद, लखनऊ, देहरादून, दिल्ली, बनारस, कोचीन, चेन्नई, बंगलौर, हैदराबाद, जयपुर, हावड़ा और कई और अधिक के लिए रेलवे लाइन से जुड़ा है.
3.    सड़क: उज्जैन सीधे इंदौर, सूरत, ग्वालियर, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, उदयपुर, नासिक, मथुरा सड़क मार्ग से जुड़ा है.

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